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SC ने SASTRA विश्वविद्यालय जमीन विवाद में तमिलनाडु से कहा, रिसॉर्ट या मॉल होता तो उसे निकाल देते, यह एक यूनिवर्सिटी है

पीठ ने यह स्पष्ट किया कि वह विश्वविद्यालय के कदाचार को माफ नहीं कर रही है, बल्कि राज्य के आचरण का मूल्यांकन कर रही है.

SUPREME COURT TN GOVERNMENT
सुप्रीम कोर्ट (ANI)
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By Sumit Saxena

Published : September 22, 2026 at 8:28 AM IST

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नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को यह देखते हुए कि SASTRA यूनिवर्सिटी ने जिस सरकारी जमीन पर कथित तौर पर कब्जा किया है, उसका इस्तेमाल एक एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन बनाने के लिए किया गया है – तमिलनाडु से यह पता लगाने को कहा कि क्या विवादित जमीन के बदले दूसरी जमीन ली जा सकती है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसका मकसद गलत काम को माफ करना नहीं था, बल्कि एक बैलेंस बनाना था. अगर जमीन पर कोई रिजॉर्ट, मॉल या गैर-कानूनी काम होता, तो अधिकारी कब्जा करने वालों को निकाल देते, फिर भी यूनिवर्सिटी का एकेडमिक इस्तेमाल और पब्लिक सर्विस एक सोचे-समझे उपाय के पक्ष में थे.

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची और वी मोहना की बेंच मद्रास हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ यूनिवर्सिटी की याचिका पर सुनवाई कर रही थी. हाईकोर्ट ने जेल बनाने के लिए दूसरी जमीन के ऑफर को सरकार के मना करने और बाद में तंजावुर के तहसीलदार द्वारा जारी बेदखली नोटिस को चुनौती देने वाली उसकी याचिका खारिज कर दी. इस साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी.

बेंच ने साफ किया कि वह यूनिवर्सिटी के गलत काम को माफ नहीं कर रही है, बल्कि राज्य के व्यवहार का मूल्यांकन कर रही है. सीजेआई ने कहा कि अगर कोई वहां रिसॉर्ट, कमर्शियल कॉम्प्लेक्स या शॉपिंग मॉल चला रहा होता, या वहां गलत या गैर-कानूनी काम कर रहा होता, तो कोर्ट उन्हें बाहर निकाल देता.

उन्होंने आगे कहा कि अगर जमीन का इस्तेमाल कोई यूनिवर्सिटी पढ़ाई के मकसद से कर रही है, राज्य में अच्छी शिक्षा दे रही है, तो जजों के दिमाग में बस यही बात चल रही है. बेंच ने कहा कि वह कुछ ऐसा सोच रही है जिससे सभी को एक बहुत कड़ा मैसेज जाएगा और साथ ही, यह एक इंस्टीट्यूट को बचाएगा क्योंकि वह जनता की सेवा कर रहा है.

बेंच ने राज्य की उन्हें निकालने की मांग को 'अड़ियल' बताया और उससे ओपन जेल प्रोजेक्ट बनाने के लिए दूसरी जमीन का ऑफर मानने को कहा. बेंच ने राज्य से यह भी सवाल किया कि वह 1985 से ओपन-एयर जेल प्रोजेक्ट को सिर्फ इसलिए लागू नहीं कर पाया क्योंकि प्रोजेक्ट के लिए तय जमीन मुकदमे में उलझ गई थी.

SASTRA की तरफ से सीनियर वकील सीएस वैद्यनाथन ने कहा कि उनके क्लाइंट ने राज्य को 3 दूसरी जमीनें ऑफर की थी, लेकिन उन्हें कोई असरदार जवाब नहीं मिला. तमिलनाडु सरकार की तरफ से सीनियर वकील राकेश द्विवेदी ने इस बात पर जोर दिया कि जो दूसरी जमीनें दी जा रही है, वे ठीक नहीं है.

बेंच ने सुझाव दिया कि अगर दूसरी जमीनें मंजूर नहीं है, तो राज्य सरकार बदले में उस जमीन की मार्केट वैल्यू लेने पर विचार कर सकती है. बेंच ने कहा, 'अगर मार्केट प्राइस आपको मिलता है, तो आप अपनी पसंद की जमीन खरीद लें. या आप जमीन की पहचान करें, हम उन्हें आपके लिए जमीन खरीदने के लिए कहेंगे.'

बेंच ने आगे सवाल किया कि तमिलनाडु समेत कितने राज्यों ने राइट टू एजुकेशन एक्ट के तहत अपनी जिम्मेदारियों को पूरा किया है. एक वकील ने कहा कि तमिलनाडु हर साल स्कूली शिक्षा पर 45000 करोड़ रुपये खर्च करता है और सबसे ऊपर है. बेंच ने कहा, 'तो क्या हमें यह मान लेना चाहिए कि तमिलनाडु राज्य में एजुकेशन इंस्टीट्यूशन सरप्लस में है और इसके बच्चों, युवा पीढ़ी को अच्छी क्वालिटी की शिक्षा की जरूरत नहीं है?'

बेंच ने कहा कि किसी भी समाधान से यह पक्का होना चाहिए कि तमिलनाडु को एक पैसा या एक इंच भी जमीन का नुकसान न हो. राज्य ने जोर देकर कहा कि इस तरह के इंतजाम को मानने से असल में अतिक्रमण को बढ़ावा मिलेगा.

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