देवां शरीफ का एक अनोखा ग्राउंड जिस पर हर हॉकी खिलाड़ी को खेलने की रहती है तमन्ना

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By ETV Bharat Uttar Pradesh Desk

Published : Nov 2, 2023, 6:11 PM IST

Updated : Nov 3, 2023, 8:05 PM IST

बाराबंकी का देवां मेला मैदान

बारांबकी जनपद में एक ऐसा मैदान है जहां हॉकी के दिग्गज खिलाड़ियों ने हॉकी स्टिक का कमाल दिखाया है. वहीं, हर एक खिलाड़ी इस मैदान में खेलने की चाहत रखता है. क्या है ऐसा इस मैदान में जानें इस रिपोर्ट में...

एक अनोखा ग्राउंड जिस पर हर हॉकी खिलाड़ी को खेलने की रहती है तमन्ना

बाराबंकी: जिले में एक ऐसा मैदान है, जहां देश का हर हॉकी खिलाड़ी खेलने की तमन्ना रखा है. यही वजह है कि इस मैदान में हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यान चंद उनके भाई रूप सिंह, बाबू केडी सिंह सहित कई ओलंपिक खिलाड़ी अपनी हॉकी स्टिक का जलवा बिखेर चुके हैं. यह मैदान है बाराबंकी में लगने वाले देवां मेला का. हर वर्ष इस मैदान में लगने वाले देवां मेले में हॉकी का टूर्नामेंट होता है. जिसमें देश के कोने-कोने से हॉकी खिलाड़ी आकर अपनी हॉकी स्टिक का कमाल दिखाते हैं.

देवां मैदान में हर साल होता है हॉकी टूर्नामेंट
देवां मैदान में हर साल होता है हॉकी टूर्नामेंट
जिला मुख्यालय से तकरीबन 12 किलोमीटर दूर स्थित देवां शरीफ कस्बे का नाम शायद ही कोई हो जिसने न सुना हो. दरअसल यहां "जो रब है वही राम है का संदेश" देने वाले महान सूफी संत हाजी वारिस अली शाह की मजार है. कौमी एकता की अलख जगाती इस मजार पर हर मजहब के लोग आकर सुकून पाते हैं. हाजी वारिस अली शाह के पिता सैयद कुर्बान अली शाह की याद में यहां हर साल कार्तिक महीने में दीपावली से दस दिन पहले मेला लगता है. दस दिनों तक चलने वाले इस मेले में तनाम खेलकूद और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं.
दिग्गज हॉकी खिलाड़ी सैयद अली देवां मैदान में कई बार खेल चुके हैं
दिग्गज हॉकी खिलाड़ी सैयद अली देवां मैदान में कई बार खेल चुके हैं
मेले में 1927 से शुरू हुआ हॉकी टूर्नामेंट: यूं तो इस मेले की शुरुआत हाजी साहब की जिंदगी में ही हो गई थी. लेकिन जब भीड़ बढ़नी शुरू हुई तो इसके लिए बाकायदा एक कमेटी बनी. इसके बाद प्रशासनिक देखरेख में साल 1925 से मेले को भव्यता मिली. उसी साल यहां खेलकूद के भी टूर्नामेंट शुरू हुए. साल 1925 में यहां पहली बार कुश्ती के आयोजन हुआ, फिर साल 1927 में यहां हॉकी के टूर्नामेंट शुरू किए गए. जिसमें केवल तीन टीमों ने ही हिस्सा लिया था. उसके बाद साल दर साल टीमें बढ़ती गईं. तब से इस मैदान में ये सिलसिला लगातार चला आ रहा है.


इस ग्राउंड पर खेलने के लिए खिलाड़ियों में होड़: मशहूर हॉकी खिलाड़ी और टूर्नामेंट आयोजक सलाहुद्दीन बताते हैं कि टूर्नामेंट में खेलने के लिए खिलाड़ियों की होड़ लगी रहती है. पहले स्टेट टूर्नामेंट होते थे, बाद में नेशनल टूर्नामेंट होने लगे. देवां मेला के इस ऐतिहासिक ग्राउंड पर न केवल एक से एक दिग्गज टीमें जैसे झांसी हीरोज, एलवाईये लखनऊ बीवाईये लखनऊ, गोरखपुर हॉकी टीम, बरेली स्पार्टन टीम खेल चुकी हैं. बल्कि देश के एक से एक नामवर खिलाड़ी भी यहां खेल चुके हैं.

हॉकी के जादूगर सहित कई नामी खिलाड़ियों ने लिया टूर्नामेंट में हिस्सा: दादा ध्यानचंद और रूपसिंह दोनों सगे भाइयों ने इस टूर्नामेंट में कई सालों तक भाग लिया. इंडिया टीम के कोच और बंगाल यंगमैन एसोसिएशन टीम के कैप्टन रहे एनएन मुखर्जी उर्फ हबुल मुखर्जी भी यहां खेल चुके हैं. केडी सिंह बाबू की तो यह धरती ही थी. 1964 ओलंपिक में इंडिया टीम के गोल्ड मेडलिस्ट रहे अली सईद भी गोरखपुर टीम की ओर से यहां खेल चुके हैं. साल 1958 एशियन गेम्स के गोल्ड मेडलिस्ट रहे मो. याकूब, साल 1966 एशियन गेम्स विजेता एएल फ्रैंक, 1972 ओलंपिक खिलाड़ी मुखबैन सिंह, 1968 ओलंपिक के जॉइंट कैप्टन गुरुबख्श सिंह, वर्ष 1964 ओलंपिक में चयनित और 1968 के ओलंपिक खिलाड़ी इनामुल रहमान भी अलीगढ़ टीम से यहां खेल चुके हैं. वहीं, मेजर ध्यानचंद के बेटे और इंडिया टीम के कप्तान रहे अशोक कुमार और ओलंपियन सैयद अली भी यहां कई बार टूर्नामेंट खेल चुके हैं.

हर खिलाड़ी का ख्वाब है यहां खेलना: वजह जो भी हो लेकिन देवां शरीफ के इस ग्राउंड पर हाकी खेलना हर खिलाड़ी का ख्वाब होता है. यही वजह है कि इस ग्राउंड पर खेलने के लिए होड़ लगी रहती है. सुविधाओं के अभाव में भी खिलाड़ियों में गजब का जज्बा रहता है. भले ही यहां टूर्नामेंट में खेलने आने वाले खिलाड़ियों को उतनी सुविधाएं नहीं मिल पाती, जितनी मिलनी चाहिए. बावजूद इसके दूर-दूर से आए खिलाड़ी देवां मैदान में हर हाल में खेलना चाहते हैं.

क्या बोले पूर्व ओलंपियन: 1976 मॉन्ट्रियल ओलंपिक में भारतीय टीम का हिस्सा रहे दिग्गज हॉकी खिलाड़ी सैयद अली इस ग्राउंड पर पहली बार साल 73 में बाबू केडी सिंह के नेतृत्व में खेलने आए थे. उसके बाद से 7-8 बार यहां खेल चुके हैं. उनका कहना है कि न जाने बार-बार क्यों इस ग्राउंड पर खेलने का दिल करता है. निश्चय ही सभी मजहबों को एक धागे में पिरोने वाले हाजी वारिस अली शाह के प्रति लोगों की असीम श्रद्धा ही है कि वे यहां खिंचे चले आते हैं. खिलाड़ियों का तो मानना है कि अगर उन्हें यहां कामयाबी मिली, तो वे हर जगह कामयाब होंगे.

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Last Updated :Nov 3, 2023, 8:05 PM IST
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