अजमेर में 812वां सालाना उर्स पर मलंगों ने परचम लेकर निकाला जुलूस, दिखाए हैरतअंगेज करतब

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By ETV Bharat Rajasthan Desk

Published : Jan 12, 2024, 9:41 PM IST

812वां सालाना उर्स

अजमेर में सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के 812वें उर्स के मौके पर देश के कोने-कोने से हजारों की संख्या में मलंग अजमेर पहुंचे. मलंग और कलंदर की ओर से दरगाह में परचम लाने की परंपरा है. इसी को पूरा करने के लिए हजारों मलंग कई किलोमीटर चलकर ख्वाजा नगरी अजमेर पहुंचे. मलंगों ने परचम लेकर जुलूस निकाला और हैरतअंगेज करतब दिखाए.

उर्स पर मलंगों ने परचम लेकर निकाला जुलूस

अजमेर. विश्व विख्यात सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती के देश और दुनिया में करोड़ों लोग चाहने वाले हैं.ख्वाजा गरीब नवाज के चाहने वालों में मलंग और कलंदर भी शामिल हैं. शुक्रवार को दिल्ली के महरौली में कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह से हजारों मलंग हाथों में झंडे थामे अजमेर पंहुचे. ऋषि घाटी स्थित ख्वाजा गरीब नवाज के चिल्ले की जियारत करने के बाद कलंदर जुलूस लेकर दरगाह की ओर निकले. खास बात यह रही कि कलंदरों ने अपने झंडों के साथ देश का झंडा भी थामे रखा. यानी कलंदर ख्वाजा की दीवानगी के साथ देशभक्ति और कौमी एकता का संदेश देते हुए आए.

देश-दुनिया से बेखबर होकर केवल अपने महबूब की चाह में खोए रहना ही एक इंसान को मलंगों और कलंदरों की श्रेणी में खड़ा करता है. कलंदरों का इतिहास यू तो काफी पुराना है, लेकिन ख्वाजा गरीब नवाज की दरगाह से मलंगों का नाता 812वर्षों से चला आ रहा है. उर्स पर परचम लाने की शुरुआत ख्वाजा गरीब नवाज के खलीफा सैयद कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी ने की थी. उस दौर में दिल्ली से कई लोगों के साथ वह अजमेर आए थे. तभी से पीढ़ी दर पीढ़ी मलंगों के अजमेर के ख्वाजा गरीब नवाज के उर्स में परचम लेकर आने की परंपरा बन गई है.

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महरौली से पहुंचा जत्था: मलंग हाजी मोहम्मद सफी बताते हैं कि देश के कोने-कोने से मलंग दिल्ली में महरौली में सैयद कुतुबुद्दीन बख्तियार काकी की दरगाह में एकत्रित होते हैं. उन्होंने बताया कि यहां से हजारों की संख्या में मलंग जुलूस के रूप में अजमेर ख्वाजा दरगाह के लिए रवाना होते हैं. 20 दिसंबर को मलंगों का यह जुलूस महरौली से रवाना हुआ था. उन्होंने यह भी बताया कि जुलूस में मलंग प्रतिदिन 35 किलोमीटर पैदल चलते हैं. हाथों में परचम थामे हुए मलंग ख्वाजा गरीब नवाज की दीवानगी में रास्ते की थकान भी भूल जाते हैं और अजमेर आने के बाद उनका केवल एक ही मकसद होता है ख्वाजा गरीब नवाज की चौखट को चूमना और हाजरी लगाना. उन्होंने बताया कि 812 वर्ष पहले शुरू हुई परचम लाने की परंपरा कयामत तक निभाते रहेंगे.

जुलूस में सभी धर्म और जाति के हैं मलंग : मलंग हाजी मोहम्मद सफी बताते हैं कि जुलूस में शामिल मलंग किसी एक जाति समाज के नही हैं. इनमें हर मजहब और जाति के मलंग शामिल हैं. उन्होंने बताया कि जुलूस में देश के विभिन्न राज्यों से मलंग अलग-अलग काफिले में दिल्ली स्थित महरौली पहुंचते हैं और उसके बाद एक साथ कतारबद्ध होकर अजमेर के लिए रवाना होते हैं. उन्होंने बताया कि दरगाह में सभी मलंगों ने एक जुट होकर देश में अमन चैन भाईचारा और खुशहाली के लिए दुआएँ की.

मलंगों ने दिखाए हैरतअंगेज कारनामे : ख्वाजा के दीवाने मलंगों ने जुलूस के दौरान कई हैरतअंगेज कारनामे दिखाए. किसी ने सारिये से जुबान को छेदा तो किसी ने पतला सरिया गाल के आर पार निकाल लिया. कई ने भारी भरकम नुकिले सारिए को सिर में जोर से घुसाने की कोशिश की. मलंगों के हैरतअंगेज कारनामे देखने के लिए दूर दराज से लोग पहुंचे थे. दरगाह के बाहर मलंगों ने हैरतअंगेज कारनामे पेश कर अपनी अकीदत का नजराना पेश किया. मलंग मुद्दसिर हुसैन साबरी ने बताया कि अपने साथ हर मलंग परचम लेकर आया है जो ख्वाजा की दरगाह में पेश किए.

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स्थानीय लोगों ने किया स्वागत : मलंगों के जुलूस में कई राज्यों से बड़ी संख्या में ढोल वादक भी पंहुचे. ढोल वादकों ने जुलूस में अपने प्रदर्शन से समा बंधे रखा. कई मलंग और लोग भी ढोल की थाप पर नाचते नजर आए. मलंगों का स्थानीय लोगों से भी रिश्ता बन गया है. मलंगों के जुलूस में स्थानीय लोगों ने जगह-जगह चाय नाश्ता, मिल्क रोज, ठंडाई, केसर दूध, मेवे आदि खाद्य सामग्री उन्हें वितरित की.

खुद ही करते हैं व्यवस्था : मलंगों में शामिल लोग अनुशासित रहते हैं. काफिलों के सरदार की मलंग आज्ञा मानते है. जुलूस में कतारबद्ध चलना और जुलूस की व्यवस्था भी उनके ही हाथों में रहती है. मलंग ही जुलूस की व्यवस्था भी संभालते हैं.

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