Lab to Society Conclave: विज्ञान को भरोसे की भाषा चाहिए, सिर्फ आंकड़े काफी नहीं: डॉ. सौम्या स्वामीनाथन
हैदराबाद विज्ञान सम्मेलन में डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने कहा कि विकसित भारत 2047 के लिए विज्ञान को भरोसे और संवाद से जोड़ना जरूरी है.


Published : January 8, 2026 at 5:41 PM IST
हैदराबाद: हैदराबाद में गुरुवार यानी 8 जनवरी 2025 को एक बड़ा राष्ट्रीय विज्ञान संचार सम्मेलन आयोजित किया गया. इस आयोजन की थीम ‘Lab to Society: Role of Science Communication in Building Viksit Bharat 2047’ रखी गई थी. इस साइंस इवेंट में विज्ञान, नीति और मीडिया से जुड़ी देश की प्रमुख हस्तियां एकसाथ एक मंच पर पहुंची. यह दिनभर चलने वाला राष्ट्रीय कॉन्क्लेव बीएम बिरला साइंस सेंटर के भास्कर ऑडिटोरियम में आयोजित किया गया. आयोजन अकादमी फॉर साइंस, टेक्नोलॉजी एंड कम्युनिकेशन ASTC और ईनाडु ग्रुप, ETV, ETV भारत द्वारा किया गया, जिसमें नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज इंडिया NASI तेलंगाना चैप्टर भी सहयोगी रहा.
इस सम्मेलन में भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए, जबकि थीमेटिक गेस्ट ऑफ ऑनर के रूप में विश्व स्वास्थ्य संगठन WHO की पूर्व मुख्य वैज्ञानिक डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने विस्तृत संबोधन दिया. सम्मेलन का फोकस इस बात पर रहा कि विज्ञान को लैब से बाहर निकालकर आम लोगों की ज़िंदगी से कैसे जोड़ा जाए. अपने भाषण में डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने कहा कि वैज्ञानिक सोच केवल शिक्षा संस्थानों से ही नहीं, बल्कि परिवार और मीडिया के ज़रिए भी युवाओं में विकसित होनी चाहिए. आज के दौर में जब इंटरनेट और सोशल मीडिया के ज़रिए जानकारी की बाढ़ आ चुकी है, यह समझना बेहद जरूरी है कि जो कुछ हम ऑनलाइन पढ़ रहे हैं, वह सही भी है या नहीं. उन्होंने कहा कि विज्ञान कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो सिर्फ सफेद कोट पहनकर लैब में की जाए. दवाइयों से लेकर अंतरिक्ष तकनीक और इंटरनेट तक, आज हम जिन सुविधाओं को सामान्य मानते हैं, वे सभी वैज्ञानिक खोजों का नतीजा हैं.
डॉ. स्वामीनाथन ने क्या-क्या कहा
डॉ. स्वामीनाथन ने साफ शब्दों में कहा कि विज्ञान लगातार बदलता रहता है और जैसे-जैसे हमारी समझ गहरी होती है, तथ्य भी अपडेट होते हैं. यह बात आम लोगों तक सही तरीके से पहुंचनी चाहिए, ताकि भरोसा बना रहे. उन्होंने चेताया कि दुनिया भर में विज्ञान पर लोगों का भरोसा कमजोर हो रहा है. कोविड महामारी के दौरान वैक्सीन जैसे बड़े वैज्ञानिक विकास हुए, लेकिन उसी समय झूठी जानकारियों और अफवाहों की एक ‘इन्फोडेमिक’ भी फैली. इसका असर यह हुआ कि कई देशों में लोग टीकों से दूर हो गए और बीमारियां दोबारा लौटने लगीं.
उन्होंने कहा कि केवल फैक्ट्स काफी नहीं होते. जानकारी देना और सही संवाद करना, दोनों अलग बातें हैं. इंसान स्प्रेडशीट में नहीं जीता, वह भरोसेमंद आवाज़ ढूंढता है. इसी वजह से WHO में ‘सोशल लिसनिंग’ जैसे कार्यक्रम शुरू किए गए, ताकि यह समझा जा सके कि लोग किन बातों को लेकर चिंतित हैं और कहां सबसे ज्यादा गलत जानकारी फैल रही है.
डॉ. स्वामीनाथन ने विज्ञान संचार के लिए तीन बड़े बदलावों की बात कही, जो कुछ इस प्रकार हैं:
- पहला, केवल बोलने से आगे बढ़कर लोगों को सुनना.
- दूसरा, डॉक्टरों के साथ-साथ शिक्षकों और फ्रंटलाइन वर्कर्स को भी विज्ञान और स्वास्थ्य संदेशों का वाहक बनाना.
- तीसरा, डेटा के बजाय कहानी के ज़रिए बात कहना, क्योंकि कहानी लोगों के दिल में लंबे समय तक रहती है.
उन्होंने भारत में ‘हिडन हंगर’ यानी सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी, बढ़ते मोटापे, खराब खानपान और वायु प्रदूषण को बड़ी स्वास्थ्य चुनौतियां बताया. साथ ही किसानों की आय, फसल विविधीकरण और जलवायु परिवर्तन पर भी चिंता जताई. उन्होंने कहा कि वायु प्रदूषण सिर्फ पर्यावरण नहीं, बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है.
अपने संबोधन के अंत में डॉ. स्वामीनाथन ने कहा कि विज्ञान को किसी भी राजनीतिक एजेंडे के लिए दबाया नहीं जाना चाहिए. विज्ञान का असली उद्देश्य तभी पूरा होता है, जब उसका फायदा समाज तक पहुंचे. अगर हम ईमानदारी से सुनें, संवेदनशीलता के साथ संवाद करें और स्थानीय संदर्भ में विज्ञान को समझाएं, तो 2047 तक भारत न सिर्फ वैज्ञानिक रूप से आगे होगा, बल्कि विज्ञान पर भरोसा करने वाला देश भी बनेगा.

