उत्तर प्रदेश

uttar pradesh

ETV Bharat / state

IIT कानपुर और NCRA पुणे के वैज्ञानिकों की बड़ी उपलब्धि; तारों की दूरी-गति मापना आसान

IIT कानपुर के सीनियर प्रोफेसर पंकज जैन ने बताया कि तारों की सही दूरी मापना खगोल विज्ञान की सबसे बड़ी चुनौती था.

तारों की दूरी-गति मापना आसान.
तारों की दूरी-गति मापना आसान. (Photo Credit: ETV Bharat)

By ETV Bharat Uttar Pradesh Team

Published : February 26, 2026 at 8:06 AM IST

कानपुर:IIT कानपुर और NCRA पुणे के वैज्ञानिकों ने तारों की दूरी और गति मापने का नया तरीका खोज निकाला है. भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) कानपुर के भौतिकी विभाग, स्पेस, प्लैनेटरी एंड एस्ट्रोनॉमिकल साइंसेज एंड इंजीनियरिंग (SPASE) इकाई और नेशनल सेंटर फॉर रेडियो एस्ट्रोफिजिक्स (NCRA) पुणे के खगोल वैज्ञानिकों ने आवधिक रेडियो तरंगें उत्सर्जित करने वाले तारों-जैसे पल्सर की दूरी मापने का नया और प्रभावी तरीका विकसित किया है.

यह शोध 'प्रोबिंग द मॉर्फोलॉजी ऑफ द गम नेबुला यूजिंग पल्सर ऑब्जर्वेबल्स एंड ए नॉवेल डिस्टेंस एस्टीमेशन मेथड' शीर्षक से ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस द्वारा प्रकाशित जर्नल 'मंथली नोटिसेस ऑफ द रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी' में प्रकाशित हुआ है. इस अध्ययन को डॉ. आशीष कुमार (वर्तमान में NCRA पुणे), प्रो. अविनाश ए. देशपांडे (एक्स. RRI बेंगलुरु) और प्रो. पंकज जैन (IIT कानपुर) ने संयुक्त रूप से पूरा किया है.

IIT कानपुर के सीनियर प्रोफेसर पंकज जैन. (Video Credit: IIT Kanpur)

अब आसान होगी प्रक्रिया: IIT कानपुर के सीनियर प्रोफेसर पंकज जैन ने बताया कि तारों की सही दूरी मापना खगोल विज्ञान की सबसे बड़ी चुनौतियों में से अभी तक एक था. आकाश में किसी तारे की दिशा ज्ञात करना अपेक्षाकृत सरल है, लेकिन उसकी वास्तविक दूरी निर्धारित करना कठिन होता था.

हालांकि दूरी मापने का सबसे विश्वसनीय तरीका त्रिकोणमितीय पैरालैक्स है. यह केवल निकटवर्ती तारों पर ही प्रभावी रूप से लागू होता है. अन्य विधियों, जैसे न्यूट्रल हाइड्रोजन आधारित तकनीकों में त्रुटि की संभावना अधिक रहती है.

ऐसी स्थिति में शोध टीम द्वारा विकसित नई विधि पल्सर से प्राप्त रेडियो तरंगों पर अंतरिक्ष में पड़ने वाले दो प्रमुख प्रभावों के संयुक्त विश्लेषण पर आधारित है. इसमें पहला विक्षेपण माप और दूसरा प्रकीर्णन जनित विस्तार यानी स्कैटर ब्राडनिंग है.

उन्होंने कहा कि अंतरिक्ष पूर्णतः रिक्त नहीं है. उसमें कम घनत्व वाले कण और मुक्त इलेक्ट्रॉनों का वितरण होता है, जिसे अंतरतारकीय माध्यम कहा जाता है. यही माध्यम रेडियो तरंगों के प्रसार को प्रभावित करता है.

गम नेबुला में किया परीक्षण:IIT कानपुर के प्रोफेसर पंकज जैन ने बताया कि शोधकर्ताओं ने इस तकनीक को हमारी आकाशगंगा के दक्षिणी भाग में स्थित विशाल गैसीय क्षेत्र गम नीहारिका (गम नेबुला) की दिशा में मौजूद पल्सरों पर लागू कर इसकी उपयोगिता प्रदर्शित की है.

उन्होंने दावा किया कि अभी तक जो आंकड़े सभी के सामने थे, उसके मुताबिक वेला पल्सर गम नेबुला के बाहर प्रदर्शित था. IIT कानपुर और NCRA पुणे द्वारा विकसित तकनीक के क्रियान्वयन पर वह गम नेबुला के अंदर दिखा है.

इसी तरह इस तकनीक से हम तारों की रफ्तार का आंकलन कर सकते हैं. एक थ्योरी है, जिसमें कहा गया तारों की गति बहुत अधिक होती है. अब, तारों की गति का अंदाजा भी आसानी से लगाया जा सकेगा.

यह भी पढ़ें: योगी सरकार ने दिया यूपी के कर्मचारियों-पेंशनधारकों को होली का गिफ़्ट, फरवरी की सैलरी और पेंशन 28 को मिलेगी