महाराष्ट्र के स्कूल में AI का जादू: क्लासरूम में जंगली जानवर, पक्षी, सांप, ग्रह और तारे ! - THE MAGIC OF AI IN SCHOOL
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Published : February 16, 2026 at 6:12 PM IST
क्लास रुम में हवा में तैरती मछली, हवा में बत्तख को पकड़ने की कोशश, महराष्ट्र के बुलढाणा के एक स्कूल टीचर ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करके पढ़ाने का ये असरदार तरीका निकाला है. जिसने पढ़ाने के पारंपरिक ढंग को बदल दिया है. पढ़ाने में एआई का इस्तेमाल न सिर्फ इन स्टूडेंट के सीखने के तरीके में जान डाल रहा है. बल्कि खामगांव के कदमपुर जिला परिषद के इस हायर प्राइमरी स्कूल के टीचिंग स्टाफ को भी प्रेरणा दे रहा है.AI से स्टूडेंट्स अब क्लास रुम में साँप के रेंगने, पक्षियों के उड़ाने, सोलर सिस्टम में ग्रहों के घूमने, पृथ्वी के सूरज के चारों ओर घूमने की प्रक्रिया को भी वर्चुअल तरीके से सीख रहे हैं. वॉइस क्लोनिंग, पिक्चर एनिमेशन, इंटरैक्टिव डिजिटल टूल्स और थ्री-डाइमेंशनल विज़ुअलाइज़ेशन के साथ AI ने पढ़ाने और पढ़ने दोनों ही तरीके को बदल दिया है. तो कदमपुर जैसे गांव के सरकारी स्कूल में ये एक्सपेरिमेंट दिखाता है कि संसाधनों की कमी के बावजूद क्रिएटिविटी और टेक्नोलॉजी के सही इस्तेमाल से बेहतरीन रिजल्ट मिल सकते हैं. राजेश कोगड़े जैसे डेडिकेटेड टीचर आज भी गांव के इलाकों में क्वालिटी एजुकेशन देने की कोशिश कर रहे हैं. ये पहल महाराष्ट्र के दूसरे स्कूलों के लिए एक मॉडल बन सकता है.
क्लास रुम में हवा में तैरती मछली, हवा में बत्तख को पकड़ने की कोशश, महराष्ट्र के बुलढाणा के एक स्कूल टीचर ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल करके पढ़ाने का ये असरदार तरीका निकाला है. जिसने पढ़ाने के पारंपरिक ढंग को बदल दिया है. पढ़ाने में एआई का इस्तेमाल न सिर्फ इन स्टूडेंट के सीखने के तरीके में जान डाल रहा है. बल्कि खामगांव के कदमपुर जिला परिषद के इस हायर प्राइमरी स्कूल के टीचिंग स्टाफ को भी प्रेरणा दे रहा है.AI से स्टूडेंट्स अब क्लास रुम में साँप के रेंगने, पक्षियों के उड़ाने, सोलर सिस्टम में ग्रहों के घूमने, पृथ्वी के सूरज के चारों ओर घूमने की प्रक्रिया को भी वर्चुअल तरीके से सीख रहे हैं. वॉइस क्लोनिंग, पिक्चर एनिमेशन, इंटरैक्टिव डिजिटल टूल्स और थ्री-डाइमेंशनल विज़ुअलाइज़ेशन के साथ AI ने पढ़ाने और पढ़ने दोनों ही तरीके को बदल दिया है. तो कदमपुर जैसे गांव के सरकारी स्कूल में ये एक्सपेरिमेंट दिखाता है कि संसाधनों की कमी के बावजूद क्रिएटिविटी और टेक्नोलॉजी के सही इस्तेमाल से बेहतरीन रिजल्ट मिल सकते हैं. राजेश कोगड़े जैसे डेडिकेटेड टीचर आज भी गांव के इलाकों में क्वालिटी एजुकेशन देने की कोशिश कर रहे हैं. ये पहल महाराष्ट्र के दूसरे स्कूलों के लिए एक मॉडल बन सकता है.

