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पटना: बिहटा के मां वनदेवी महाधाम में मां का खुला पट, हजारों की संख्या में पूजा करने पहुंचे श्रद्धालु

बिहटा के मां वनदेवी महाधाम में श्रद्धालुओं की भीड़ दिख रही है. बिहटा के राघोपुर कंचनपुर गांव में स्थित ऐतिहासिक मां वनदेवी मंदिर की ख्याति दूर दूर तक फैली है.

वनदेवी महाधाम
वनदेवी महाधाम

Published : October 2, 2022 at 12:59 PM IST

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पटना: बिहटा के इतिहासिक मां वनदेवी महाधाम ( Maa Vandevi Mahadham Bihta) में दो सालों के बाद नवरात्र पर श्रद्धालुओं की अपार भीड़ दिख रही है. मां का पट खुलते ही मां का पूजा करने श्रद्धालु पहुंच रहे हैं, वही सुरक्षा को लेकर पुख्ता इंतजाम किया गया है. दो सालों के बाद इस साल नवरात्र के पावन दिन पर देश और प्रदेश में काफी रौनक देखने को मिल रहा है.

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नवरात्र को लेकर तमाम मंदिरों में भी दो सालों के बाद काफी संख्या में श्रद्धालु पूजा करने (Crowd Of Devotees Gathered In Maa Vandevi Mahadham) पहुंच रहे हैं. बिहार की राजधानी पटना से 32 किमी दूर बिहटा के राघोपुर कंचनपुर गांव में स्थित ऐतिहासिक मां वनदेवी मंदिर की ख्याति दूर दूर तक फैली है. इस ऐतिहासिक मंदिर में अगर भक्त सच्चे मन से मां से मुरादे मांगे तो मां उसकी मुरादे पूरी करती है.

350 वर्ष पूर्व हुई थी स्थापना: भक्तों में ये मान्यता है की इस मंदिर में आकर सच्चे मन से माँ से माँगने वाले हर भक्त की मुराद जरूर पूरी होती है. यूँ तो इस मंदिर में हर रोज भक्तों की भीड़ लगती है. लेकिन हर साल नवरात्र में यहाँ आने वाले भक्तों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है.अगर बात इस मंदिर के इतिहास की करे तो लगभग 350 वर्ष पूर्व माँ विंध्यावासिनी के पिंड का अंश लाकर उनके भक्त और सिद्ध पुरुष विद्यानंद जी मिश्र ने इनकी स्थापना करायी थी.

वनदेवी महाधाम से जुड़ी कहानी: बताया जाता है. वृद्धावस्था में जब उन्हें चलने में परेशानी होने लगी तो एक रात माँ विंध्यावासिनी उनके स्वप्न में आई. उन्होनें कहा की हमारे पिंड का कुछ अंश लेकर चलो मैं तुम्हारे साथ चलूँगी. विद्यानंद इस स्वप्न के बाद विंध्याचल गए और पिंड का अंश लेकर बिहटा के राघोपुर कंचनपुर गांव स्थित जंगल में पहुँचे. जहाँ एक जगह पर उनकी स्थापना कर प्रतिदिन पूजन करने लगे. उनदिनों बनारस के एक सन्यासी विद्यानंद की परीक्षा लेने के लिए भेड़ों का झुंड लेकर पहुँचा था. विद्यानंद वनदेवी मंदिर में ध्यान में लिन थे. सन्यासी ने अपने भेड़ों से कई सवाल कराकर उनके ध्यान तोड़ने की कोशिश करने लगा. इसपर विद्यानंद ने अपने आगे रखे कलश पर त्रिपुंड से स्पर्श किया तो भेड़ों के सवाल के जवाब उस कलश से निकलने लगा. सन्यासी को इस पर क्रोध आ गया और उसने कलश पर प्रहार कर दिया. जिससे उसका एक कनखा टूटकर अशोक के वृक्ष पर टंग गया. कहा जाता है की माँ वनदेवी अपने भक्त विद्यानंद के साथ सन्यासी द्वारा की जा रही धृष्टता पर क्रोधित हो गयी और उस टूटे कनखे ने उस सन्यासी को दंड देना शुरू कर दिया. माँ के क्रोध को शांत करने के लिए विद्यानंद ने अपना ध्यान तोड़कर क्षमा की अपील की तब जाकर उस सन्यासी की जान बची.


नौ दिनों तक जलता अंखंड ज्योत : वही बता दे की नवरात्र के मौके पर मां वन देवी का विशेष श्रृंगार एवं अंखंड ज्योत भी जलता है. जो नवरात्र के नौ दिनों तक जलता है जिसे देखने और पूजा करने के लिए लोग दूर दराज से आते है. नवरात्र में नौ दिन माँ की विशेष आरती भी होती है. साथ ही सतमी के दिन मां का पट खुलने के बाद से दूर-दराज से श्रद्धालु मां का पूजा करने पहुंचे है इसके अलावा मंदिर में नवरात्र के मौके पर दूरदराज से आए श्रद्धालु पाठ भी करते हैं.



"प्रत्येक रविवार और मंगलवार को मंदिर में काफी भीड़ लगती है लेकिन नवरात्रि के पावन दिनों में मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ काफी बढ़ जाती है. दूर-दराज से श्रद्धालु पूजा करने आते हैं. 2 सालों के बाद इस साल नवरात्र में काफी भीड़ भी देखी जा रही है. नवरात्र को लेकर मंदिर में पूजा के अलावा पाठ भी किया जाता है. जो भी भक्त सच्चे मन से मां से मुरादे मांगते हैं उनकी मां पूरा करती है. इसलिए इस मंदिर का इतिहास काफी पुराना है और चारों तरफ जंगलों से घिरा है. जिसके कारण मां वनदेवी नाम रखा गया." - पवन सिंह पटेल, स्थानीय श्रद्धालु



"विद्यानंद मिश्रा जो बिहटा के राघोपुर गांव के निवासी थे. उन्होंने मां विंध्यवासिनी से पूजा करके इस मंदिर का स्थापना किया था. जो चारों तरफ वनों और जंगलों से घिरा हुआ है. विद्यानंद मिश्र मां विंध्यवासिनी के परम भक्त थे और अपने पूरे जीवन काल में मां की आराधना किया और जब उनकी वृद्धावस्था आए तब उनके सपनों में मां विंध्यवासिनी आई और वह खुद पैदल जाकर मां विंध्यवासिनी से आराधना कर इस मंदिर का स्थापना किया. उस वक्त से लेकर आज तक मंदिर में जो भी भक्त सच्चे दिल से मुरादे मांगते हैं उनकी मां पूरा करती है." - सीतलेश्वर मिश्र, अध्यक्ष विद्यानंद मिश्र ट्रस्ट