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भारत से तेल भुगतान में कोई दिक्कत नहीं: रूस - India Russia Relation

By ANI

Published : Apr 4, 2024, 7:34 AM IST

Russian Foreign Ministry On Oil Payment : रूस के विदेश मंत्रालय कहा कि भारत को निर्यात किये गये कच्चे तेल के भुगतान के संबंध में कोई परेशानी नहीं है. रूसी विदेश मंत्रालय की आधिकारिक प्रवक्ता ने यह बात कही है.

Russian Foreign Ministry On Oil Payment
रूसी विदेश मंत्रालय की आधिकारिक प्रवक्ता मारिया जखारोवा. (तस्वीर सभार: एक्स/@mfa_russia)

मॉस्को : रूसी विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत में रूसी तेल की डिलीवरी लगातार अधिक हो रही है. इस संबंध में भुगतान की कोई समस्या नहीं आई है. रूस के राज्य के स्वामित्व वाली समाचार एजेंसी तास ने बताया कि रूसी विदेश मंत्रालय की आधिकारिक प्रवक्ता मारिया जखारोवा ने बुधवार (स्थानीय समय) में एक ब्रीफिंग में कहा कि भारत को रूसी तेल की आपूर्ति लगातार उच्च स्तर पर बनी हुई है; रूस की ओर से निर्यात किए जाने वाले तेल के लिए भुगतान के साधन निर्धारित करने में कोई समस्या नहीं आती है.

उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि भुगतान में प्राथमिकता 'राष्ट्रीय मुद्राओं को दी गई है'. तास ने जखारोवा के हवाले से कहा कि इससे बैंकिंग लेनदेन करते समय पश्चिमी लोगों की ओर से लगाए गए तथाकथित 'खेल के नियमों' पर निर्भर नहीं रहना संभव हो जाता है.

इस साल फरवरी में विदेश मंत्री एस जयशंकर ने यूक्रेन के साथ सैन्य संघर्ष के बीच मास्को पर प्रतिबंधों के बावजूद रूसी तेल खरीदने पर भारत के रुख की पुष्टि की. उन्होंने कहा कि भारत और रूस ने हमेशा 'स्थिर और मैत्रीपूर्ण संबंध' साझा किए हैं और मॉस्को ने कभी भी नई दिल्ली के हितों को नुकसान नहीं पहुंचाया है.

म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन के लिए जर्मनी की अपनी यात्रा के दौरान जर्मन आर्थिक दैनिक हैंडेल्सब्लैट के साथ एक साक्षात्कार में, जयशंकर ने कहा कि यूरोप को यह समझना चाहिए कि भारत रूस के बारे में यूरोपीय दृष्टिकोण के समान नहीं हो सकता है.

भारत की ओर से रूसी तेल खरीदने के बारे में पूछे जाने पर जयशंकर ने कहा कि हर कोई अपने पिछले अनुभवों के आधार पर संबंध रखता है. अगर मैं आजादी के बाद भारत के इतिहास को देखूं तो रूस ने कभी भी हमारे हितों को नुकसान नहीं पहुंचाया है.

उन्होंने कहा कि भारत और यूरोप ने अपने रुख पर बात की है और अपने मतभेदों पर जोर नहीं दिया है. उन्होंने कहा कि रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध छिड़ने के बाद यूरोप ने अपनी ऊर्जा खरीद का एक बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व में स्थानांतरित कर दिया, जो तब तक भारत और अन्य देशों के लिए ऊर्जा का मुख्य आपूर्तिकर्ता था.

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