भीख मांगने, कूड़ा बीनने वालों की जिंदगी बदल रही हैं गुंजन बिष्ट, 300 बच्चों को पहुंचा चुकी हैं स्कूल
कूड़ा उठाने और भीख मांगने वाले बच्चों को शिक्षा दे रहीं हल्द्वानी की गुंजन बिष्ट अरोड़ा. लोग उनकी पहल की जमकर प्रशंसा कर रहे हैं.

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : April 2, 2025 at 5:25 PM IST
|Updated : April 3, 2025 at 11:18 AM IST
हल्द्वानी: गरीब बच्चों को शिक्षा से जोड़ने के लिए सरकार द्वारा कई तरह के अभियान और योजनाएं चलाई जा रही हैं. लेकिन समाज में बहुत से बच्चों का बचपन शिक्षा के अभाव में अंधकार की ओर जा रहा है. इस अंधकार को उजाला करने के लिए हल्द्वानी की 'वीरांगना' संस्था पिछले 13 साल से शिक्षा से वंचित बच्चों को 'उजाला' दिलाने का काम कर रही है. जिन हाथों में कभी भीख का कटोरा होता था, वह हाथ अब कलम-दवात थामे हैं.
हल्द्वानी की रहने वाली गुंजन बिष्ट अरोड़ा पिछले 13 सालों से हल्द्वानी शहर और आस-पास के इलाके में कूड़ा उठाने और भीख मांगने वाले बच्चों को शिक्षा की मुख्य धारा से जोड़कर उनके चेहरों पर मुस्कान लाने का काम कर रही हैं. गुंजन बिष्ट का कहना है कि उनके यहां पढ़ने वाले बच्चों के माता-पिता से बात करने पर पता चला कि वह लोग पीढ़ी दर पीढ़ी कूड़ा बीनकर और भीख मांगकर ही जीवन यापन करते आ रहे हैं. ऐसे में उन्होंने अभिभावकों को समझाया और मुहिम चलाकर उन बच्चों को शिक्षा देने का काम किया जा रहा है. यही नहीं, बच्चों के आधार और अन्य प्रमाण पत्र बनवाकर उनको आगे की पढ़ाई के लिए संस्था द्वारा सहयोग किया जा रहा है.
300 से अधिक बच्चों को शिक्षा से जोड़ा: गुंजन बिष्ट अरोड़ा कहती हैं कि उन्होंने इन बच्चों का वर्तमान बेहतर करने और भविष्य सुधारने को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है. जिसका नतीजा है कि 300 से अधिक बच्चों को उन्होंने शिक्षा के मुख्य धारा से जोड़ा है. गुंजन कहती हैं कि उन्होंने अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे. उन्होंने सड़कों पर भीख मांगते बच्चे जिनकी जिंदगी अंधकार में जा रही है, वो देखे. जिसके बाद उन्होंने इन बच्चों को शिक्षा से जोड़ने और उनका जीवन सुधारने का संकल्प लिया.
खाने से लेकर कॉपी तक सब मिलता है: इस दौरान उन्हें बहुत सारे विरोधों का भी सामना करना पड़ा. लेकिन उन्होंने 'वीरांगना' नाम की संस्था बनाई. भीख मांगने और कूड़ा उठाने वाले बच्चों को चिन्हित कर संस्था में लाकर उनको शिक्षा देने का काम शुरू किया. खास बात ये है कि यहां इन बच्चों को नाश्ते से लेकर दोपहर के खाने और कपड़े और कॉपी किताबें भी दी जाती हैं.
पहल से हल्द्वानी में बच्चे नहीं करते भिक्षावृत्ति: गुंजन बिष्ट अरोड़ा ने बताया कि भीख मंगवाने की गलत परंपरा से लड़कर बच्चों को समाज और शिक्षा की मुख्यधारा में लाने की लड़ाई आसान नहीं थी. लेकिन तमाम बाधाओं को पार कर अपने बुलंद हौसले से भिक्षावृत्ति को हराया है. जिसका नतीजा है कि आज हल्द्वानी में भिक्षावृत्ति करने वाले बच्चों की संख्या ना के बराबर रह गई है.

बच्चों पर खर्च करती हैं अपना वेतन: उन्होंने बताया कि इन बच्चों को बेसिक शिक्षा देने के बाद उनको आसपास के सरकारी और निजी स्कूलों में एडमिशन दिलवाकर उन बच्चों की निगरानी भी की जाती है. जिससे कि बच्चे वापस कूड़ा बीनने या भिक्षावृत्ति न करने लगें. उन्होंने बताया कि वह हल्द्वानी के एक बैंक में कार्यरत हैं. वह अपने वेतन से प्रतिमाह कुछ धनराशि 'वीरांगना' केंद्र पर आने वाले बच्चों पर खर्च करती हैं. इससे बच्चों की शिक्षा से जुड़ी जरूरतों को पूरा किया जाता है. समाज के कुछ लोगों द्वारा भी इसके लिए मदद की जाती है, जिससे कि इन बच्चों के भविष्य को संवारा जा सके.
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