उज्बेकिस्तान के फयाज तेपा और कारा तेपा क्या हैं? जिनको भारत देगा नया स्वरूप; जानिए बौद्ध धर्म में क्या है महत्व
उज्बेकिस्तान के 2000 साल पुराने बौद्ध स्थलों को नया रूप देने के लिए पीएम नरेंद्र मोदी ने विशेष सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं.
Published : August 31, 2026 at 4:28 PM IST
हैदराबाद: India Uzbekistan Deal Buddhist Sites Conservation: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने उज्बेकिस्तान दौरे पर वहां के राष्ट्रपति शौकत मिर्जियोयेव के साथ 11 महत्वपूर्ण समझौतों (India Uzbekistan Deal) पर साइन किए. साथ ही 5 घोषणाएं भी कीं. इन 11 समझौतों में एक ऐसा है जो दुनिया के 32.41 करोड़ और भारत देश के करीब 95.50 लाख बौद्ध अनुयायियों में खुशी की लहर लेकर आया है.
दरअसल, दक्षिण उज्बेकिस्तान के टर्मेज (Termez) में स्थित दो अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण बौद्ध मठ फयाज तेपा (Fayaz Tepa) और कारा तेपा (Kara Tepa) के पुनरुद्धार और संरक्षण (Restoration and Conservation) के लिए दोनों देशों ने एक विशेष सहमति पत्र (Letter of Intent) पर साइन किए हैं. इसके तहत भारत उज्बेकिस्तान के साथ मिलकर इन दोनों बौद्ध साइट को संवारेगा. ETV Bharat की इस रिपोर्ट में आईए जानते हैं फयाज तेपा और कारा तेपा का ऐतिहासिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व?
उज्बेकिस्तान में बौद्ध धर्म के प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र: फयाज तेपा और कारा तेपा दक्षिण उज्बेकिस्तान के टर्मेज में स्थित दो अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण बौद्ध मठ परिसर (Buddhist Monastic Complexes) हैं. ये प्राचीन बैक्ट्रिया क्षेत्र का हिस्सा थे और सिल्क रोड (रेशम मार्ग) पर बौद्ध धर्म के प्रसार के प्रमुख आध्यात्मिक केंद्र माने जाते हैं.
फयाज तेपा की स्थापना कब हुई: इतिहास के पन्नों को पलटने से पता चलता है कि फयाज तेपा की स्थापना पहली शताब्दी ईस्वी (कुषाण काल) में हुई थी. इसमें एक मुख्य स्तूप, बौद्ध भिक्षुओं के रहने के लिए कमरे और एक बड़ा लॉन शामिल है. फयाज तेपा के भवन को मुख्य रूप से तीन भागों आवास, भोजनालय और पूजा स्थल में बांटा गया था.
फयाज तेपा से मिली विश्व प्रसिद्ध बौद्ध मूर्ति: फयाज तेपा से 1968 में भगवान बुद्ध की एक विश्व प्रसिद्ध त्रिमूर्ति मिली थी. जिसमें भगवान बुद्ध दो भिक्षुओं के साथ बोधि वृक्ष के नीचे बैठे हैं. यह मूर्ति गांधार और ग्रीक-बौद्ध (Hellenistic-Buddhist) कला का एक नमूना मानी जाती है. जो दर्शाती है कि मध्य एशिया में भारतीय और यूनानी संस्कृतियों का कितना गहरा मिलन हुआ था. यह प्रतिमा वर्तमान में उज्बेकिस्तान के राज्य इतिहास संग्रहालय में सुरक्षित रखी गई है.
कारा तेपा, बौद्ध संस्कृति-शिक्षा का बड़ा केंद्र: कारा तेपा एक प्राचीन बौद्ध पुरातात्विक स्थल (Buddhist Archaeological Site) है. पहली से चौथी शताब्दी ईस्वी (कुषाण काल) के दौरान यह बौद्ध धर्म, संस्कृति और शिक्षा का एक बहुत बड़ा केंद्र हुआ करता था. यह फयाज तेपा से कुछ सौ मीटर की दूरी पर स्थित है. इसका विकास मुख्य रूप से दूसरी से चौथी शताब्दी ईस्वी के बीच हुआ.
ध्यान-साधना का केंद्र थीं कारा तेपा की गुफाएं: कारा तेपा तीन बलुआ पत्थर की पहाड़ियों पर बना हुआ है. इसकी गुफाएं अनूठी हैं. इन गुफाओं में बौद्ध भिक्षु ध्यान और साधना करते थे. कारा तेपा की दीवारों पर प्राचीन कुषाण, ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों में प्राचीन शिलालेख और दीवार चित्र मिले हैं जो अपने इतिहास पर रोशनी डालते हैं. ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों के शिलालेख साबित करते हैं कि यहां भारतीय बौद्ध विद्वानों का नियमित आना-जाना था.
सिल्क रोड से उज्बेकिस्तान का क्या कनेक्शन: सिल्क रोड यानी रेशम मार्ग प्राचीन और मध्यकालीन व्यापारिक मार्गों का एक विशाल नेटवर्क था, जो एशिया, यूरोप और अफ्रीका को आपस में जोड़ता था. इस मार्ग का नाम चीन से होने वाले रेशम के भारी व्यापार के कारण पड़ा था. 6,500 किलोमीटर से अधिक लंबा यह मार्ग चीन से शुरू होकर मध्य एशिया, भारत, ईरान और रोम तक जाता था.
सिल्क रोड का हार्ट था उज्बेकिस्तान: रेशम के अलावा इस रास्ते से मसाले, चाय, सोना, चांदी, कीमती पत्थर और चीनी मिट्टी के बर्तन का व्यापार होता था. उज्बेकिस्तान को सिल्क रोड का मुख्य केंद्र या दिल कहा जाता था. भौगोलिक रूप से मध्य एशिया के केंद्र में स्थित होने के कारण, चीन को यूरोप और मध्य पूर्व से जोड़ने वाले लगभग सभी प्रमुख व्यापारिक रास्ते उज्बेकिस्तान से होकर गुजरते थे.
बौद्ध धर्म के अनुयायियों को मिलेगा नया आध्यात्मिक केंद्र: भारत और उज्बेकिस्तान के बीच फयाज तेपा और कारा तेपा के पुनरुद्धार और संरक्षण के लिए हुए सहमति पत्र (Letter of Intent) पर हस्ताक्षर से दुनिया भर के 50 करोड़ और भारत देश के करीब 84 लाख बौद्ध अनुयायियों को नया आध्यात्मिक केंद्र मिलेगा. अब तक बौद्ध सर्किट मुख्य रूप से नेपाल के लुम्बिनी और भारत के बोधगया, सारनाथ, कुशीनगर तक सीमित था. इस पहल से मध्य एशिया का टर्मेज क्षेत्र भी इस सर्किट का एक प्रमुख हिस्सा बन जाएगा. बौद्ध अनुयायियों को उस मार्ग को करीब से देखने और समझने का मौका मिलेगा, जिससे होकर बौद्ध धर्म भारत से चीन, जापान और कोरिया तक फैला था.
उज्बेकिस्तान में बढ़ेगा धार्मिक पर्यटन: भारत के फयाज तेपा और कारा तेपा के संरक्षण कार्य के तहत पर्यटकों के लिए मार्ग, सूचना केंद्र और बुनियादी सुविधाएं बेहतर की जाएंगी. साथ ही भारत और उज्बेकिस्तान के बीच हुए पर्यटन सहयोग समझौते के कारण श्रद्धालुओं के लिए टर्मेज की यात्रा करना अधिक सुरक्षित और आसान हो जाएगा.
प्राचीन धरोहरों का होगा संरक्षण: समय की मार और मौसम के कारण उज्बेकिस्तान में 2,000 साल पुराने मिट्टी के स्तूप, गुफाओं और भित्तिचित्र नष्ट हो रहे हैं. अब भारत के साथ हुए समझौते के बाद इनको आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों से संरक्षित किया जाएगा. कारा तेपा की गुफाओं में मौजूद ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों के प्राचीन शिलालेखों का दस्तावेजीकरण होगा, जिससे बौद्ध धर्म के शुरुआती सिद्धांतों को समझने में मदद मिलेगी.
ASI करेगा फयाज तेपा और कारा तेपा का संरक्षण: उज्बेकिस्तान के फयाज तेपा और कारा तेपा के संरक्षण की कमान भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) संभालेगा. दरअसल, एएसआई के पास भारत के नालंदा और सारनाथ जैसे बौद्ध स्थलों के संरक्षण का लंबा अनुभव है. इसका उपयोग वह यहां करेगा. कारा तेपा की गुफाओं की ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियों के शिलालेखों को एएसआई डिकोड करके उन्हें डिजीटल रूप देकर सहेजेगा. इसके साथ ही यहां से मिलीं मूर्तियों और कलाकृतियों को सहेजने के लिए एएसआई एक आधुनिक ऑन-साइट संग्रहालय बनाने में भी मदद करेगा.
मध्य एशिया में भारत का पहला व्यापक रणनीतिक साझेदार बना उज्बेकिस्तान: भारत और उज्बेकिस्तान के संबंध ऐतिहासिक सांस्कृतिक जुड़ाव पर आधारित हैं, जिन्हें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ताशकंद यात्रा ने व्यापक रणनीतिक साझेदारी (Comprehensive Strategic Partnership) के स्तर तक बढ़ा दिया. भारत और उज्बेकिस्तान के बीच संबंधों का लंबा इतिहास रहा है. आधिकारिक तौर पर 18 मार्च 1992 को दोनों देशों के बीच संबंध स्थापित हुए थे. 2011 में इन्हें रणनीतिक साझेदारी में अपग्रेड किया गया. अब व्यापक रणनीतिक साझेदारी होने से उज्बेकिस्तान मध्य एशिया में भारत का पहला ऐसा साझेदार बन गया है.
- भारत और उज्बेकिस्तान सरकार के बीच वर्ष 2026-30 की अवधि के लिए सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रम तय हुआ.
- उज्बेकिस्तान के टर्मेज में स्थित प्राचीन बौद्ध स्थलों फयाज तेपा और कारा तेपा के संरक्षण और जीर्णोद्धार के लिए समझौता.
- भारत और उज्बेकिस्तान के बीच अभिलेखागार क्षेत्र में सहयोग पर समझौता हुआ.
- आयुर्वेद और अन्य पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों के क्षेत्र में सहयोग के लिए समझौता हुआ.
- भूविज्ञान और खनिज संसाधनों के क्षेत्र में सहयोग के लिए समझौते पर हस्ताक्षर हुए.
- वर्ष 2026-28 की अवधि के लिए पर्यटन क्षेत्र में सहयोग के लिए साझेदारी कार्यक्रम तय हुए.
- भारत और उज्बेकिस्तान के बीच आर्थिक एवं वित्तीय संवाद के लिए समझौता हुआ.
- पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में सहयोग के लिए समझौता हुआ.
- उच्च शिक्षा और वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में सहयोग के लिए डील हुई.
- गुजरात और समरकंद क्षेत्र के बीच साझेदारी संबंध स्थापित करने के लिए डील फाइनल हुई.
2030 तक द्विपक्षीय व्यापार 5 अरब डॉलर पहुंचाने का लक्ष्य: दोनों देशों ने वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 5 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है. सहयोग के प्रमुख क्षेत्रों में ऊर्जा, यूरेनियम और महत्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals), फार्मास्यूटिकल्स, एआई (AI), डिजिटल तकनीक और कृषि शामिल हैं. रक्षा, आतंकवाद-रोधी अभियानों और साइबर सुरक्षा के क्षेत्र में दोनों देश मिलकर काम करेंगे. साथ ही अरब सागर के पर्यावरणीय पुनर्वास के लिए भारत ने 10 लाख डॉलर के अनुदान की घोषणा की है. दरअसल, भारत 'कनेक्ट सेंट्रल एशिया' नीति के तहत मध्य एशिया में अपनी स्थिति मजबूत करने में लगा हुआ है.
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