MP: इस गांव के आदिवासियों ने निकाला बढ़ते LPG गैस के दाम से निजात पाने का गजब फार्मूला

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Published : May 7, 2023, 8:11 PM IST

Updated : May 7, 2023, 10:16 PM IST

Tribal village of Shahdol

शहडोल के इस गांव के लोगों ने बढ़ते रसोई गैस LPG के दामों से छुटकारा पा लिया है. इस गांव के घर-घर में आपको गोबर गैस संयत्र मिल जाएगा, इस गोबर गैस से उन्हें खाना बनाने के लिए ईंधन तो मिल ही रहा है, साथ ही साथ खेती के लिए जैविक खाद भी मिल जाता है और उनके मवेशियों का भी अच्छा इस्तेमाल हो जाता है.

शहडोल आदिवासी गांव हर घर गोबर गैस प्लांट

शहडोल। वैसे देखा जाए तो महंगाई से इन दिनों देश की जनता पूरी तरह से त्रस्त है, हर चीज के दाम बढ़े हुए हैं और घरेलू गैस के दाम तो लगातार बढ़ते ही जा रहे हैं. आज के समय में एक एलपीजी सिलेंडर खरीदने के लिए लोगों को 1126 रुपये चुकाने पड़ते हैं, तब जाकर उन्हें एक घरेलू गैस का सिलेंडर मिल पाता है. तब जाकर उनका खाना बन पाता है, घरेलू गैस के बढ़े हुए दाम ने लोगों के घरों का बजट बिगाड़ दिया है, ऐसे में आज ETV Bharat एक ऐसे आदिवासी गांव के बारे में आपको बताने जा रहा है जहां महंगी गैस से निजात दिलाने का आदिवासियों ने गजब फार्मूला निकाला है.

इस गांव के हर घर में गोबर गैस: शहडोल जिला मुख्यालय से लगभग 12 से 15 किलोमीटर दूर है खेतौली गांव. यह गांव आदिवासी बाहुल्य गांव है, इस गांव की जनसंख्या लगभग हज़ार से 1200 है, लेकिन इस गांव में एक बड़ी ही खास बात है, गांव के घर-घर में आपको गोबर गैस सयंत्र मिल जाएगा और उसका इस्तेमाल करने वाले लोग भी मिल जाएंगे. जिस दौर में एलपीजी सिलेंडर के दाम आसमान छू रहे हैं, ऐसे समय में गोबर गैस का इस्तेमाल कर रहे यह लोग काफी खुश भी हैं. इनका कहना है कि इतना महंगा गैस सिलेंडर कौन भरा पाएगा, इससे अच्छा है कि गोबर गैस में फ्री में वो खाना बनाने के लिए ईंधन भी पा जाते हैं साथ ही जैविक खेती के लिए खाद भी मिल जाता है और इसके लिए कोई बहुत ज्यादा मशक्कत भी नहीं करनी पड़ती है और घर में गोबर गैस तो दशकों से बना ही हुआ है जो बराबर चल ही रहा है.

Shahdol Tribal village every house Gobar gas plant
आदिवासी गांव के हर घर में गोबर गैस प्लांट है

काफी महंगा है एलपीजी सिलेंडर: देखा जाए तो साल दर साल लगातार घरेलू गैस के दाम बढ़ते ही रहे हैं, वर्तमान में एलपीजी सिलेंडर के दाम पर नजर डालें तो 11 सौ से भी ज्यादा रुपए एक सिलेंडर खरीदने के लिए खर्च करने पड़ रहे हैं, मतलब अगर आपको एक सिलेंडर लेना है तो 1126 रुपये देने होंगे, तब जाकर आपको एक एलपीजी घरेलू गैस सिलेंडर मिल पाएगा अब आप अंदाजा लगा सकते हैं कि खाना बनाने के लिए अगर एक गैस सिलेंडर में 1100 सौ से ऊपर खर्च करने पड़ रहे हैं तो फिर घर का बजट कैसे चलेगा घरेलू गैस के बढ़े हुए दाम ने आम लोगों की कमर तोड़ कर रख दी है. ऐसे समय में शहडोल जिले के खेतौली गांव के आदिवासी ग्रामीणों के लिए गोबर गैस एक बड़ा वरदान साबित हो रहा है क्योंकि उन पर आर्थिक बोझ नहीं पड़ रहा है, और वो खाना बनाने के लिए आसानी से गोबर गैस से गैस बनाकर खाना बना रहे हैं और कोई परेशानी भी नहीं हो रही हैं साथ उनका महीने का बजट भी नहीं बिगड़ रहा है.

Shahdol Tribal village every house Gobar gas plant
गोबर गैस से बढ़ते LPG गैस के दाम से निजात

खेतौली गांव की महिलाएं खुश: खेतौली गांव की करिश्मा सिंह जो अपने घर में नई बहू हैं और घर का खाना वही बनाती है, करिश्मा सिंह बताती हैं कि वह गोबर गैस से ही अपने घर में खाना बनाती है और उन्हें कोई भी दिक्कत नहीं आती है ना ही किसी तरह की तकलीफ होती है और जितने समय में घरेलू एलपीजी सिलेंडर से खाना बनता है उतने ही समय में गोबर गैस से बनने वाले गैस से भी खाना बन जाता है क्योंकि इसमें भी उन्हें किसी भी तरह की कोई तकलीफ नहीं होती है करिश्मा सिंह कहती हैं कि इतना महंगा गैस भरा कर महीने का बजट कौन बिगड़ेगा.

Shahdol Tribal village every house Gobar gas plant
गोबर गैस प्लांट से बढ़ते LPG गैस के दाम से निजात

खतौली गांव की दूसरी आदिवासी महिला कौशल्या सिंह के घर जब हम पहुंचे तो उन्होंने बताया कि उनके घर में पूरा खाना गोबर गैस से ही बनता है, लगभग एक दशक से घर में गोबर गैस का इस्तेमाल हो रहा है, कौशल्या सिंह बताती है कि वह इसी गोबर गैस से घर में तीन समय का खाना बनाती है दाल चावल सब्जी रोटी सब कुछ बनाते हैं लेकिन कभी भी उन्हें गैस की कमी नहीं हुई कौशल्या सिंह कहती हैं कि वही बस गोबर गैस से खाना नहीं बनाती बल्कि उनके गांव में लगभग हर घर में लोग गोबर गैस का इस्तेमाल करते हैं क्योंकि इस गांव में घर-घर आपको गोबर गैस मिल जाएगा, कौशल्या सिंह कहती हैं कि इतना महंगा गैस कौन भराएगा एलपीजी सिलेंडर 11 सौ 12 सौ के बीच में मिल रहा है इतना पैसा कहां से आएगा कौशल्या सिंह बताती है कि वो आदिवासी किसान हैं उनके पास इतना बजट नहीं रहता है कि वो लोग इतना महंगा गैस नहीं भरा पाएंगे, इसलिए उनके लिए गोबर गैस सबसे बेस्ट है क्योंकि इससे गैस बनाने के लिए जो कुछ भी चाहिए वह उनके यहां सब कुछ है और इसमें ज्यादा मेहनत भी नहीं करनी पड़ती है.

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आसानी से बनता है गैस: इंद्रजीत कुशवाहा जो कि खेतौली गांव के ही रहने वाले हैं उनके घर में भी कई सालों से गोबर गैस लगा हुआ है, और आज भी वह गोबर गैस का इस्तेमाल करते हैं, इंद्रजीत कुशवाहा बताते हैं कि उनके घर में 7 से 8 लोगों का खाना बनता है, और गोबर गैस से ही बनता है, वो बताते हैं कि गोबर से गैस बनाने के लिए अगर आपके यहां प्लांट लगा हुआ है तो बड़ी आसानी से बनाया जा सकता है इसमें ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ती है, आपके घर में गोबर तो होता ही होगा उसे लेकर के जो प्लांट बना हुआ है उसकी टंकी में डालना होता है और पानी से बस घोलना होता है और फिर क्या अपने आप उसमें गैस जनरेट होने लग जाएगी और वह पाइप के माध्यम से आपके किचन तक पहुंच जाएगी इसमें ज्यादा कुछ मेहनत नहीं करना पड़ता ना ही ज्यादा समय लगता है.

Shahdol Tribal village every house Gobar gas plant
गोबर गैस प्लांट
आदिवासी किसानों के समृद्धि में भी अहम रोल: पूर्व कृषि विस्तार अधिकारी अखिलेश नामदेव जो पिछले कई सालों से इस क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे चुके हैं वह बताते हैं की खेतौली एक आदिवासी बाहुल्य गांव है और यहां पर लगभग लगभग हर घर में गोबर गैस संयंत्र लगा हुआ है, और ये लोग उसका उपयोग भी बखूबी करते हैं, सबसे अच्छी बात ये हैं कि ये गोबर गैस संयंत्र 10 साल से भी ज्यादा समय से लगे हुए हैं, और लोगों ने आज भी इसको मेंटेन करके रखा हुआ है, यहां का आदिवासी किसान खाना बनाने के लिए इसका उपयोग तो करता ही है, साथ ही किसानों के लिए इसकी सबसे बड़ी उपयोगिता यह है इससे जो निकलने वाली सैलरी है उसका उपयोग वह जैविक खाद के रूप में करता है जिसमें से उनके जमीनों की उर्वरा शक्ति भी बढ़ती है जैविक खेती के रूप में इसका उत्पादन गुणवत्तापूर्ण प्राप्त होता है और बेहतर उत्पादन प्राप्त होता है, इस प्रक्रिया में गोबर 2 तरह से गोबर गैस के लिए काम करता है, एक तो गैस खाना बनाने के काम में आता है, दूसरा सैलरी खाद के काम में आती है, आज के युग में महंगाई इतनी ज्यादा बढ़ती जा रही है एक गैस सिलेंडर खरीदने में 1100 से भी ज्यादा पैसे खर्च करने पड़ते हैं यहां किसानों की स्थिति इतनी अच्छी नहीं है, क्योंकि यहां के ज्यादातर किसान आदिवासी हैं, इसलिए वो गोबर गैस के ऊपर ही अपनी निर्भरता रखते हैं उनके पास जो मवेशी हैं उनसे उन्हें गोबर मिल जाता है, और उसी गोबर का इस्तेमाल वो गोबर गैस में करते हैं वह घर में गैस बनाते हैं उसे इस्तेमाल करते हैं.
Shahdol Tribal village every house Gobar gas plant
एमपी के इस गांव के हर घर में गोबर गैस
यहां पर पहले बहुत गरीबी थी उस समय उनकी आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं थी उसमें शासन की योजना थी गोबर गैस संयंत्र लगाने की, जिससे इन किसानों की निर्भरता बाजार से कम होकर के घर पर ज्यादा रहे, खेती तो करते ही हैं जिससे गोबर से जो गैस निकलता है उसका खाना भी बन जाता है और डीपी यूरिया का उपयोग ना करके ये किसान खेतों पर गोबर गैस की सैलरी का ही इस्तेमाल करते हैं और इससे इनका उत्पादन भी बेहतर होता है, और उनके पैसे भी बचते हैं, गैस का खाद का सबका पैसा बचता है और भी और गैस सिलेंडर भी नहीं भराना पड़ता है,तो उसके भी पैसे बचते हैं जिससे इनकी आर्थिक स्थितियों में भी सुधार होता जा रहा है, देखा जाए तो गोबर गैस संयंत्र यहां लगे हैं, इस गांव के लोगों ने इसका उपयोग भी किया और आगे भी बढ़ रहे हैं, निश्चित रूप से गोबर गैस हमारे क्षेत्र के किसानों के लिए खासकर आदिवासी किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है.गोबर गैस संयंत्र लगाना भी है आसान: एक्सपर्ट्स की मानें तो गोबर गैस संयंत्र लगाने के लिए ज्यादा खर्च नहीं आता है, 15 से 16 हज़ार रुपये में ही एक गोबर गैस संयंत्र तैयार हो जाता है और मध्यप्रदेश शासन के योजना के माध्यम से अगर बनवाते हैं तो उसमें सब्सिडी भी मिलती है और फिर गोबर गैस संयंत्र बनवाने में और भी कम पैसे लगते हैं. बहरहाल खेतौली गांव के इन आदिवासी किसानों ने एलपीजी घरेलू गैस सिलेंडर के महंगाई के इस दौर में गोबर गैस संयंत्र का जिस तरह से इस्तेमाल किया है, वो वाकई काबिले तारीफ है इस गांव के आदिवासी किसान लोगों के लिए एक रोल मॉडल हैं.

गौरतलब है एक ओर जहां इन दिनों आपको सड़कों पर लावारिस मवेशी आवारा मवेशी मिल जाएंगे जिनके कोई मालिक ही नहीं है. पहले ये स्थिति शहरों पर ही देखने को मिलती थी, इन दिनों अब गांव में भी देखने को मिलती है लेकिन .अगर इस तरह के प्रयोग गांव-गांव में किए जाएं, एलपीजी घरेलू गैस सिलेंडर की महंगाई से निजात पाने के लिए अगर और गांवों में भी गोबर गैस संयत्र बनाए जाएं, और गैस सिलेंडर से निर्भरता लोगों की कम की जाए तो इससे कई फायदे भी हो सकते हैं एक तो जो मवेशी सड़कों पर बैठे रहते हैं जिनके कोई मालिक ही नहीं है उनका भी एक अच्छा उपयोग होगा साथ ही जैविक खेती के लिए जिस ओर शासन प्रशासन आगे बढ़ रही है और लोगों को प्रोत्साहित कर रही है उसमें भी एक बड़ा योगदान होगा.

Last Updated :May 7, 2023, 10:16 PM IST
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