उत्तरकाशी के धराली महाविनाश से महासबक की जरूरत, जानिए पर्वतीय विकास में जलवायु जोखिमों को शामिल करना जरूरी क्यों
उत्तराखंड के उत्तरकाशी के धराली महाविनाश से सबक की आवश्यकता है. भारत में पर्वतीय विकास में जलवायु जोखिमों को शामिल करना बेहद जरूरी है.
By Aparna Roy
Published : August 18, 2025 at 3:43 PM IST
नई दिल्ली: उत्तराखंड के उत्तरकाशी में हाल ही में आई अचानक बाढ़, हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित विकास की दोहरी शक्तियों के प्रति संवेदनशीलता की याद दिलाता है. 5 अगस्त 2025 को, खीर गंगा नदी के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में बादल फटने से धराली गांव में पानी और मलबे का एक बड़ा प्रवाह आया, जो घरों, होटलों और दुकानों को बहाकर ले गया.
4 की मौत कई लापता: इस तबाही में कम से कम 4 लोगों की मौत हो गई और कई लोग लापता हो गए. हर्षिल को जोड़ने वाली सड़कें घाटी ढह गई. इससे पूरा समुदाय फंस गया और बचाव अभियान ठप हो गया.
गौर करें तो इस तरह का दंश झेलने वाला उत्तरकाशी अकेला नहीं है. साल 2013 में केदारनाथ से लेकर 2021 में चमोली तक, हिमालयी क्षेत्र ने लगातार आपदाएं देखी हैं, इनमें से प्रत्येक पिछली आपदा से भी अधिक विनाशकारी रही है.
अत्यधिक वर्षा या हिमनद से हो रही हैं घटनाएं:चौंकाने वाली बात यह नहीं है कि ये आपदाएं घटित हो रही हैं, बल्कि यह है कि ये बिल्कुल एक ही तरह से घटित हो रही हैं. ये घटनाएं अत्यधिक वर्षा या हिमनद गतिविधि से उत्पन्न होती हैं. नाजुक पारिस्थितिकी तंत्रों द्वारा बढ़ाई गई होती है. साथ ही पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण द्वारा विनाशकारी बन गई हैं. ऐसे में जब तक भारत, जलवायु संबंधी चिंताओं को अपने पर्वतीय विकास एजेंडे में तत्काल शामिल नहीं करता, हिमालय एक त्रासदी से दूसरी त्रासदी की ओर बढ़ता रहेगा.
भारत में आपदा की घटनाएं बढ़ीं:हिमालयी राज्यों के लिए अत्यधिक वर्षा की घटनाएं अब असामान्य नहीं रहीं. नेचर कम्युनिकेशंस के एक अध्ययन से पता चलता है कि भारत में ऐसी घटनाओं में तीन गुना वृद्धि हुई है. 1901 और 2015 के बीच, जिसमें उत्तराखंड सबसे ज़्यादा प्रभावित राज्यों में से एक है.
जलवायु वैज्ञानिक चेतावनी देते हैं कि गर्म होता अरब सागर नमी से भरी मानसूनी हवाओं को बढ़ावा दे रहा है, जो अब हिमालयी स्थलाकृति से टकरा कर तीव्र वर्षा के छोटे-छोटे झोंके पैदा कर रही है. हिमालय स्वयं वैश्विक औसत से दोगुनी तेजी से गर्म हो रहा है, जिससे हिमनदों का पिघलना तेज हो रहा है और ढलान अस्थिर हो रहे हैं. भारी वर्षा और तेजी से पिघलने का संयुक्त प्रभाव लगातार भूस्खलन, बाढ़ और हिमनद झीलों के फटने से होने वाली बाढ़ का कारण बन रहा है.
फिर भी, सावधानी बरतने के बजाय, इस क्षेत्र ने बुनियादी ढांचे पर आधारित विकास को दोगुना कर दिया है. उत्तरकाशी भागीरथी पारिस्थितिक-संवेदनशील क्षेत्र (ESZ) के अंतर्गत आता है, जो 4,157 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र है, जिसे 2012 में नाज़ुक पारिस्थितिक तंत्रों की रक्षा के लिए अधिसूचित किया गया था.
ESZ भारी निर्माण, खनन और प्राकृतिक जल निकासी को प्रभावित करने वाली गतिविधियों पर कड़े प्रतिबंध लगाता है. हालांकि, व्यवहार में, नियमों का खुलेआम उल्लंघन किया गया है. नदी के किनारों पर बहुमंजिला होटल और रेस्टोरेंट उग आए हैं, अस्थिर ढलानों पर सड़कें बनाई जा रही हैं, और विशेषज्ञों की बार-बार की चेतावनियों के बावजूद जलविद्युत परियोजनाओं की योजना बनाई जा रही है.
व्यावसायिक हित सुरक्षा पर भारी: धराली बाढ़ ने एक बार फिर उजागर किया है कि कैसे व्यावसायिक हित और अल्पकालिक लाभ पारिस्थितिक सुरक्षा पर हावी हो जाते हैं, जिससे मौसम की चरम स्थितियों को आपदाओं में बदल दिया जाता है.
केदारनाथ बाढ़ में 6,000 से अधिक लोग मरे:आर्थिक और मानवीय लागतें चौंका देने वाली हैं. 2013 केदारनाथ बाढ़ में 6,000 से ज़्यादा लोग मारे गए थे और ₹7,000 करोड़ से ज़्यादा का नुकसान हुआ था, जिसका एक बड़ा हिस्सा बुनियादी ढांचे के विनाश के कारण हुआ था.
चमोली ग्लेशियर आपदा में बह गए थे 200 मजदूर:साल 2021 में चमोली ग्लेशियर आपदा ने दो जलविद्युत परियोजनाओं को तबाह कर दिया. इसमें 200 से ज़्यादा मज़दूर मारे गए. इसका साथ ही ₹1,500 करोड़ का नुकसान हुआ था.
उत्तरकाशी में, नुकसान का आकलन अब भी किया जा रहा है, लेकिन धराली में सड़कों, होटलों और घरों का विनाश उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में निवेश के कमजोर प्रतिफल को दर्शाता है.
भारत को हो रहा है हरेक साल 87 अरब डॉलर का नुकसान:विश्व बैंक के मुताबिक, जलवायु संबंधी आपदाओं से भारत को पहले ही अनुमानित 87 अरब डॉलर प्रति वर्ष का नुकसान हो रहा है. यह आंकड़ा तेजी से बढ़ेगा, जब तक कि पर्वतीय विकास की दिशा नहीं बदली जाती.
गौर करने वाली बात ये है कि भारत की नीतिगत संरचना इन जोखिमों को आत्मसात करने में विफल रही है. जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्य योजना (एनएपीसीसी) और राज्य-स्तरीय जलवायु कार्य योजनाएं अनुकूलन पर जोर देती हैं, फिर भी विकास परियोजनाओं में इनका समावेश काफी हद तक औपचारिक रहा है.
उत्तराखंड में बुनियादी ढांचा परियोजनाएं अक्सर पुराने पर्यावरणीय प्रभाव आकलनों पर निर्भर करती हैं, जो नई जलवायु वास्तविकताओं को ध्यान में नहीं रखते. इसके अलावा, आपदा प्रबंधन प्रतिक्रियात्मक बना हुआ है.
घटना के बाद राहत और पुनर्निर्माण पर केंद्रित होना चाहिए, न कि निवारक, जिसका अर्थ होगा योजना, डिजाइन और अनुमोदन चरणों में जलवायु जोखिम आकलन को एकीकृत करना. साथ ही इस प्रशासनिक कमी को तत्काल पाटना होगा.
ईएसजेड नियमों को सख्ती से लागू करने की जरूरत:सबसे पहले, ईएसजेड नियमों को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए. स्वतंत्र निगरानी के साथ यह सुनिश्चित करना होगा कि नदी के बाढ़ के मैदान और अस्थिर ढलान स्थायी संरचनाओं से मुक्त रहें.
दूसरा,हर बड़ी परियोजना, सड़क चौड़ीकरण, जलविद्युत, होटल का जलवायु और भू-खतरा ऑडिट होना चाहिए. ऐसा इसलिए ताकि ये अत्यधिक वर्षा, भूस्खलन और हिमनदों के पिघलने से होने वाले जोखिमों को पूरी तरह से डेटाबद्ध कर सके. इसके अलावा इन्हें अनिवार्य और सार्वजनिक रूप से प्रकट किया जाना चाहिए, न कि अनुपालन चेकबॉक्स के रूप में मान लिया जाना चाहिए.
जोखिम पूर्वानुमान और पूर्व चेतावनी प्रणालियों में निवेश करना होगा: जोखिम पूर्वानुमान और पूर्व चेतावनी प्रणालियों में निवेश भी उतना ही महत्वपूर्ण है. हिमालय में भारतीय मौसम विभाग (IMD) का डॉप्लर रडार कवरेज अब भी कम है. रडार नेटवर्क का विस्तार, रीयल-टाइम नदी सेंसर लगाना और अंतिम-मील संचार प्रणालियों का निर्माण समुदायों को महत्वपूर्ण समय प्रदान करके जीवन बचाएगा.
इसरो और राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र जैसे संस्थानों में उच्च-रिज़ॉल्यूशन जोखिम मानचित्र तैयार करने की क्षमता है, लेकिन इन्हें अकादमिक रिपोर्टों तक सीमित न रखकर स्थानीय नियोजन में मुख्यधारा में शामिल किया जाना चाहिए.
इस बदलाव के केंद्र में सामुदायिक लचीलापन होना चाहिए. उत्तरकाशी में, संवेदनशील गांव अक्सर खुद को नदियों और ढलानों के किनारे उच्च-जोखिम वाले क्षेत्रों में पाते हैं. अध्ययनों से पता चलता है कि पुनर्वास, हालांकि राजनीतिक रूप से कठिन है, बार-बार होने वाले नुकसान को कम करने के लिए आवश्यक है.
साथ ही सामाजिक स्वीकृति सुनिश्चित करने के लिए मुआवजा पैकेज और आजीविका के विकल्प सामुदायिक भागीदारी के साथ तैयार किए जाने चाहिए. स्थानीय ज्ञान जैसे पारंपरिक आवास तकनीक और जल प्रबंधन पद्धतियां—को संरक्षित की जानी चाहिए और आधुनिक जोखिम आकलन के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए.
होटल और रिसॉर्ट के संरक्षण की जरूरत: अंततः, निजी क्षेत्र हाशिये पर नहीं रह सकता. पर्यटन, उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था का चालक और उसकी कमज़ोरियों में योगदानकर्ता, दोनों है. होटल और रिसॉर्ट हिमालय की नाज़ुक सुंदरता से लाभान्वित होते हैं, लेकिन इसके संरक्षण में शायद ही कभी निवेश करते हैं. जलवायु-प्रतिरोधी बुनियादी ढांचे, सतत पर्यटन और आपदा-प्रतिरोधी तैयारियों में सार्वजनिक, निजी भागीदारी के मॉडल, आर्थिक गतिविधियों को पारिस्थितिक संरक्षण के साथ संतुलित करने में मदद कर सकते हैं.
विश्व आर्थिक मंच का मानना है कि लचीलेपन में निवेश किया गया प्रत्येक $1 आपदा-प्रतिरोधी लागत में $4 की बचत करता है - एक ऐसा तर्क जिससे निजी क्षेत्र की भागीदारी को बढ़ावा मिलना चाहिए.
राष्ट्रीय आपदा है उत्तरकाशी की तबाही: उत्तरकाशी की बाढ़ केवल एक स्थानीय त्रासदी नहीं है; यह एक राष्ट्रीय चेतावनी है. यह पारिस्थितिकी विज्ञान की अनदेखी करने, दीर्घकालिक लचीलेपन की बजाय अल्पकालिक विकास को प्राथमिकता देने, और जलवायु परिवर्तन को एक वर्तमान और तीव्र वास्तविकता के बजाय एक अमूर्त भविष्य की समस्या के रूप में देखने की लागत को उजागर करती है. जब तक भारत अपने पर्वतीय विकास मॉडल को पुनर्निर्देशित नहीं करता.
हिमालय में ऐसी आपदाएं आती रहेंगी, जिनका पूर्वानुमान लगाया जा सकता है और जिन्हें रोका भी जा सकता है. नीति निर्माताओं के सामने विकल्प बहुत स्पष्ट हैं. वर्तमान रास्ते पर चलते रहें और देखें कि हर मॉनसून शोक के मौसम में कैसे बदल जाता है. या फिर हिमालयी विकास के हर पहलू में जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीलापन लाने के लिए निर्णायक कदम उठाएं. धराली में हुई मौतों से हमें दूसरे विकल्प की ओर प्रवृत्त होना चाहिए.
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