ओडिशा के छात्रों ने कंट्रोल लाइन पर हाई-एल्टिट्यूड पर निगरानी के लिए बनाया 5G ड्रोन
बरहामपुर NIST के छात्रों ने उच्च क्षमता वाला 5G ड्रोन विकसित किया है, जो भारत के सबसे कठिन सीमावर्ती इलाकों से अल्ट्रा-लो-लेटेंसी वीडियो प्रसारित करेगा.

Published : November 15, 2025 at 1:43 PM IST
बरहामपुर: बरहामपुर के बाहरी इलाके में स्थित NIST विश्वविद्यालय के इंजीनियरिंग छात्रों ने अगली जनरेशन का 5G-सक्षम ड्रोन बनाया है, जिसके बारे में उनका दावा है कि यह सियाचिन ग्लेशियर और कंट्रोल लाइन (LoC) जैसे उच्च-ऊंचाई वाले सीमावर्ती क्षेत्रों में भारतीय सेना की सहायता कर सकता है. पांच किलोग्राम तक भार ले जाने, हाई-रिज़ॉल्यूशन 5G वीडियो कैप्चर करने और 45 मिनट तक हवा में रहने में सक्षम, यह ड्रोन अब अंतिम परीक्षण चरण में है.
NIST विश्वविद्यालय और गोपालपुर स्थित गोलाबंधा आर्मी एयर डिफेंस कॉलेज के बीच हाल ही में हुए एक समझौता ज्ञापन के तहत विकसित यह प्रोटोटाइप छात्र-नेतृत्व वाले रक्षा इनोवेशन में एक बड़ा कदम है. यह ड्रोन निजी मोबाइल नेटवर्क पर काम कर सकता है, नेटवर्क-शैडो क्षेत्रों में सेना की आंतरिक इंटरनेट प्रणाली के साथ इंटीग्रेट हो सकता है और 30 मिलीसेकंड के लक्ष्य के साथ, मौजूदा समय में 300 मिलीसेकंड की अत्यंत कम देरी के साथ वीडियो प्रसारित कर सकता है.
टीम में NIST के सहायक प्रोफेसर अश्विनी कुमार खुंटिया, NIST इनक्यूबेशन फाउंडेशन के निदेशक सुशांत कुमार साहू, प्रोटोनिक्स ग्रुप के संस्थापक प्रभास राज पाणिग्रही और छात्र गीत कुमार साहू, ओम प्रसाद डोरा और बी दुर्गेश्वर राव शामिल थे.

दुर्गेश्वर राव ने बताया कि ड्रोन को विशेष रूप से दुर्गम इलाकों में संचार की कमी को दूर करने के लिए डिज़ाइन किया गया है. उन्होंने बताया कि, "सियाचिन और कंट्रोल लाइन पर, जहां निजी दूरसंचार नेटवर्क मौजूद नहीं हैं, हमारा ड्रोन सेना के स्थानीय इंटरनेट से जुड़कर 5G-गुणवत्ता वाला वीडियो प्रसारित कर सकता है. इससे ट्रांसमिशन में देरी कम होती है और निगरानी तेज़ और स्पष्ट हो जाती है."
राव ने कहा कि टीम ने ऐसे फीचर्स भी डिजाइन किए हैं, जो ड्रोन को अन्य यूएवी के लिए सिग्नल विस्तारक के रूप में कार्य करने में सक्षम बनाती हैं, जिससे बहु-ड्रोन संचालन के दौरान निगरानी दक्षता में सुधार होता है.
B.Tech छात्र ओम प्रसाद डोरा के अनुसार, यह ड्रोन नेटवर्क-आधारित और रिमोट-संचालित मोड के बीच स्विच कर सकता है. यहां तक कि 5G कनेक्टिविटी न होने वाले क्षेत्रों में भी, यह एक अर्ध-स्वायत्त किलर ड्रोन के रूप में काम कर सकता है, जिसे ज़मीन पर किसी सुरक्षित स्थान से नियंत्रित किया जा सकता है. GPS, उच्च क्षमता वाली बैटरियों, 3X/RX मॉड्यूल, समर्पित एंटेना और विशेष रूप से निर्मित कंट्रोल सॉफ़्टवेयर से लैस, यह ड्रोन दुर्गम इलाकों में भी काम कर सकता है.

इस बीच, विश्वविद्यालय के कुलपति प्रियदर्शन पात्रा ने कहा कि यह गर्व की बात है कि छात्र भारत के तेज़ी से विकसित हो रहे ड्रोन पारिस्थितिकी तंत्र में योगदान दे रहे हैं. उन्होंने आगे कहा कि, "देश भर में, जहां कृषि, पशु-पक्षियों की गतिविधियों पर नज़र रखने, सर्वेक्षण और आपदा प्रबंधन में ड्रोन का इस्तेमाल हो रहा है, वहीं हमारे छात्रों ने ड्रोन इनोवेशन को एक प्रमुख शोध क्षेत्र के रूप में विकसित किया है, जिससे रक्षा संस्थानों के साथ हमारी साझेदारी एक नए स्तर पर पहुंची है."
परिसर में ऑप्टिकल लिंक, रेडियो टावर और निजी नेटवर्क इंटीग्रेशन का इस्तेमाल करके पहले ही प्रदर्शन किए जा चुके हैं. फरवरी में होने वाले वायु रक्षा और सुरक्षा पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन की तैयारियां चल रही हैं, जहां 5G ड्रोन का प्रदर्शन किया जाएगा.

