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हरियाणा के अतिथि लेक्चररों को हाईकोर्ट से राहत, नियमितीकरण पर 6 माह में फैसला जरूरी, देरी पर 50 हजार हर्जाना

हरियाणा हाईकोर्ट ने अतिथि लेक्चररों के नियमितीकरण दावों पर छह माह में फैसला करने का आदेश दिया है.

HARYANA HIGHER EDUCATION DEPARTMENT
हरियाणा के अतिथि लेक्चररों को हाईकोर्ट से राहत (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Haryana Team

Published : June 17, 2026 at 5:17 PM IST

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पंचकूला: हरियाणा उच्च शिक्षा विभाग में कंप्यूटर साइंस, कामर्स और मैनेजमेंट विषयों के अनुबंधित/अस्थायी रूप से कार्यरत व्याख्याताओं (लेक्चररों) को हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है. कोर्ट ने उनकी सेवाओं के नियमितीकरण की मांग से जुड़ी याचिकाओं का निपटारा करते हुए राज्य सरकार को याचिकाकर्ताओं के दावों पर निर्धारित अवधि के भीतर विधिसम्मत निर्णय लेने का निर्देश दिया है. हाईकोर्ट ने कई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया है.

इस मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि वे लंबे समय से उच्च शिक्षा विभाग में व्याख्याता के रूप में सेवाएं दे रहे हैं. नतीजतन उन्हें हरियाणा सरकार की 16 जून 2014 की नियमितीकरण नीति का लाभ मिलना चाहिए.

प्रतिनिधित्व देने की अनुमति मांगी: याचिकाकर्ताओं के वकील ने कोर्ट को बताया कि हाल ही में 16 अप्रैल 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने ‘मदन सिंह एवं अन्य बनाम हरियाणा राज्य एवं अन्य’ मामले में महत्वपूर्ण फैसला दिया है. इस फैसले के आलोक में याचिकाकर्ता नियमितीकरण के पात्र हैं. उन्होंने अदालत से अनुरोध किया कि उन्हें अपना पक्ष रखने के लिए सक्षम प्राधिकारी के समक्ष प्रतिनिधित्व देने की अनुमति दी जाए.

निदेशक करेंगे मामलों पर विचार: सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से कहा कि यदि सभी याचिकाकर्ता चार सप्ताह के भीतर अपना प्रतिनिधित्व प्रस्तुत करते हैं तो उच्च शिक्षा विभाग के निदेशक उनके मामलों पर विचार करेंगे. साथ ही सर्वोच्च न्यायालय के फैसले और लागू नियमों के अनुसार प्रत्येक मामले में कारण युक्त एवं विस्तृत आदेश पारित किया जाएगा. अदालत ने राज्य सरकार के इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लेते हुए याचिकाओं का निपटारा किया. हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रतिनिधित्व दाखिल किए जाने के बाद उच्च शिक्षा निदेशक को छह माह के भीतर अंतिम निर्णय लेने का निर्देश दिया.

50 हजार करना पड़ सकता है भुगतान: अदालत ने आदेश के अनुपालन को सुनिश्चित करने के लिए कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट किया कि यदि निर्धारित छह माह की अवधि के भीतर निर्णय नहीं लिया गया तो संबंधित अधिकारी को प्रत्येक याचिकाकर्ता को 50 हजार रुपये की राशि का जुर्माने के तौर पर भुगतान करना होगा.

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