उत्तराखंड में भारी तबाही ला सकते हैं हैंगिंग ग्लेशियर! मॉनिटरिंग की जरूरत, NGT भी हुआ सख्त
मध्य हिमालय में अस्थिर हैंगिंग ग्लेशियर के खतरे को लेकर एनजीटी ने मांगा जवाब, वैज्ञानिकों ने दिए अहम सुझाव, देहरादून से रोहित सोनी की रिपोर्ट

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : April 29, 2026 at 5:52 PM IST
देहरादून: जलवायु परिवर्तन और लगातार बढ़ते तापमान की वजह से खासकर हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद ग्लेशियर न सिर्फ पिघल रहे हैं, बल्कि उनके खिसकने या फिर टूटने की आशंका जताई जा रही है. जिसे देखते हुए हाल ही में एनजीटी यानी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने केंद्र सरकार समेत तमाम संस्थाओं से उत्तराखंड समेत अन्य हिमालय क्षेत्रों में मौजूद ग्लेशियर के खिसकने या फिर टूटने की जानकारी मांगी है.
मध्य हिमालय क्षेत्र के पर्वतीय ढलानों पर मौजूद ये ग्लेशियर किसी बड़े हिमस्खलन और आपदा का कारण बन सकते हैं. हालांकि, उत्तराखंड में भी पहले इस तरह की घटनाएं हो चुकी हैं. साथ ही बर्फबारी के बाद अब हिमस्खलन की घटनाएं भी होती है. आखिर क्या है इसके पीछे की वजह, इससे बचाव और सावधानियां को लेकर क्या है हमारे पास विकल्प? वर्तमान समय में संवेदनशील क्षेत्रों की क्या है स्थिति? इससे आपको रूबरू करवाते हैं.
हैंगिंग ग्लेशियर से बड़ा खतरा: मध्य हिमालय के पर्वतीय ढलानों पर मौजूद हैंगिंग ग्लेशियर यानी लटके हुए ग्लेशियर (हिमनद) विनाशकारी हिमस्खलन (एवलॉन्च) और निचले क्षेत्रों में आपदाओं का एक बड़ा कारण बन सकते हैं. ऐसे में इन हैंगिंग ग्लेशियरों से होने वाले खतरे को लेकर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने केंद्र सरकार समेत अन्य संस्थानों से जवाब मांगा है.
दरअसल, एनजीटी ने आधिकारिक तौर पर केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, स्वच्छ गंगा राष्ट्रीय मिशन, उत्तराखंड पर्यटन विकास बोर्ड और राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान को नोटिस जारी किया है. साथ ही इन सभी को जवाब दाखिल करने को कहा है. क्योंकि, 6 अगस्त को इस मामले पर एनजीटी की सुनवाई होनी है.

उत्तराखंड में हैंगिंग ग्लेशियर मचा चुका तबाही: उत्तराखंड में हैंगिंग ग्लेशियर के टूटने से मची तबाही का एक सबसे बड़ा उदाहरण कुछ साल पहले आई रैणी आपदा है. गौर हो कि 7 फरवरी 2021 की सुबह चमोली जिले के रौंथी पर्वत पर करीब 5,600 मीटर की ऊंचाई पर स्थित हैंगिंग ग्लेशियर का एक बड़ा हिस्सा टूटकर नीचे आ गया था.
ऐसे में इस हिमस्खलन और मलबे ने ऋषिगंगा व धौली गंगा नदियों में अचानक भीषण बाढ़ आ गई थी. जिसके चलते ऋषिगंगा और तपोवन विष्णुगाड जलविद्युत परियोजनाओं को भारी नुकसान हुआ. काफी संख्या में जनहानि भी हुई थी. यही वजह है कि हैंगिंग ग्लेशियर की निगरानी पर विशेष जोर दिया जा रहा है. क्योंकि, ये विनाशकारी आपदा को कभी भी आमंत्रित कर सकते हैं.

फरवरी-मार्च शिफ्ट हुई बर्फबारी: पिछले एक दशक में वेदर पैटर्न में काफी ज्यादा बदलाव हुआ है. पहले जहां बर्फबारी नवंबर-दिसंबर या जनवरी महीने में मिलती थी, वो अब शिफ्ट होकर फरवरी-मार्च में आ गई है. उच्च हिमालयी क्षेत्रों में नवंबर और दिसंबर में होने वाली बर्फबारी में वॉटर कंटेंट काफी कम होते हैं, जिसके चलते उसके पिघलने की स्पीड भी काफी कम होती है.
जो बर्फबारी फरवरी-मार्च महीने में होती है, उसमें वॉटर कंटेंट की मात्रा ज्यादा होती है. जिसके चलते उसमें जमने की ताकत कम होती है. ऐसे में फरवरी-मार्च महीने पड़ने वाली बर्फबारी के पिघलने की रफ्तार भी काफी ज्यादा तेज होती है. जो हिमालय के लिए बड़ी समस्या बनती जा रही है. क्योंकि, सर्दियों में ज्यादा बर्फबारी नहीं हो पा रही है.

ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार ने बढ़ाई चिंता: वर्तमान स्थिति ये है कि विंटर सीजन घट रहा है. जबकि, समर का सीजन बढ़ रहा है. जिसके चलते ग्लेशियर के पिघलने की रफ्तार बढ़ गई है. वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून से मिली जानकारी के अनुसार, जो ग्लेशियर पहले 6 मीटर/ईयर की दर से पिघल रहे थे, उसके पिघलने की दर वर्तमान समय में दो से तीन गुना तक बढ़ गई है. हालांकि, ग्लेशियर का पिघलना और उसका एडवांस होना, उसका यह नेचुरल प्रक्रिया है.

क्योंकि, ग्लेशियर पिघलेंगे, तभी तो नदियां रिचार्ज होंगी, लेकिन जिस तरह से ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बढ़ रही वो एक बड़ी चिंता का विषय बनी हुई है. क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वार्मिंग की वजह से गर्मियों के तापमान से बढ़ोत्तरी होने के साथ ही सर्दियों के तापमान में भी बढ़ोत्तरी हुई है. जिसके चलते विंटर सीजन घटता जा रहा है, जिससे स्लोफॉल एरिया घटता जा रहा है और रेनफॉल एरिया बढ़ता जा रहा है.
"ग्लोब का औसत तापमान कई बार 17 से 22 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है. वर्तमान से में पृथ्वी का एवरेज सतह तापमान करीब 15 डिग्री सेल्सियस है. जो पूर्व-औद्योगिक काल से करीब 1.2- 1.5°C ज्यादा है. साल 1951 से 1980 के दौरान ग्लोब का औसत तापमान के सापेक्ष पिछले साल 2025 में औसत 1.19 डिग्री सेल्सियस ज्यादा दर्ज किया गया है."- डॉ. मनीष मेहता, ग्लेशियोलॉजिस्ट, वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान, देहरादून
हैंगिंग ग्लेशियरों की हो निगरानी: वहीं, क्लाइमेट चेंज एक्टिविस्ट आशीष गर्ग ने अलकनंदा बेसिन समेत मध्य हिमालय में मौजूद हैंगिंग ग्लेशियर को लेकर गहरी चिंता जताई है. उनका कहना है कि अगर हैंगिंग ग्लेशियर की निगरानी शुरू हो जाएगी तो उससे संवेदनशील क्षेत्रों का पता चल जाएगा. साथ ही नुकसान की संभावना भी कम हो सकेगी.

"ग्लोबल वार्मिंग और क्लाइमेट चेंज की वजह से सी वॉर्म (Sea Worm) हो रहा है. अलनीनो इफेक्ट की वजह से गर्मी बढ़ रही है. एनजीटी की रिपोर्ट के मानें तो नीती माणा के आसपास अनियोजित तरीके से विकास हो गया है. जिसके चलते पर्वतीय क्षेत्रों में हीट बढ़ रही है. ऐसे में इस क्षेत्र के आसपास मौजूद हैंगिंग ग्लेशियर को लेकर तमाम संस्थानों ने अध्ययन किया."- आशीष गर्ग, क्लाइमेट चेंज एक्टिविस्ट
"इसके साथ ही एक मॉडल बनाया कि अगर ये हैंगिंग ग्लेशियर टूटते है तो उसका इंपैक्ट कहां तक होगा. ऐसे में ये एक चिंता का विषय है. इसी रिपोर्ट का एनजीटी ने स्वतः संज्ञान लिया है. साथ ही तमाम लोगों को नोटिस जारी किया है. इसके अलावा इसकी तत्काल मॉनिटरिंग पर जोर दिया है."- आशीष गर्ग, क्लाइमेट चेंज एक्टिविस्ट
ग्लोबल वार्मिंग से पिघल रहे हैंगिंग ग्लेशियर: वहीं, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी देहरादून के हिमनद विज्ञानी डॉ. मनीष मेहता का कहना है कि हैंगिंग ग्लेशियर लगातार पिघल रहे हैं. लिहाजा, इससे बचाव के तरीकों को खोजने की जरूरत है. उन्होंने कुछ अहम सुझाव भी दिए हैं.

मनीष मेहता आगे कहते हैं कि 'इनकी समय-समय पर इनकी निगरानी करना बहुत जरूरी है. इसके लिए एक ऐसी एजेंसी होनी चाहिए, जो इसकी लगातार निगरानी करते रहे और वर्तमान स्थिति की जानकारी उपलब्ध करता रहे है.' साथ ही बताया कि 'देश में नॉर्थ ईस्ट से लेकर नॉर्थ वेस्ट तक का पूरा हिमालय नाजुक है और यंग है. ऐसे में पूरा हिमालय ही संवेदनशील है, लेकिन ये कहना अभी संभव नहीं है कि कौन सा क्षेत्र बहुत ज्यादा संवेदनशील है.'
'लिहाजा, स्थानीय लोगों को इसके प्रति जागरूक करने की जरूरत है कि कहां पर रहना है और कहां पर नहीं रहना है? कहां पर खेती करनी है? कुल मिलाकर पर्वतीय क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए जागरूकता प्रोग्राम चलाने की जरूरत है. ताकि, आने वाले समय किसी बढ़े खतरे से निपटा जा सके और अगर कोई आपदा भी आती है, तो जनहानि को कम से कम किया जा सके.'
एनजीटी ने जारी किया नोटिस: बता दें कि हाल में ही नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने हैंगिंग ग्लेशियर को लेकर जारी एक रिपोर्ट का संज्ञान लेकर केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB), नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा (NMCG) समेत अन्य संबंधित स्टेक होल्डर्स को इस बारे में अपना जवाब देने के लिए नोटिस जारी किया है.

रिपोर्ट में क्या है? दरअसल, इस रिपोर्ट में आईआईएससी (IISc) बेंगलुरु, आईआईटी (IIT) भुवनेश्वर और डीआरडीओ (DRDO) जैसे बड़े संस्थानों के शोधकर्ताओं की एक वैज्ञानिक अध्ययन का जिक्र किया गया है. जिसमें साफतौर पर चेतावनी दी गई है कि उत्तराखंड के अलकनंदा बेसिन में अस्थिर हैंगिंग ग्लेशियर एवलॉन्च नीचे की तरफ आपदाओं को बढ़ावा दे सकते हैं.
इस अध्ययन में ग्लेशियर के पीछे हटने, भूकंप की संवेदनशीलता के साथ बदरीनाथ, माना और हनुमान चट्टी जैसे कमजोर ऊंचाई वाले इलाकों में इंसानी बस्तियों एवं आधारभूत संरचनाओं के तेजी से बढ़ने से बढ़ते खतरों पर फोकस किया गया है. यानी इन जगहों पर अनियोजित तरीके से निर्माण किए जा रहे हैं. जो आने वाले समय में जोखिम को बढ़ा रहे हैं.
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