मोहन भागवत ने जिसे 'बीमारी' कहा, राज ठाकरे ने बताया ' मराठी अस्मिता', संघ प्रमुख के बयान पर जताई नाराजगी - RAJ THACKERAY TELLS RSS

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राज ठाकरे ने भागवत के बयान पर जताई नाराजगी (ETV Bharat)

By ETV Bharat Hindi Team

Published : February 10, 2026 at 10:20 PM IST

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100वीं सालगिरह के मौके पर मुंबई में कार्यक्रम का आयोजन किया गया. इस दौरान सरसंघचालक मोहन भागवत ने भाषाई विवाद को लेकर एक बयान दिया था. उन्होंने टिप्पणी की थी कि 'भाषा के आधार पर बहस करना एक पुरानी बीमारी है'. उन्होंने महाराष्ट्र में चल रहे मराठी बनाम गैरमराठी विवाद का उदाहरण दिया था.

उनके इस बयान पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के अध्यक्ष राज ठाकरे ने नाराजगी जतायी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इस कार्यक्रम में अभिनेता अक्षय कुमार, सलमान खान और फिल्म निर्देशक करण जौहर समेत कई दिग्गज हस्तियां मौजूद थीं. राज ठाकरे ने वहां मौजूद रहने के लिए उन कलाकारों से नाराजगी जतायी. ठाकरे ने सोशल मीडिया पर एक लंबा पोस्ट लिखा.

ठाकरे ने लिखा-"8 फरवरी, 2026 को मुंबई के एक कार्यक्रम में सरसंघचालक मोहन भागवत ने बयान दिया कि भाषा को लेकर आंदोलन करना एक बीमारी है. इस कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों की दिग्गज हस्तियों को आमंत्रित किया गया था, जिनमें से कुछ वहां मौजूद भी थे! मैं मोहनराव भागवत को एक बात बताना चाहता हूं कि वे सभी लोग आपके प्यार की वजह से नहीं, बल्कि नरेंद्र मोदी सरकार के डर से आए थे! वरना, अब तक ऐसे उबाऊ भाषणों में कोई क्यों नहीं आया? इसलिए, पहले हमें इस गलतफहमी से बाहर निकलना चाहिए कि वे लोग आपके लिए आए थे!"

राज ठाकरे ने आगे कहा, "खैर हमारा मानना है कि भागवत को निश्चित रूप से यह इतिहास जानना चाहिए कि इस देश में भाषाई आधार पर राज्यों का गठन क्यों करना पड़ा! अगर भागवत को लगता है कि भाषा के प्रति प्रेम और प्रांत के प्रति प्रेम एक बीमारी है, तो हम उनका ध्यान इस ओर दिलाना चाहेंगे कि यह बीमारी इस देश के अधिकांश राज्यों में मौजूद है. दक्षिण में कर्नाटक से लेकर तमिलनाडु तक, भाषाई और प्रांतीय पहचान बहुत मजबूत है. चाहे पश्चिम बंगाल हो, पंजाब हो या गुजरात, यह भावना वहां भी है."

ठाकरे ने आगे लिखा- "क्या भागवत जी ने कभी यह समझने की कोशिश की है कि असल में यह भावना क्या है? जब देश के 4-5 राज्यों से लोगों की भीड़ दूसरे राज्यों में जाती है, वहां आक्रामक व्यवहार करती है, वहां की स्थानीय संस्कृति को नकारती है, स्थानीय भाषा का अपमान करती है और अपना अलग वर्चस्व बनाने की कोशिश करती है, तब स्थानीय लोगों में गुस्सा पनपता है और उससे एक जनाक्रोश पैदा होता है. क्या आप इसे बीमारी कहेंगे? जब गुजरात से उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को खदेड़ा गया था, तब वे वहां जाकर उन्हें सद्भाव का पाठ पढ़ाने क्यों नहीं गए? उन्होंने कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, पंजाब और पश्चिम बंगाल जाकर वहां भी ऐसे ही सबक क्यों नहीं सिखाए?"

मोहन भागवत ने अपने भाषण में कहा था-"समाज में भाषा के आधार पर कोई भेदभाव नहीं है. जब कुछ लोगों द्वारा ऐसी स्थिति पैदा की जाती है, तो वह केवल कुछ ही लोगों के कारनामों से होती है. इसका मतलब यह नहीं है कि सभी मराठी भाषी लोग तलवारें लेकर निकल आए और दूसरी भाषा बोलने वाले लोग भाले लेकर बाहर निकल आए."

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100वीं सालगिरह के मौके पर मुंबई में कार्यक्रम का आयोजन किया गया. इस दौरान सरसंघचालक मोहन भागवत ने भाषाई विवाद को लेकर एक बयान दिया था. उन्होंने टिप्पणी की थी कि 'भाषा के आधार पर बहस करना एक पुरानी बीमारी है'. उन्होंने महाराष्ट्र में चल रहे मराठी बनाम गैरमराठी विवाद का उदाहरण दिया था.

उनके इस बयान पर महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के अध्यक्ष राज ठाकरे ने नाराजगी जतायी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इस कार्यक्रम में अभिनेता अक्षय कुमार, सलमान खान और फिल्म निर्देशक करण जौहर समेत कई दिग्गज हस्तियां मौजूद थीं. राज ठाकरे ने वहां मौजूद रहने के लिए उन कलाकारों से नाराजगी जतायी. ठाकरे ने सोशल मीडिया पर एक लंबा पोस्ट लिखा.

ठाकरे ने लिखा-"8 फरवरी, 2026 को मुंबई के एक कार्यक्रम में सरसंघचालक मोहन भागवत ने बयान दिया कि भाषा को लेकर आंदोलन करना एक बीमारी है. इस कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों की दिग्गज हस्तियों को आमंत्रित किया गया था, जिनमें से कुछ वहां मौजूद भी थे! मैं मोहनराव भागवत को एक बात बताना चाहता हूं कि वे सभी लोग आपके प्यार की वजह से नहीं, बल्कि नरेंद्र मोदी सरकार के डर से आए थे! वरना, अब तक ऐसे उबाऊ भाषणों में कोई क्यों नहीं आया? इसलिए, पहले हमें इस गलतफहमी से बाहर निकलना चाहिए कि वे लोग आपके लिए आए थे!"

राज ठाकरे ने आगे कहा, "खैर हमारा मानना है कि भागवत को निश्चित रूप से यह इतिहास जानना चाहिए कि इस देश में भाषाई आधार पर राज्यों का गठन क्यों करना पड़ा! अगर भागवत को लगता है कि भाषा के प्रति प्रेम और प्रांत के प्रति प्रेम एक बीमारी है, तो हम उनका ध्यान इस ओर दिलाना चाहेंगे कि यह बीमारी इस देश के अधिकांश राज्यों में मौजूद है. दक्षिण में कर्नाटक से लेकर तमिलनाडु तक, भाषाई और प्रांतीय पहचान बहुत मजबूत है. चाहे पश्चिम बंगाल हो, पंजाब हो या गुजरात, यह भावना वहां भी है."

ठाकरे ने आगे लिखा- "क्या भागवत जी ने कभी यह समझने की कोशिश की है कि असल में यह भावना क्या है? जब देश के 4-5 राज्यों से लोगों की भीड़ दूसरे राज्यों में जाती है, वहां आक्रामक व्यवहार करती है, वहां की स्थानीय संस्कृति को नकारती है, स्थानीय भाषा का अपमान करती है और अपना अलग वर्चस्व बनाने की कोशिश करती है, तब स्थानीय लोगों में गुस्सा पनपता है और उससे एक जनाक्रोश पैदा होता है. क्या आप इसे बीमारी कहेंगे? जब गुजरात से उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों को खदेड़ा गया था, तब वे वहां जाकर उन्हें सद्भाव का पाठ पढ़ाने क्यों नहीं गए? उन्होंने कर्नाटक, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, पंजाब और पश्चिम बंगाल जाकर वहां भी ऐसे ही सबक क्यों नहीं सिखाए?"

मोहन भागवत ने अपने भाषण में कहा था-"समाज में भाषा के आधार पर कोई भेदभाव नहीं है. जब कुछ लोगों द्वारा ऐसी स्थिति पैदा की जाती है, तो वह केवल कुछ ही लोगों के कारनामों से होती है. इसका मतलब यह नहीं है कि सभी मराठी भाषी लोग तलवारें लेकर निकल आए और दूसरी भाषा बोलने वाले लोग भाले लेकर बाहर निकल आए."

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