चंपारण की मिट्टी की खुशबू अब विदेशों तक: मर्चा चूड़ा की बढ़ी मांग, GI टैग के बाद 80 करोड़ का कारोबार
चंपारण का मर्चा चूड़ा अपनी खास खुशबू, स्वाद और GI टैग के चलते देशभर में लोकप्रिय होकर विदेशों तक पहुंच रहा है.

Published : September 22, 2026 at 7:05 AM IST
बगहा : बिहार के पश्चिम चंपारण जिले की मिट्टी में पैदा होने वाला 'मर्चा धान' अब सिर्फ स्थानीय पहचान नहीं रह गया है. इससे तैयार होने वाला मर्चा चूड़ा यानी पोहा अपनी खास खुशबू, स्वाद और प्राकृतिक अरोमा के कारण बिहार के बाहर भी पहचान बना चुका है. चंपारण में आज भी घर आए मेहमानों को दही के साथ मर्चा चूड़ा परोसने की परंपरा इसकी लोकप्रियता को दर्शाती है.
सावन में बुआई नवंबर के अंत तक तैयार होती है फसल
मर्चा धान की खेती सावन के महीने में शुरू होती है और नवंबर के आखिर तक इसकी फसल तैयार हो जाती है. यह करीब 145 से 150 दिन की फसल है. पश्चिम चंपारण के नरकटियागंज, गौनाहा, सिकटा, मैनाटांड़ और रामनगर प्रखंड के कुछ गांवों में इसकी बड़े पैमाने पर खेती की जाती है.

बगहा और मैनाटांड़ के मर्चा में क्यों है खास खुशबू?
चनपटिया के मर्चा चूड़ा निर्माता रामजी प्रसाद के मुताबिक, खास प्राकृतिक खुशबू वाला मर्चा धान मुख्य रूप से पश्चिम चंपारण के बगहा और मैनाटांड़ क्षेत्र में पैदा होता है. दूसरे राज्यों के कृषि विशेषज्ञों ने भी इसकी खेती का प्रयास किया, लेकिन वहां पैदा हुए धान में चंपारण जैसी प्राकृतिक खुशबू नहीं आ सकी. रामजी प्रसाद के अनुसार, इसके पीछे चंपारण की मिट्टी की महत्वपूर्ण भूमिका है. खासकर मैनाटांड़ क्षेत्र की विशेष मिट्टी में मौजूद प्राकृतिक गुण मर्चा धान से तैयार चूड़े को अलग खुशबू और स्वाद देते हैं.
कैसे पड़ा 'मर्चा धान' नाम?
मर्चा धान की पहचान उसके दाने से भी होती है. इसका दाना काली मिर्च की तरह दिखाई देता है, इसी वजह से इसे मर्चा धान कहा जाता है. इसकी खेती पारंपरिक तरीके से की जाती है और किसानों के मुताबिक इसमें केमिकल और फर्टिलाइजर का इस्तेमाल नहीं किया जाता.

करीब 1000 एकड़ में खेती में 500 से ज्यादा किसान जुड़े
पश्चिम चंपारण में करीब 1,000 एकड़ क्षेत्र में मर्चा धान की खेती होने की बात कही गई है. इससे 500 से अधिक किसान जुड़े बताए जाते हैं. इसका उत्पादन करीब 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर के आसपास बताया गया है. इस धान की खेती कर किसान काफी फायदा कमा रहे हैं. फिलहाल जितनी डिमांड आ रही है उतनी पैदावार नहीं हो पा रही है.
2023 में मिला GI टैग अब बढ़ी बाजार की पहुंच
मर्चा चूड़ा को वर्ष 2023 में भौगोलिक पहचान यानी GI टैग मिला. इसके बाद इसकी बाजार पहुंच और मांग में बढ़ोतरी हुई. अब चंपारण का मर्चा चूड़ा बिहार के अलावा उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, उत्तराखंड और झारखंड समेत कई राज्यों में भेजा जाता है. विदेश जाने वाले लोग भी इसे अपने साथ उपहार के तौर पर ले जाते हैं. कारोबारियों के मुताबिक, विदेशों में भी इसकी मांग बढ़ रही है.

फसल तैयार होते ही दूर तक महसूस होती है खुशबू
मर्चा चूड़ा की सबसे खास पहचान इसकी सुगंध मानी जाती है. बताया जाता है कि फसल तैयार होने के दौरान इसकी खुशबू दूर तक महसूस की जा सकती है. यही प्राकृतिक अरोमा इसे दूसरे चूड़ों से अलग पहचान देता है और इसकी मांग का बड़ा आधार है.
World Food India 2023 में भी पहुंचा चंपारण का मर्चा चूड़ा
दिल्ली के प्रगति मैदान में आयोजित World Food India 2023 में चनपटिया के मर्चा चूड़ा निर्माता रामजी प्रसाद का चयन हुआ था. तीन दिनों तक चले इस आयोजन में देश-विदेश से लोग पहुंचे थे और चंपारण के इस खास उत्पाद को प्रदर्शित किया गया. मिली जानकारी के अनुसार, करीब 80 देशों से आए लोगों को मर्चा चूड़ा का स्वाद और इसकी विशेषताओं को जानने का अवसर मिला.

1969 से परिवार में चल रहा कारोबार
रामजी प्रसाद के मुताबिक, मर्चा चूड़ा का कारोबार उनके परिवार में वर्ष 1969 से चला आ रहा है. शुरुआती दौर में मर्चा धान की कुटाई पूरी तरह हाथ से होती थी. इसमें काफी समय और मेहनत लगती थी. वर्ष 1997 में चूड़ा तैयार करने के लिए मशीन लगाई गई. इसके बाद समय के साथ तकनीक और काम करने के तरीकों में बदलाव आया और कारोबार का विस्तार होता गया.
हर महीने 50-60 क्विंटल चूड़ा तैयार
आज इस कारोबार के तहत हर महीने करीब 50 से 60 क्विंटल मर्चा चूड़ा तैयार किए जाने की बात कही गई है. कारोबार से जुड़े लोगों के मुताबिक, इस उद्योग से करीब 100 लोगों को रोजगार मिला हुआ है. GI टैग मिलने के बाद कारोबार में और तेजी आने का दावा किया गया है. अब मर्चा चूड़ा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म Amazon पर भी उपलब्ध है. इसके अलावा मिल से दूसरे प्रकार का चूड़ा, चावल, आटा और मुड़ी भी तैयार कर ऑनलाइन बेचे जाते हैं.
डीजल से बिजली तक बदली मिल की तस्वीर
रामजी प्रसाद बताते हैं कि वर्ष 2019 से पहले चूड़ा मिल चलाने में डीजल पर काफी खर्च होता था. उस समय एक सप्ताह में करीब 12 से 13 लाख रुपये तक डीजल पर खर्च होने की बात उन्होंने कही. वर्ष 2019 में मिल को बिजली की सप्लाई मिलने के बाद खर्च की स्थिति बदली. उनके मुताबिक, अब एक महीने का बिजली खर्च करीब 12 लाख रुपये आता है. उनका कहना है कि कारोबार को आगे बढ़ाने में बिजली की उपलब्धता की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है.
80 करोड़ के आसपास कारोबार
रामजी प्रसाद के अनुसार 5 किलो मर्चा चूड़ा की कीमत 800 रुपये है. मर्चा चूड़ा के कारोबार के साथ-साथ अन्य उत्पादों के साथ वार्षिक टर्नओवर करीब 80 करोड़ रुपये है. GI टैग, ऑनलाइन बिक्री और दूसरे राज्यों में बढ़ती मांग ने इस पारंपरिक उत्पाद के बाजार को नया विस्तार दिया है.

बढ़ती मांग से किसानों को मिल सकती है बेहतर कीमत
मर्चा चूड़ा की देश-विदेश में बढ़ती मांग का सीधा लाभ इससे जुड़े किसानों को मिलने की उम्मीद जताई जा रही है. कारोबारियों का कहना है कि बाजार में मर्चा धान और इससे तैयार चूड़े की मांग बढ़ने पर किसानों के उत्पाद की मांग भी बढ़ सकती है और उन्हें बेहतर कीमत मिलने की संभावना बनेगी.
''चंपारण का मर्चा चूड़ा विदेश तक पहुंचना पूरे क्षेत्र के लिए गर्व की बात है. अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी पहचान बढ़ने से मर्चा धान की खेती किसानों के लिए और अधिक लाभकारी हो सकती है. तैयार मिर्चा चूड़ा की डिमांड जितनी बढ़ेगी उत्पाद की कीमत भी बढ़ेगी. जिससे इसकी खेती से जुड़े किसानों का भी फायदा होगा.''- रामजी प्रसाद, व्यवसायी
खेत से विदेश तक पहुंचा चंपारण का स्वाद
चंपारण की मिट्टी में पैदा होने वाला मर्चा धान अब खेतों से निकलकर देश की सीमाओं के पार अपनी पहचान बना रहा है. इसकी खास खुशबू, अलग स्वाद और GI टैग ने इसे पश्चिम चंपारण की विशिष्ट पहचान में बदल दिया है. बिहार से शुरू हुई इसकी मांग अब देश के कई राज्यों और विदेशों तक पहुंच चुकी है.
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