मंत्री आलमगीर के क्षेत्र का यह अस्पताल खुद है बीमार, लोग इलाज के लिए बेबस और लाचार

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Published : Mar 1, 2020, 1:08 PM IST

मंत्री आलमगीर के क्षेत्र का यह अस्पताल जो खुद है बीमार, लोग इलाज के लिए बेबस और लाचार

झारखंड सरकार में मंत्री आलमगीर आलम के क्षेत्र के लोगों को स्वास्थ्य सुविधा का फायदा नहीं मिल रहा है. यहां के अस्पताल खुद बीमार हैं और क्षेत्र के लोग इलाज के लिए बेबस और लाचार.

पाकुड़: झारखंड सरकार के संसदीय कार्य एवं ग्रामीण विकास मंत्री आलमगीर के क्षेत्र में रह रहे लोगों के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन बेइमानी साबित हो रहा है. ऐसा इसलिए कि यहां अस्पताल खुद बीमार हैं और क्षेत्र के लोग इलाज के लिए बेबस और लाचार.

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मजबूरी में जाना पड़ता है पश्चिमी बंगाल

पाकुड़ के लोगों की बेबसी और लाचारी का अंदाजा इसी से लगता है कि गांव में प्राथमिक उप स्वास्थ्य केंद्र में रहने के बावजूद लोगों को अपना और परिवार का इलाज कराने के लिए झोलाछाप डॉक्टरों के पास जाना पड़ता है. जब स्थिति नहीं सुधरती तो निकटवर्ती पश्चिम बंगाल स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ लेने को मजबूर होना पड़ता है. हेमंत सोरेन सरकार की सूखी झारखंड और स्वस्थ झारखंड के दावे की पोल तब खुल गई जब पहले ही अपने अनुपूरक संसदीय कार्य मंत्री ने स्वास्थ्य विभाग के लिए 47 करोड़ 71 लाख 24 हजार रुपये मात्र का प्रावधान से संबंधित बजट पेश किया. झारखंड सरकार के संसदीय कार्य एवं ग्रामीण विकास मंत्री के अपने विधानसभा क्षेत्र पाकुड़ में नसीपुर पंचायत है. इस पंचायत में अल्पसंख्यक के अलावा आदिवासी ज्यादातर संख्या में है जो मजदूर तबके के हैं. खून और पसीना बहाकर पंचायत के लोग मजदूरी पाते हैं और किसी तरह अपना और परिवार का भरण पोषण करते हैं. यदि इस दौरान पंचायत के किसी भी व्यक्ति की तबीयत खराब हो गई या रोग बीमारी की चपेट में आ गए तो उन्हें पंचायत में लाखों रुपए से बनाए गए प्राथमिक स्वास्थ्य उपकेंद्र मदद नहीं कर पाता.

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प्राथमिक स्वास्थ्य उपकेंद्र का हालत यह है कि बेहतर रखरखाव और इसे क्रियाशील नहीं किए जाने के कारण इसके दरवाजे चौखट तक गायब हो गए. अस्पताल अब खंडहर बन गया है. जिला प्रशासन कहे स्वास्थ्य महकमा या स्वस्थ झारखंड सुखी झारखंड का सपना दिखाने वाले राज्य के रहनुमाओं ने कोई ध्यान नहीं दिया. इसलिए अब तक डॉक्टर तो दूर इस उपकेंद्र में एएनएम तक नहीं पहुंच पायी. लिहाजा पंचायत के लोग आज भी छोटे-मोटे बीमारी का इलाज झोलाछाप डॉक्टरों से कराने को मजबूर है.

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