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आमेर का शिलामाता मंदिर: 500 साल पहले राजा मानसिंह बंगाल से लेकर आए थे प्रतिमा, आज भी बंगाली पद्धति से होती है पूजा

आमेर दुर्ग पर शिला माता मंदिर की प्रतिमा 500 साल पहले राजा मानसिंह बंगाल से लेकर आए थे. यहां बंगाली पद्धति से पूजा होती है.

Shila Mata temple Amer
आमेर की शिला देवी (ETV Bharat Jaipur)
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : April 1, 2025 at 9:09 PM IST

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जयपुर: ऐतिहासिक आमेर दुर्ग पर प्राचीन शिला माता का मंदिर स्थित है. करीब 500 साल पुरानी माता की प्रतिमा का जयपुर से बंगाल से कनेक्शन है. कहा जाता है कि राजा मानसिंह इस प्रतिमा को बंगाल में जसोर के राजा को युद्ध में पराजित करके जयपुर लाए थे. वहां से इसे आमेर में शिला माता के रूप में स्थापित करवाई थी. तब ये यह शिला माता मंदिर कहलाता है. यहां आज भी बंगाली रीति के अनुसार पूजा अर्चना होती है. नवरात्रों में शिला माता मंदिर में विशेष मेला लगता है. दूर-दूर से भक्त अपनी मनोकामनाएं लेकर माता के दरबार में पहुंचते हैं. कोई हाथ में ध्वज लेकर, हाथ में दीपक लेकर, तो कोई दंडवत करते हुए माता के दरबार में धोक लगाने पहुंचते हैं.

सन् 1580 में बंगाल के जसोर के राजा को हराकर शिला माता के विग्रह को मिर्जा राजा मानसिंह आमेर लेकर आए थे. बताया जाता है कि पहले शुरुआत में शिला देवी को नरबलि दी जाती थी, लेकिन इसके बाद पशु बलि दी जाने लगी. सन् 1972 के बाद पशु बलि भी बंद हो गई है. मंदिर के मुख्य द्वार को चांदी से बनवाया गया था.

शिला माता मंदिर (ETV Bharat Jaipur)

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द्वार पर बनी है नवदुर्गा की मूर्तियां: शिला माता मंदिर के पुजारी बनवारी लाल शर्मा ने बताया कि मंदिर में अंदर जाने पर सबसे पहले चांदी का बना मुख्य द्वार है. मुख्य द्वार पर नवदुर्गा शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि और सिद्धिदात्री की प्रतिमा उत्कीर्ण हैं. दस महाविद्याओं के रूप में काली, तारा, षौडशी, भुनेश्वरी, छिन्नमस्ता, त्रिपुर, भैरवी, धूमावती, बगुलामुखी, मातंगी, और कमला चित्रित हैं. दरवाजे के ऊपर लाल पत्थर की गणेशजी की मूर्ति स्थापित है. मंदिर में कलात्मक संगमरमर का कार्य पूर्व महाराजा मानसिंह द्वितीय ने 1906 में करवाया था. कहा जाता है कि शिला माता मंदिर की मूल प्रतिमा का तेज इतना इतना अधिक है कि उसे मात्र राजा मान सिंह ही सहन कर सकते थे. इसके बाद मूल स्वरूप को तहखाने में रखा गया, जबकि प्रतीकात्मक स्वरूप की पूजा अर्चना की जाती है.

टेढ़ी है प्रतिमा की दृष्टि: माता की प्रतिमा की दृष्टि टेढ़ी होने के पीछे कई ऐतिहासिक बातें हैं. जिसमें से एक मान्यता यह भी है कि 1727 ईस्वी में आमेर को छोड़कर कछवाहा राजवंश ने अपनी राजधानी जयपुर को बनाया, तो माता ने रुष्ट होकर अपनी दृष्टि टेढ़ी कर ली थी. वहीं, एक बात यह भी कही जाती है कि राजा मानसिंह से स्वप्न में माता ने मंदिर स्थापना के बाद रोज एक नरबलि का वचन लिया था. राजा मानसिंह ने इस वचन को निभाया, लेकिन बाद के शासक इसे नहीं निभा पाए और नरबलि के जगह पशु बलि देना शुरू कर दिया. इससे नाराज होकर शिलादेवी ने अपनी दृष्टि को टेढ़ी कर लिया. नरबलि और पशु बलि के बाद माता के मावे के पेड़े और नारियल का भोग लगने लगा.

Shila Mata temple Amer
मंदिर में दर्शनों के लिए लगी कतार (ETV Bharat Jaipur)

दक्षिणमुखी से हो गई उत्तरमुखी: इतिहासकारों की माने तो राजा केदार बंगाल के शासक थे. उस समय मिर्जा राजा मानसिंह से उनका मुकाबला हुआ. राजा मानसिंह को पता चला कि राजा केदार के पास शिला माता का विग्रह है. राजा केदार को युद्ध में हराने के बाद शिला माता की प्रतिमा बंगाल से आमेर लेकर आए थे. एक यह भी कहा जाता है कि शिला माता के विग्रह को समुद्र तल से लाया गया था. राजा के सपने में आया कि इस विग्रह को निकालने पर युद्ध में विजय मिलेगी. पहले माता के विग्रह की दृष्टि जयपुर की तरफ थी. सवाई जयसिंह द्वितीय के समय इस विग्रह को उत्तरमुखी किया गया था, ताकि माता की पीठ जयपुर की तरफ हो जाए. उसके बाद ही जयपुर ने बहुत विकास किया. विग्रह के बारे में कहा जाता है कि इसके सामने तो विनाश और इसकी पीठ पीछे विकास है, इसलिए प्रतिमा को पहले दक्षिणमुखी रखा गया था और फिर जयपुर बसने के बाद उत्तरमुखी कर दिया गया था. मान्यता है कि शिला माता की प्रतिमा के सामने विनाश और पीठ पीछे विकास है. इसी वजह से मूर्ति को पहले दक्षिण मुखी और जयपुर की बसावट के बाद उत्तर मुखी किया गया था.

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शिला माता के तीन नाम: आमेर गाइड यूनियन के अध्यक्ष महेश कुमार शर्मा ने बताया कि शिला माता के दरबार में जो स्वरूप विद्यमान है. उसमें पंच लोकपाल ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश और कार्तिकेय बने हुए हैं. मां के चरणों में भोलेनाथ हैं. आमेर की शिला माता को तीन नामों से जाना जाता है. पहला नाम शिला देवी है. शिला यानी चट्टान. दूसरा नाम काली और तीसरा जसरेश्वरी है. यहां काली का स्वरूप भी मौजूद है, इसलिए काली के नाम से भी जाना जाता है. शिला माता को जसरेश्वरी भी कहा जाता है, क्योंकि राजा मानसिंह जसोर बंगाल से माता की प्रतिमा को लेकर आए थे. सात्विक और तामसिक पद्धति से पूजा-अर्चना की जाती है. पहले बंगाली पुजारी बंगाली प्रोसेस से पूजा करते थे और मारवाड़ी पुजारी दुर्गापाठी थे.

Shila Mata temple Amer
मंदिर का मुख्य द्वार (ETV Bharat Jaipur)

प्रतिमा को मूर्तिकारों ने दिया था रूप: शिला माता के पुजारी बनवारी लाल शर्मा के मुताबिक इस विग्रह को शिला देवी इसलिए कहा जाता है क्योंकि महाराजा मानसिंह प्रथम माता की प्रतिमा को शिला के रूप में लेकर आए थे. प्रतिमा को आमेर लाने के बाद मूर्तिकारों ने मूर्ति का रूप दिया था. यह माता की तांत्रिक प्रतिमा है. शिला माता की पूजा अर्चना की परंपरा आज भी राज परिवार की ओर से निभाई जा रही है.

नवरात्रों में लगता है मेला: हर साल नवरात्रों में शिला माता मंदिर में मेला लगता है. नवरात्रों में प्रतिदिन दुर्गा सप्तमी का पाठ और हवन किया जाता है. माता रानी का विशेष श्रंगार कर झांकी भी सजाई गई है. नवरात्रों में पूर्व राज परिवार की ओर से माता रानी की पोशाक चढ़ाई जाती है और रोजाना आभूषणों का विशेष श्रृंगार किया जाता है. शिला माता मंदिर में नवरात्रों के दौरान 10 महाविद्याओं और 9 दुर्गाओं की प्रतिदिन पूजा अर्चना की जाती है. नवरात्रों के दौरान शिला माता मंदिर में दूर-दूर से हजारों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं.