टीबी मुक्त भारत का सपना अधूरा, सरगुजा में 1742 मरीज, जानिए क्यों पिछड़ रहा अभियान
सरगुजा में टीबी मुक्त भारत अभियान अधूरा है. जिले में अब भी टीबी के मरीज मिल रहे हैं.जिससे अभियान पूरा नहीं हो सका है.

By ETV Bharat Chhattisgarh Team
Published : March 24, 2025 at 1:01 PM IST
|Updated : March 24, 2025 at 3:09 PM IST
सरगुजा : देश भर में विश्व टीबी दिवस मनाया जा रहा है. लेकिन इस बीमारी से लड़ने के लिए शासन प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के पास कोई ठोस रणनीति नजर नहीं आ रही है. ऐसा इसलिए क्योंकि देश को 24 मार्च 2025 तक टीबी मुक्त करने का वादा पूरा नहीं हो सका. देश में टीबी के मरीजों की संख्या में कमी आई है. लेकिन सरगुजा में अभी भी बड़ी संख्या में टीबी के मरीज मौजूद हैं. वहीं पिछले कुछ वर्षों में टीबी के मरीजों की संख्या में वृद्धि देखी गई है.
सरगुजा में टीबी के मरीज चिंता का विषय : टीबी एक गंभीर और जानलेवा बीमारी है, यह एक संक्रामक बीमारी है. जिन मरीजों की बलगम जांच रिपोर्ट पॉजिटिव आई है वो अपने आसपास के लोगों को टीबी फैला रहे हैं. यही वजह है कि क्षय रोग को भारत सरकार ने भी गंभीरता से लिया है. भारत सरकार ने 24 मार्च 2025 तक देश को क्षय मुक्त करने का लक्ष्य देकर अभियान चलाया था. लेकिन वर्तमान स्थिति में क्षय मुक्त भारत या क्षय मुक्त सरगुजा के दावे और वादे कितने सही साबित हुए वो आंकड़े बयां कर रहे हैं.
सरगुजा में क्या हैं आंकड़े : टीबी मुक्त होने के लिए एक लाख की आबादी में 100 से कम मरीज होने चाहिए. लेकिन वर्तमान स्थिति में 1 लाख की जनसंख्या में 170 से अधिक मरीज हैं. इस लिए देश या फिर सरगुजा टीबी मुक्त होता नजर नहीं आ रहा है. सिर्फ सरगुजा जिले की बात की जाए तो यहां एक साल में 1742 क्षय रोग के मरीज सामने आए है जबकि मौत का आंकडा भी 1 प्रतिशत से अधिक है. सरगुजा में कई ऐसे केस सामने आए जिसमें टीबी के कारण 20 से 30 वर्ष के युवाओं को अप्रत्याशित रूप से अपनी जान गवानी पड़ी.
टीबी को लेकर ताजा आंकड़े : राष्ट्रीय क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम के नोडल डॉ.शैलेंद्र गुप्ता के मुताबिक सरगुजा के ताजा आंकड़े की बात करें तो अब तक 1742 मरीजों का इलाज सरगुजा जिले में चल रहा है.लेकिन इस दौरान डॉक्टर शैलेंद्र गुप्ता ने बताया कि आखिर क्यों टीबी को लेकर नियंत्रण करने में देरी हो रही है. शैलेंद्र गुप्ता के मुताबिक टीबी के मरीजों को यथासंभव इलाज किया जा रहा है.लेकिन ताजा शोध में पता चला है कि टीबी के मरीजों के आसपास रहने वाले लोगों में भी इसका संक्रमण फैलता है.ऐसा माना जा रहा है कि एक लाख की पॉपुलेशन वाली जगह में 20 फीसदी लोग टीबी की चपेट में हो सकते हैं.
एक लाख की जनसंख्या में करीब 20 हजार लोग टीबी से प्रभावित हो सकते हैं.क्योंकि इसका संक्रमण स्वस्थ्य व्यक्ति तक भी पहुंच जाता है.ऐसे में जो रोगी होता है उसके साथ उसके परिवार का भी इलाज किया जाता है. साथ ही साथ टीबी नियंत्रण की टीम लक्षण दिखने वाले मरीजों के साथ-साथ ऐसे क्षेत्रों के स्वस्थ्य लोगों के भी सैंपल लेती है.क्योंकि स्वस्थ्य व्यक्ति के शरीर के अंदर भी टीबी के बैक्टिरिया हवा के माध्यम से जा सकते हैं.इसका बैक्टिरिया हवा के माध्यम से एक से दूसरे शरीर में प्रवेश करता है इसलिए ये घातक है-डॉ. शैलेंद्र गुप्ता,नोडल राष्ट्रीय क्षय रोग नियंत्रण कार्यक्रम
वर्तमान में सरगुजा जिले में ही टीबी मरीजों की मृत्यु दर 3 प्रतिशत है जो काफी चिंताजनक है. इसी तरह वर्तमान में अभी तक सरगुजा जिले में सिर्फ 151 ग्राम पंचायत ही टीबी मुक्त सिल्वर क्वॉलीफाई की श्रेणी में शामिल हो पाए है. इससे पहले वर्ष 2023 में 222 ग्राम पंचायत टीबी मुक्त की श्रेणी में शामिल हुए और 2024 में 254 ग्राम पंचायत टीबी मुक्त हुए. लेकिन बाद में इनमें से शेष ग्राम पंचायतों में या तो टीबी के नए मरीज मिल गए या फिर मरीज की मौत हो गई. ऐसे में फिलहाल जिले में सिर्फ 151 ग्राम पंचायत ही टीबी मुक्त हैं.
क्यों आ रही है परेशानी : टीबी मरीजों की पहचान और उपचार को लेकर तो साल भर अभियान चलाया जा रहा है लेकिन इसके बावजूद टीबी के मरीजों की संख्या में कमी नहीं आ रही है. टीबी के मरीजों की जांच के लिए अब संभाग में सीबी नॉट, ट्रू नॉट, डिजिटल पोर्टेबल एक्स रे मशीन के साथ ही पैथोडिटेक्टर मशीन भी उपलब्ध है. लेकिन ये संसाधन भी कम ही साबित हो रहे हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि इन उपकरणों की सुविधा जिला स्तर पर है और दूरस्थ क्षेत्रों के मरीजों को जांच के लिए यहां आना पड़ता है.
सिर्फ जिले में ही 200 से अधिक स्वास्थ्य केंद्र हैं. इसमें से कम से कम 30 पीएचसी है. जबकि सीबी नॉट और ट्रू नॉट मशीन की सुविधा सिर्फ 10 अस्पतालों में है. इस अभियान के लिए सबसे बड़ी जरुरत मानव संसाधन की है. जिले की आबादी 10 लाख से अधिक है और इतनी बड़ी आबादी के लिए चंद अधिकारी कर्मचारियों की टीम है जो सही तरीके से गांव तक भी नहीं पहुंच पा रहे हैं. जबकि टीबी मुक्त अभियान के लिए भी पल्स पोलियो अभियान की तरह जिले भर से लोगों की टीम लगाकर उपकरणों के साथ अभियान चलाया जाना चाहिए था.
टीबी जैसी बीमारी से निपटने के लिए भारत सरकार ने टीबी वैक्सीनेशन अभियान की शुरुआत की थी. जिसके तहत लोगों को इस बीमारी से बचाव के लिए टीका लगाया जाना था. लेकिन यह अभियान भी बाकी अभियानों की तरह ही ठंडा पड़ गया है. इसी तरह निक्षय निरामय 100 दिवसीय अभियान के तहत उच्च जोखिम के बुजुर्गों, मरीजों के बलगम जांच का लक्ष्य रखा गया था. जो अब तक 50 प्रतिशत भी पूर्ण नहीं हो सका है.
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