Rajasthan High Court : अजमेर दरगाह विवाद में लंबित दावे में परमार को पक्षकार बनाने का आदेश क्यों ना कर दें निरस्त ?
याचिका में कहा गया कि मूल मुकदमा नवंबर 2024 में दायर किया गया था और परमार ने अचानक पक्षकार बनने का प्रार्थना पेश किया.

Published : July 29, 2026 at 8:49 PM IST
जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने महाराणा प्रताप सेना के अध्यक्ष डॉ. राजवर्धन सिंह परमार से पूछा है कि अजमेर दरगाह विवाद में लंबित दावे में उन्हें पक्षकार बनाने के संबंध में निचली अदालत की ओर से दिए आदेश को क्यों ना रद्द कर दिया जाए. जस्टिस सुदेश बंसल की एकलपीठ ने यह आदेश मोइनिया फखरिया चिश्तिया खुद्दाम ख्वाजा साहिब संस्था की ओर से दायर याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई करते हुए दिए.
याचिका में अधिवक्ता आशीष कुमार सिंह ने अदालत को बताया कि अजमेर दरगाह के स्थान पर प्राचीन शिव मंदिर होने का दावा करते हुए वहां की निचली अदालत में एक सिविल दावा लंबित चल रहा है. उस दावे में डॉ. राजवर्धन सिंह परमार ने प्रार्थना पत्र पेश कर सह वादी बनने की गुहार की थी. इस प्रार्थना पत्र को निचली अदालत ने गत 15 जनवरी को स्वीकार कर उन्हें सह वादी बना लिया, जबकि वह महाराणा प्रताप सेना के अध्यक्ष हैं और राजनीतिक कारणों और अपने प्रचार के लिए वाद में पक्षकार बने हैं.
याचिका में यह भी कहा गया कि मूल मुकदमा नवंबर 2024 में दायर किया गया था और परमार ने 14 माह तक इंतजार करने के बाद अचानक पक्षकार बनने का प्रार्थना पत्र पेश किया. इसके अलावा निचली अदालत के समक्ष कुछ अन्य प्रार्थना पत्र भी पेश हुए थे, जिन्हें अदालत ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि महज आस्था, धार्मिक जुड़ाव या रूचि के किसी का सीधा कानूनी अधिकार नहीं बनता है.
अदालत ने प्रार्थना पत्र दायर करने वालों पर तीस हजार रुपए का हर्जाना भी लगाया था. वहीं, निचली अदालत ने इन कानूनी मानको को छोड़कर परमार को सह वादी बना लिया. ऐसे में निचली अदालत के आदेश को रद्द किया जाए. जिस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने परमार को नोटिस जारी कर जवाब तलब किया है.

