युवाओं के दम पर 2023 में MP फतह करेगी BJP, उम्रदराज नेताओं को नहीं मिलेगा टिकट

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Published : Jan 19, 2022, 7:52 PM IST

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मध्यप्रदेश में 2023 में होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर BJP ने अभी से तैयारियां शुरू कर दी हैं. पार्टी इस बार युवाओं को टिकट देगी वहीं उम्रदराज नेताओं से केवल मार्गदर्शन लिया जाएगा. पार्टी युवा और जोश से भरे कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर तक भेजकर पार्टी का वोट बैंक बढ़ाएगी.

भोपाल। मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव होने में अभी एक साल से ज्यादा का वक्त है, लेकिन इसके लिए BJP ने अभी से कमर कस ली है. भाजपा युवाओं के दम पर 2023 के चुनाव को जीतने की तैयारी में है. पार्टी ने खुलकर बुजुर्ग नेताओं को दरकिनार कर दिया है. युवाओं को मौका देकर पार्टी ने साफ कर दिया है कि उम्रदराज नेता मार्गदर्शक बनें, तो पार्टी के लिए बेहतर होगा. उनका अनुभव युवाओं के साथ साथ पार्टी को भी उच्च स्तर पर ले जाएगा. दरअसल बीजेपी युवा और जोश से भरे कार्यकर्ताओं को बूथ स्तर तक भेजकर पार्टी का वोट बैंक बढ़ाएगी. वहीं आंकड़ों पर गौर करें तो 18 से 25 साल की उम्र वाले नौजवानों की सबसे ज्यादा पसंदीदा पार्टी BJP ही है, इसलिए पार्टी नौजवानों के सामने उम्रदराज नेताओं को नहीं उतारना चाहती.

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वोटिंग प्रतिशत बढ़ाने का फॉर्मूला तय

बीजेपी कार्यालय में कुशाभाऊ ठाकरे जन्म शताब्दी समारोह आयोजित किया. इस दौरान बूथ विस्तारक बैठक में प्रदेश में अपना वोटिंग प्रतिशत बढ़ाने का फॉर्मूला तय किया गया गया. बैठक में पूर्व मंत्री हिम्मत कोठारी, पूर्व सांसद प्रभात झा, पूर्व सांसद सुमित्रा महाजन सहित कई सीनियर नेताओं को बुलाया जरूर लेकिन उन्हें कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई है. उनसे सुझाव लिए गए कि संगठन को मजबूत करने के लिए पार्टी को और क्या करना चाहिए. 2018 में विधानसभा चुनाव के दौरान अमित शाह ने भोपाल में चिंतन मंथन किया था. तभी तस्वीर साफ हो गया गई थी कि आने वाले दिनों में 65 प्लस नेताओं को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा. पूर्व मंत्री जयंत मलैया, गौरीशंकर शेजवार, कुसुम मेहदेले, माया सिंह, हर्ष सिंह, अन्तर सिंह आर्य सहित कई और बुजुर्ग नेताओं के टिकट काट दिए गए हैं.

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परिवारवाद से भाजपा की दूरी

भाजपा प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा की टीम में भी नए चेहरों को मौका दिया गया है, जिसमें ज्यादातर युवा हैं. जहां तक 70 की उम्र के नेताओं का सवाल है तो उन्हें टिकट नहीं दिए जाएंगे. साथ ही परिवारवाद को भी दूर रखा गया है. नंदकुमार सिंह चौहान के निधन के बाद यह माना जा रहा था कि उनकी जगह उनके बेटे को टिकट मिल सकता है लेकिन पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया. ऐसा ही उदाहरण दमोह उपचुनाव में देखने को मिला, जहां पर जयंत मलैया और उनके बेटे को पार्टी ने टिकट नहीं दिया. हालांकि मलैया को टिकट न देने के चलते पार्टी को हार मिली. लेकिन पार्टी ने जो गाइडलाइन तय की है उसके मुताबिक ही चल रही है.

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