सुप्रीम कोर्ट ने उमर खालिद के फैसले पर उठाया सवाल, कहा- 'UAPA मामला कोई अपवाद नहीं' - SUPREME COURT UAPA BAIL
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Published : May 18, 2026 at 7:40 PM IST
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के मामलों में भी जमानत एक नियम होना चाहिए और जेल एक अपवाद. इसके साथ ही, अदालत ने 2020 के दिल्ली दंगा मामले में कार्यकर्ता उमर खालिद को जमानत न देने वाले एक अन्य पीठ के पुराने फैसले पर असहमति जताई. जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने यह टिप्पणी जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के हंदवाड़ा निवासी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत देते हुए की. यह व्यक्ति नार्को-आतंकवाद के एक मामले में जून 2020 से जेल में बंद था, जिसकी जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) कर रही है. पीठ ने जोर देकर कहा कि UAPA के मामलों में भी जमानत मिलना आम बात (नियम) होनी चाहिए. कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ इसलिए किसी आरोपी के तेजी से मुकदमा चलने (speedy trial) के अधिकार को नहीं छीना जा सकता, क्योंकि उस पर इस कड़े आतंकवाद-विरोधी कानून के तहत मामला दर्ज है. सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने 'गुलफिशा फातिमा बनाम राज्य' मामले के फैसले पर असहमति जताई, जो दिल्ली दंगों से जुड़ी जमानत याचिकाओं से संबंधित था. उस मामले में जहां कई आरोपियों को जमानत मिल गई थी, वहीं सुप्रीम कोर्ट ने कार्यकर्ता उमर खालिद और शारजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया था. पीठ की ओर से फैसला सुनाते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि उन्हें गुलफिशा फातिमा मामले के फैसले पर गंभीर आपत्ति है. उन्होंने कहा कि उस मामले का फैसला यह इशारा करता है कि 'नजीब मामला' (एक पुराना अदालती फैसला जिसके तहत किसी आरोपी को अनिश्चितकाल के लिए जेल में नहीं रखा जा सकता) UAPA की धारा 43D(5) का एक बहुत ही सीमित और अपवाद स्वरूप उल्लंघन है, जिसे केवल बेहद खास परिस्थितियों में ही सही ठहराया जा सकता है. पीठ ने कहा कि नजीब मामले के मुख्य संदेश और महत्व को इस तरह कम किया जाना ही उसकी चिंता का विषय है. जस्टिस भुइयां ने कहा कि 'नजीब मामले' को बड़े नजरिए से देखने पर यह पता चलता है कि सिर्फ समय बीतने के आधार पर ही, अगर परिस्थितियां वैसी हों-आरोपी को यांत्रिक रूप से जेल से रिहा होने का अधिकार मिल जाता है. पीठ ने यह भी कहा कि UAPA की धारा 43D(5) के तहत जमानत पर लगी कानूनी रोक एक सीमित पाबंदी होनी चाहिए, जो संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) और 22 (गिरफ्तारी से संरक्षण) के तहत मिलने वाली गारंटी के दायरे में काम करे. पीठ ने साफ तौर पर कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि UAPA कानून के तहत भी जमानत एक नियम है और जेल एक अपवाद. हालांकि, किसी खास मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए जमानत देने से इनकार भी किया जा सकता है.
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के मामलों में भी जमानत एक नियम होना चाहिए और जेल एक अपवाद. इसके साथ ही, अदालत ने 2020 के दिल्ली दंगा मामले में कार्यकर्ता उमर खालिद को जमानत न देने वाले एक अन्य पीठ के पुराने फैसले पर असहमति जताई. जस्टिस बी. वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने यह टिप्पणी जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के हंदवाड़ा निवासी सैयद इफ्तिखार अंद्राबी को जमानत देते हुए की. यह व्यक्ति नार्को-आतंकवाद के एक मामले में जून 2020 से जेल में बंद था, जिसकी जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) कर रही है. पीठ ने जोर देकर कहा कि UAPA के मामलों में भी जमानत मिलना आम बात (नियम) होनी चाहिए. कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ इसलिए किसी आरोपी के तेजी से मुकदमा चलने (speedy trial) के अधिकार को नहीं छीना जा सकता, क्योंकि उस पर इस कड़े आतंकवाद-विरोधी कानून के तहत मामला दर्ज है. सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने 'गुलफिशा फातिमा बनाम राज्य' मामले के फैसले पर असहमति जताई, जो दिल्ली दंगों से जुड़ी जमानत याचिकाओं से संबंधित था. उस मामले में जहां कई आरोपियों को जमानत मिल गई थी, वहीं सुप्रीम कोर्ट ने कार्यकर्ता उमर खालिद और शारजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया था. पीठ की ओर से फैसला सुनाते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि उन्हें गुलफिशा फातिमा मामले के फैसले पर गंभीर आपत्ति है. उन्होंने कहा कि उस मामले का फैसला यह इशारा करता है कि 'नजीब मामला' (एक पुराना अदालती फैसला जिसके तहत किसी आरोपी को अनिश्चितकाल के लिए जेल में नहीं रखा जा सकता) UAPA की धारा 43D(5) का एक बहुत ही सीमित और अपवाद स्वरूप उल्लंघन है, जिसे केवल बेहद खास परिस्थितियों में ही सही ठहराया जा सकता है. पीठ ने कहा कि नजीब मामले के मुख्य संदेश और महत्व को इस तरह कम किया जाना ही उसकी चिंता का विषय है. जस्टिस भुइयां ने कहा कि 'नजीब मामले' को बड़े नजरिए से देखने पर यह पता चलता है कि सिर्फ समय बीतने के आधार पर ही, अगर परिस्थितियां वैसी हों-आरोपी को यांत्रिक रूप से जेल से रिहा होने का अधिकार मिल जाता है. पीठ ने यह भी कहा कि UAPA की धारा 43D(5) के तहत जमानत पर लगी कानूनी रोक एक सीमित पाबंदी होनी चाहिए, जो संविधान के अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) और 22 (गिरफ्तारी से संरक्षण) के तहत मिलने वाली गारंटी के दायरे में काम करे. पीठ ने साफ तौर पर कहा कि इसमें कोई शक नहीं है कि UAPA कानून के तहत भी जमानत एक नियम है और जेल एक अपवाद. हालांकि, किसी खास मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए जमानत देने से इनकार भी किया जा सकता है.

