लुप्त हो रही राजस्थान की ये विधा, मशक वाद्य यंत्र की अनोखी कहानी, आज कलाकार पहचान के मोहताज
पश्चिमी राजस्थान के अनोखे वाद्य यंत्र के बारे में जानिए, जो अब लुप्त होती नजर आ रही है...

Published : January 18, 2026 at 6:35 AM IST
बीकानेर : राजस्थान के हर जिले, हर गांव की अपनी एक कहानी है. यहां के लोक कलाकार, संस्कृति, पहनावा और व्यंजन सब अपने आप में न सिर्फ अनूठा है बल्कि हर देसी और विदेशी सैलानी को भी आकर्षित करता है. आज बात करते हैं राजस्थान के खासतौर से पश्चिमी राजस्थान के बीकानेर और श्रीगंगानगर जिले के उस विधा और वाद्ययंत्र की जो अब लुप्त होती नजर आ रही है.
मशक, बीन, बैगपाइपर से प्रसिद्ध : राजस्थान में होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम या विवाह समारोह पंडाल में प्रवेश करते ही अलग से वाद्य यंत्र की आवाज कानों में पड़ती है. स्थानीय भाषा में इस वाद्य यंत्र को बीन भी कहते हैं. चमड़े और खास लकड़ी की पाइप से बने और मछली की आकृति के कपड़े की थैली सा दिखने वाला यह खास वाद्य यंत्र मशक है. बिना किसी बिजली के कनेक्शन के केवल अपनी सांसों के सहारे कलाकार इसे बजाते हैं और सुरीली धुन सुनने को मिलती है. अंग्रेजी में इसको बैगपाइपर कहते हैं.
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कब शुरुआत हुई पता नहीं : पिछले 25-30 सालों से मशक बाजा रहे कलाकार नारायण राम कहते हैं कि यह कब इजाद हुआ, कब से बज रहा है, इस बात की जानकारी नहीं. उन्होंने कहा कि वो गांव में बकरियां चराते-चराते इसको बजाने लग गए थे. खुद ही बजाना सीखा और तब से लगातार आज तक बजा रहे हैं और कई बड़े कार्यक्रमों में भी इसका प्रदर्शन किया है. नारायणराम कहते हैं कि वाद्य यंत्र और इस विधा को आज भी पहचान की दरकार है. कई बार सरकारी और दूसरे बड़े आयोजनों में लोग बुलाते हैं क्योंकि वे इसका महत्व समझते हैं, लेकिन सरकारी स्तर पर हमें प्रोत्साहन और पहचान दोनों ही नहीं मिली.

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सरकारी उदासीनता का दर्द : मशक कलाकार हेमंत कहते हैं कि उनके पिता ये वाद्य यंत्र बजाया करते थे. उन्होंने अपने पिता से सीखा और अब वो खुद बजा रहे हैं. जीवन यापन का जरिया यही है, इसीलिए दूसरे किसी काम में रुचि नहीं है, लेकिन आने वाली पीढ़ी इसको लेकर ज्यादा उत्साहित नहीं है. अगली पीढ़ी पूरी तरह से इस विधा से दूर हो गई है. इसका एक बड़ा कारण सरकारी स्तर पर उदासीनता ही है.


