पति शब्द का दायरा वैध शादी तक ही सीमित नहीं, किसी अन्य महिला के साथ वैवाहिक संबंध में क्रूरता पर भी मुकदमा, HC की बड़ी व्यवस्था
हिमाचल हाईकोर्ट ने कहा किसी अन्य महिला के साथ वैवाहिक संबंध में क्रूरता करने पर दर्ज किया जा सकता है मुकदमा

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : September 21, 2026 at 10:08 PM IST
शिमला: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने आपसी संबंधों की संवेदनशीलता और महिला-पुरुष के बीच नाजुक रिश्तों को लेकर एक बड़ी व्यवस्था दी है. हाईकोर्ट ने एक मामले में अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी व्यवस्था देते हुए कहा कि पति शब्द का दायरा केवल वैध रूप से हुई शादी तक ही सीमित नहीं है. यदि कोई व्यक्ति वैध प्रावधानों के खिलाफ जाकर किसी अन्य महिला के साथ एक तरह के वैवाहिक संबंध में रहकर क्रूरता करता है तो उसके खिलाफ भी 498-ए के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है.
उल्लेखनीय है कि बीएनएस की उक्त धारा पति या ससुराल पक्ष की तरफ से विवाहित महिला के साथ क्रूरता से जुड़ी है. ऐसे ही एक मामले में हिमाचल हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि कि भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए (विवाहित महिला के साथ क्रूरता) के तहत पति शब्द का अर्थ केवल कानूनी रूप से वैध शादी तक ही सीमित नहीं है.
अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति पति होने का दिखावा या दावा करके किसी अन्य महिला के साथ वैवाहिक संबंध में रहकर उसके साथ क्रूरता करता है, तो शादी की वैधता पर विवाद होने के बावजूद उस पर धारा 498-ए के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है. हिमाचल हाईकोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति राकेश कैंथला ने इस संदर्भ में अदालत के समक्ष आए मामले में याचिकाकर्ता की याचिका को खारिज कर दिया. मामले में याचिकाकर्ता व्यक्ति ने अपने खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की थी.
मामले के अनुसार पांच साल पहले याचिकाकर्ता के खिलाफ महिला पुलिस थाना नाहन में धारा 498-ए के तहत एफआईआर दर्ज की गई थी. मामले में पीड़िता (शिकायतकर्ता) का आरोप था कि दोनों की शादी जनवरी 2017 में हिंदू रीति-रिवाजों से नाहन के एक मंदिर में हुई थी. दोनों ही की यह दूसरी शादी थी. पीड़िता ने आरोप लगाया कि शादी के बाद उसे लगातार मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताडि़त किया गया. शिकायतकर्ता का आरोप था कि व्यक्ति ने उसका धन रख लिया गया और कथित तौर पर उसका जबरन गर्भपात भी कराया गया.
याचिकाकर्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 202& के तहत हाईकोर्ट का रुख किया और इस आधार पर एफआईआर रद्द करने की मांग की कि दोनों के बीच कोई वैध विवाह नहीं हुआ था, इसलिए धारा 498-ए लागू ही नहीं होती. सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि महिला प्रताड़ना और दहेज जैसी सामाजिक बुराइयों को रोकने के लिए बनाए गए कानूनों की व्याख्या व्यापक होनी चाहिए, न कि अत्यधिक तकनीकी. कोई भी व्यक्ति किसी महिला को वैवाहिक प्रताड़ना देने के बाद इस तकनीकी आधार के पीछे नहीं छिप सकता कि उनकी शादी कानूनी रूप से वैध नहीं थी.
हाईकोर्ट ने इस पर अहम व्यवस्था देते हुए कहा कि वैध प्रावधानों के न होने पर भी महिला के साथ विवाहिक संबंधों की तरह रहते हुए उसके साथ क्रूरता नहीं की जा सकती है. ऐसे में कानून की धारा 498-ए के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है. इसी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने व्यक्ति की याचिका खारिज कर दी.
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