बुनकरों की खस्ता हालत के लिए कौन जिम्मेदार ? - DHANIAKHALI TANT HUB
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Published : February 26, 2026 at 11:00 PM IST
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. उससे पहले प्रदेश सरकार ने हुगली के धनियाखली में लूम हब बनाने का ऐलान किया है. धनियाखली लूम को 15 साल पहले GI टैग मिल गया था. लेकिन आज भी यहां के बुनकरों की हालत जस की तस है. एक बुनकर जगदीश भर कहते हैं कि "GI टैग मिलने के बाद भी हमें कोई फ़ायदा नहीं मिला है। अच्छी क्वालिटी का कपड़ा बुनकर एसोसिएशन को दिया जाता है। ऐसा नहीं है कि हमें ज़्यादा फ़ायदा हुआ है। अभी साड़ी पहनने का ट्रेंड कम हो गया है। महिलाओं में कपड़े की जगह चूड़ीदार कुर्ता पहनने का ट्रेंड बढ़ा है। इसलिए साड़ियों की बिक्री भी कम हो गई है। मार्केट के हिसाब से मज़दूरी नहीं बढ़ी है, बुनकरों की हालत बहुत खराब है। हब होने के बावजूद ऐसा नहीं लगता कि बुनकरों की हालत सुधरेगी". इस काम में मेहनत ज्यादा है लेकिन मजदरी कम है.युवा पीढ़ी इस काम को नहीं करना चाहती है. बुनकर श्रीकांत भर कहते हैं कि "अभी मुझे एक साड़ी बनाने के लिए 210 रुपये मज़दूरी मिलती है। अभी के मार्केट रेट पर, मुझे नहीं पता कि मैं अपने बेटे की पढ़ाई और घर का खर्च कैसे उठाऊंगा। हमें GI और Hub के तौर पर कोई फ़ायदा नहीं मिला है, कॉटन यार्न की क़ीमत भी ज़्यादा है, 250 रुपये में हैंडलूम साड़ी देना मुमकिन नहीं है, इसीलिए हमारी नई पीढ़ी का कोई भी इस इंडस्ट्री में नहीं आना चाहता।". वहीं बुनकरों के मुद्दे पर सियासत भी जारी है. बीजेपी बुनकरों की इस हालत के लिए तृणमूल की सरकार को जिम्मेदार ठहरा रही है. हुगली जिले में 25 हजार बुनकर हैं.बात धनियाखली की जाए तो एक हजार बुनकर इस काम में लगे हुए हैं. लेकिन इस इंडस्ट्री की खराब हालत से कई लोग अब इस काम को छोड़ रहे हैंऔर इसके लिए वो सरकार पर सवाल उठाते हैं.
पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. उससे पहले प्रदेश सरकार ने हुगली के धनियाखली में लूम हब बनाने का ऐलान किया है. धनियाखली लूम को 15 साल पहले GI टैग मिल गया था. लेकिन आज भी यहां के बुनकरों की हालत जस की तस है. एक बुनकर जगदीश भर कहते हैं कि "GI टैग मिलने के बाद भी हमें कोई फ़ायदा नहीं मिला है। अच्छी क्वालिटी का कपड़ा बुनकर एसोसिएशन को दिया जाता है। ऐसा नहीं है कि हमें ज़्यादा फ़ायदा हुआ है। अभी साड़ी पहनने का ट्रेंड कम हो गया है। महिलाओं में कपड़े की जगह चूड़ीदार कुर्ता पहनने का ट्रेंड बढ़ा है। इसलिए साड़ियों की बिक्री भी कम हो गई है। मार्केट के हिसाब से मज़दूरी नहीं बढ़ी है, बुनकरों की हालत बहुत खराब है। हब होने के बावजूद ऐसा नहीं लगता कि बुनकरों की हालत सुधरेगी". इस काम में मेहनत ज्यादा है लेकिन मजदरी कम है.युवा पीढ़ी इस काम को नहीं करना चाहती है. बुनकर श्रीकांत भर कहते हैं कि "अभी मुझे एक साड़ी बनाने के लिए 210 रुपये मज़दूरी मिलती है। अभी के मार्केट रेट पर, मुझे नहीं पता कि मैं अपने बेटे की पढ़ाई और घर का खर्च कैसे उठाऊंगा। हमें GI और Hub के तौर पर कोई फ़ायदा नहीं मिला है, कॉटन यार्न की क़ीमत भी ज़्यादा है, 250 रुपये में हैंडलूम साड़ी देना मुमकिन नहीं है, इसीलिए हमारी नई पीढ़ी का कोई भी इस इंडस्ट्री में नहीं आना चाहता।". वहीं बुनकरों के मुद्दे पर सियासत भी जारी है. बीजेपी बुनकरों की इस हालत के लिए तृणमूल की सरकार को जिम्मेदार ठहरा रही है. हुगली जिले में 25 हजार बुनकर हैं.बात धनियाखली की जाए तो एक हजार बुनकर इस काम में लगे हुए हैं. लेकिन इस इंडस्ट्री की खराब हालत से कई लोग अब इस काम को छोड़ रहे हैंऔर इसके लिए वो सरकार पर सवाल उठाते हैं.

