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'तैरना नहीं आता.. गिरे तो बचेंगे नहीं..' ढाई साल से पुल का इंतजार कर रहे ग्रामीणों का छलका दर्द

चचरी पुल बनाकर जान जोखिम में डालकर रोज सफर करने वाली ये दास्तां बिहार के शिवहर के एक गांव की है. सुमित कुमार की रिपोर्ट

Chachari bridge in sheohar
पुल टूटा तो चचरी बनी सहारा (ETV Bharat)

By ETV Bharat Bihar Team

Published : August 20, 2026 at 7:16 PM IST

शिवहर : दावों और वादों के शोर के बीच बिहार के शिवहर का एक गांव आज भी बुनियादी विकास की आस में बैठा है. इस गांव में पिछले ढाई साल से मुख्य पुल टूटा है, लेकिन इसकी सुध आजतक किसी ने नहीं ली. ऐसे में ग्रामीणों ने खुद ही इसका जुगाड़ निकाला और चचरी पुल (बांस का पुल) बनाया है, जिससे रोज हजारों लोग गुजरते हैं. लेकिन इसे पार करने के दौरान लोगों की जान हलक पर ही अटक जाती है.

ढाई साल से टूटा है मुख्य पुल : ये डुमरी कटसरी प्रखंड के रामबन रहुआ पंचायत स्थित लक्ष्मीनया गांव की कहानी है. यहां मुख्य टूटा हुआ पुल सिर्फ ईंट-पत्थर का ढांचा नहीं, बल्कि प्रशासनिक उदासीनता और राजनीतिक वादों के खोखलेपन की जीती-जागती मिसाल बन चुका है. तमाम जनप्रतिनिधियों की जानकारी में होने के बावजूद वर्षों से यह समस्या जस की तस बनी हुई है और अब तक कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया है.

देखें रिपोर्ट (ETV Bharat)

ग्रामीणों का आत्मनिर्भर 'चचरी' संघर्ष : स्थानीय ग्रामीण पवन कुमार ने बताया कि जब प्रशासन की ओर से कोई सुनवाई नहीं हुई, तो गांव वालों ने मिलकर खुद अपने बल पर चचरी पुल का निर्माण किया. ताकि खेती-बाड़ी के काम पर जाया जा सके और दोपहिया वाहन लेकर आवागमन हो सके. अगर यह चचरी नहीं होती, तो ग्रामीणों को पांच किलोमीटर घूमकर अपने ही खेतों तक पहुंचना पड़ता.

"बरसात से पहले ही पुल टूट चुका है. जाने-आने में दिक्कत होने पर गांववालों ने मिलकर चचरी पुल बनाया है. दो पहिया वाहन ही यहां से गुजरता है. जनप्रतिनिधियों को टूटे पुल की जानकारी है, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई है."- पवन कुमार, ग्रामीण

ईटीवी भारत GFX (ETV Bharat)

'जान जोखिम में डालने की मजबूरी' : यह चचरी दरअसल किसी इंजीनियरिंग की मजबूरी नहीं, बल्कि प्रशासनिक विफलता के खिलाफ ग्रामीणों के आत्मनिर्भर संघर्ष का प्रतीक है. स्थानीय निवासी लड्डू कुमार ने अपनी पीड़ा बयां करते हुए बताया कि पिछले दो-ढाई साल से पुल की यही बदहाल स्थिति बनी हुई है.

"पुल पार करते वक्त हर बार मरेंगे या बचेंगे का डर सताता रहता है. जान हलक में अटकी रहती है. मुझे तैरने नहीं आता है. अगर गिरा तो बचूंगा नहीं. ढाई साल से पुल टूटा हुआ है. इससे रोज 5 हजार लोग गुजरते हैं. इसको बनाने के लिए कोई पहल आजतक नहीं की गई है."-लड्डू कुमार, स्थानीय निवासी

चचरी पुल बना सहारा (ETV Bharat)

जनप्रतिनिधियों से नाराजगी : ग्रामीणों का बयान अपने आप में इस बात की गवाही है कि प्रशासनिक लापरवाही किस कदर आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी को खतरे में डाल रही है. राकेश ने आरोप लगाया कि जनप्रतिनिधियों ने अब तक इस समस्या का कोई संज्ञान नहीं लिया है. ग्रामीणों ने जनप्रतिनिधियों की कार्यशैली पर नाराजगी जतायी है.

ईटीवी भारत GFX (ETV Bharat)

"अगर यह पुल बन जाए तो यह सरकार और प्रशासन का एक बेहद नेक काम साबित होगा, क्योंकि यह रास्ता खासतौर पर बच्चों और बुजुर्गों के लिए बेहद खतरनाक बना हुआ है."- राकेश, ग्रामीण

BDO का बयान :इस पूरे मामले पर जब डुमरी कटसरी के प्रखंड विकास पदाधिकारी (बीडीओ) अरुण कुमार से बात की गई, तो उन्होंने स्वीकार किया कि पुल की टूटी हुई स्थिति को लेकर वे स्वयं भी चिंतित हैं. हालांकि उन्होंने साफ किया कि यह मामला महज विभागीय स्तर का नहीं है.

ढाई साल से टूटा है मुख्य पुल (ETV Bharat)

"अब तक उच्च स्तर से इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई है. विभाग की ओर से समस्या के किसी अस्थायी समाधान की दिशा में प्रयास जारी है."- अरुण कुमार, बीडीओ

रामबन रहुआ पंचायत (ETV Bharat)

कब निकलेगा हल ?: बीडीओ का यह बयान एक बात तो साफ कर देता है कि जमीनी स्तर के अधिकारी समस्या से वाकिफ हैं, लेकिन फैसले की चाबी उनके हाथ में नहीं है. सवाल यह है कि जब स्थानीय प्रशासन खुद स्वीकार कर रहा है कि यह मुद्दा 'उच्च स्तर' के भरोसे लटका है, तो आखिर वह ऊपरी स्तर कब जागेगा?

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