Chandrayaan-3 के Propulsion Module ने किया कमाल, दो लूनर फ्लाईबाय ने बदल दिया पूरा ऑर्बिट
Chandrayaan-3 का Propulsion Module दो फ्लाईबाय इवेंट्स के बाद नई और ज्यादा बड़ी कक्षा में पहुंच गया, जिससे ISRO को अहम डेटा मिला है.


Published : November 14, 2025 at 8:42 PM IST
हैदराबाद: Chandrayaan-3 का Propulsion Module एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है. यह मॉड्यूल, जो काफी समय से पृथ्वी के इर्द-गिर्द ऊंची कक्षा में घूम रहा था, हाल ही में दो लूनर फ्लाईबाय पूरा कर चुका है. इन फ्लाईबाय इवेंट्स की वजह से न सिर्फ इसकी ऑर्बिट बहुत बड़ी हो गई है, बल्कि इसका झुकाव यानी भी काफी बदल गया है. ISRO के मुताबिक, इस पूरी प्रक्रिया से उन्हें disturbance torques और स्पेसक्राफ्ट पर लगने वाले नैचुरल फोर्सेज को और गहराई से समझने का मौका मिला है, जो आगे की मिशन प्लानिंग के लिए बेहद कीमती साबित होगा.
Chandrayaan-3 का बैकग्राउंड
यह इसरो का तीसरा चांद मिशन था, जिसने अगस्त 2023 में अपने लैंडर और रोवर को चांद की सतह पर उतारा था. उस समय Propulsion Module लगभग 150 किलोमीटर की ऊँचाई पर चांद की कक्षा में घूम रहा था. बाद में उसे TEI यानी Trans-Earth Injection manoeuvre करके उसे Earth-bound हाई ऑर्बिट में शिफ्ट किया गया. यहां यह लगातार पृथ्वी और चांद की ग्रैविटी के बीच बैलेंस में घूमता रहा.
कैसे हुआ फ्लाईबाय का ये पूरा खेल?
4 नवंबर 2025 को इस मॉड्यूल ने चांद के Sphere of Influence (SOI) में एंट्री मार ली थी. यहां आते ही चांद की ग्रैविटी का असर ज़्यादा हो जाता है.
पहला फ्लाईबाय:
- तारीख: 6 नवंबर 2025
- समय: 12:53 PM
- दूरी: 3,740 km
- यह घटना IDSN की विज़िबिलिटी के बाहर हुई
दूसरा फ्लाईबाय:
- तारीख: 12 नवंबर 2025
- समय: 4:48 AM
- दूरी: 4,537 km
- इसे ISDN टीम ने लाइव ट्रैक किया
- मॉड्यूल 14 नवंबर 2025 तक Moon SOI से बाहर निकल जाएगा और Earth-bound ऑर्बिट में अपनी नई राह पकड़ लेगा.
ऑर्बिट और inclination में कितना बदलाव आया?
| पैरामीटर | पहले | अब |
| ऑर्बिट साइज | 1,00,000 × 3,00,000 km | 4,09,000 × 7,27,000 km |
| झुकाव | 34° | 22° |
ISRO ने बताया है कि मॉड्यूल बिल्कुल ठीक है और किसी भी दूसरे लूनर ऑर्बिटर से इसका कोई खतरनाक नज़दीकी सामना नहीं हुआ. इसके सभी सिस्टम्स नॉर्मल काम कर रहे हैं.
क्यों है यह डेटा इतना ज़रूरी?
इन फ्लाईबाय इवेंट्स ने इसरो को यह समझने में मदद दी है कि लंबे समय तक स्पेसक्राफ्ट पर ग्रहों की ग्रैविटी और नैचुरल फोर्सेस कैसे असर डालते हैं. यह ज्ञान भविष्य के डीप-स्पेस मिशनों को और सुरक्षित, सटीक और एफिशिएंट बनाएगा.

