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पाकिस्तान जेल से 7 बरस बाद रिहा बालाघाट का प्रसन्नजीत, बेटे को लेने परिजन जा रहे अमृतसर

बालाघाट का प्रसन्नजीत 7 साल बाद पाकिस्तान की कोट लखपत जेल से रिहा, बहन अकेले लड़ रही थी रिहाई की जंग.

BALAGHAT PRASANNAJIT RELEASED FROM PAKISTAN KOT LAKHPAT JAIL
बालाघाट का प्रसन्नजीत पाकिस्तान की जेल से 7 साल बाद रिहा (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Madhya Pradesh Team

Published : February 3, 2026 at 7:27 AM IST

3 Min Read
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बालाघाट: बीते 7 साल से पाकिस्तान की जेल में सुनील अदे बनकर सजा काट रहे बालाघाट के प्रसन्नजीत को अब कैद से रिहाई मिल गई है. बालाघाट जिले के खैरलांजी निवासी प्रसन्नजीत पिछले 7 साल से पाकिस्तान की जेल में बंद था, जिसकी रिहाई को लेकर उसकी बहन लगातार सरकार से गुहार लगा रही थी.
गौरतलब हो कि 31 जनवरी 2026 को जब पाकिस्तान ने 7 भारतीय कैदियों को रिहा किया, तो उसमें बालाघाट के खैरलांजी निवासी प्रसन्नजीत का नाम भी शामिल है. इस खबर के बाद प्रसन्नजीत के परिजनों की खशियों का ठिकाना नहीं रहा, परिजनों की आंखों ने आंसूओं का सैलाब छलका दिया.

7 साल के इंतजार के बाद मिली खुशी

खैरलांजी पुलिस थाने से जैसे ही रविवार को फोन आया कि प्रसन्नजीत पाकिस्तान की जेल से रिहा हो गया है. वैसे ही बहन संघमित्रा फूट-फूट कर रो पड़ीं. बहन की आंख में 7 साल के इंतजार के बाद मिली खुशी के आंसू उमड़ पड़े. रिहाई के बाद प्रसन्नजीत ने अपनी बहन संघमित्रा से फोन पर बात की और कहा कि उसे लेने वो खुद आ जाये.

Balaghat Prasannajit released from Pakistan Jail
पाकिस्तान की कोट लखपत जेल से रिहा हुआ बालाघाट का प्रसन्नजीत (ETV Bharat)

पाकिस्तान की जेल से रिहाई आसान नहीं थी

रिहाई का सफर आसान नहीं था. 2021 में जब पता चला कि भाई जिंदा है और पाकिस्तान की कोट लखपत जेल में बंद है, तब से संघमित्रा अकेले ही जंग लड़ती रहीं. थाने, कलेक्टर कार्यालय, नेता, मंत्री सबके चक्कर काटे. पिछले साल उनकी भाई के नाम लिखी चिट्ठी मीडिया में छपी तो मामला राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियों में आया.

कौन है प्रसन्नजीत ?

प्रसन्नजीत कभी पढ़ाई में तेज था. पिता लोपचंद रंगारी ने कर्ज लेकर उसे जबलपुर से बी.फार्मा कराया, लेकिन मानसिक बीमारी ने सब बदल दिया. 2017-18 में वह लापता हो गया और 2019 में पाकिस्तान के बाटापुर से हिरासत में लिया गया. बिना किसी आरोप के बिना पहचान के वह सुनील अदे बनकर जेल में रहा. सबसे बड़ी विडंबना वेरिफिकेशन के दस्तावेज आने वाले दिन ही पिता की मौत हो गई. बेटे के इंतजार में उनकी आंखें हमेशा के लिए बंद हो गईं. मां आज भी उम्मीद रखती रहीं कि बेटा जिंदा है.

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प्रसन्नजीत की मदद को आया बालाघाट का जिला प्रशासन

प्रसन्नजीत अमृतसर के गुरु नानक देव अस्पताल और रेडक्रॉस भवन में है. 6 अन्य भारतीय घर लौट चुके हैं, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण प्रसन्नजीत अपने घर नहीं पहुंच पाया था. ईटीवी भारत द्वारा प्रसन्नजीत की आर्थिक तंगी की खबर छापने के बाद बालाघाट जिला प्रशासन उसकी मदद के लिए आगे आ गया है. प्रसन्नजीत की बहन और उसके परिजान अमृतसर के लिए रवाना हो रहा हैं.

यह सिर्फ एक कैदी की रिहाई नहीं है, एक बहन के अथक संघर्ष एक पिता के अधूरे सपनों और एक मां की अटूट उम्मीद की जीत है. बालाघाट का यह बेटा आखिरकार घर लौट रहा है जहां उसकी मां की बाहें आज भी फैली हुई हैं.