शुभांशु शुक्ला ने डिज़ाइन किया चांद-मंगल के लिए भारतीय घर, समझें BHEEM प्रोजेक्ट की पूरी कहानी
शुभांशु शुक्ला ने ट्रेनिंग के दौरान रिसर्च करके BHEEM नाम का मॉडल बनाया जो पैनल जोड़कर दूसरे ग्रहों पर सुरक्षित घर बना सकता है.


Published : September 2, 2026 at 6:19 PM IST
हैदराबाद: भारत के अंतरिक्ष यात्री यानी एस्ट्रोनॉट ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला ने अपने एक्स (पुराना नाम ट्विटर) अकाउंट से हाल ही में एक खास पोस्ट शेयर की है. इस पोस्ट के जरिए उन्होंने बताया कि रूस से ट्रेनिंग पूरी करके भारत लौटने के बाद उन्होंने भारतीय ट्रेनिंग के दौरान एक अलग काम भी किया था.
उस दौरान शुभांशु ने सिर्फ रॉकेट और ऑर्बिटल मॉड्यूल के बारे में जानने और सीखने के अलावा भविष्य के बारे में भी सोचा. उन्होंने सोचा कि एस्ट्रोनॉट्स जब चंद्रमा या मंगल ग्रह पर उतरेंगे तो कहां रहेंगे? इस सोच का जवाब ढूंढते-ढूढते एक नए BHEEM प्रोजेक्ट का जन्म हुआ, जिसकी चर्चा पिछले चौबीस घंटों से भारत समेत पूरी दुनिया में हो रही है. आइए हम आपको इसके बारे में पूरी जानकारी विस्तार में और बहुत ही आसान भाषा में समझाते हैं.
B.H.E.E.M. — Bharatiya Habitable Expandable Extraterrestrial Habitat.
— Shubhanshu Shukla (@gagan_shux) September 1, 2026
When we returned from our training in Russia, we began the Indian leg of our astronaut training. This involved learning the systems of the launch vehicle and orbital module, along with extensive physical and… pic.twitter.com/2Ubt0FiVbj
BHEEM क्या है?
BHEEM का पूरा नाम है भारतीया एक्स्ट्राटेरेस्ट्रियल एक्सपैंडेबल मॉड्यूलर हैबिटैट (Bhartiya Extraterrestrial Expandable Modular Habitat). इस नाम का पूरा मतलब समझें तो कुछ ऐसा होगा कि, भारत में बना हुआ, पृथ्वी के बाहर का, फैलने की क्षमता वाला और टुकड़ों में जुड़ने वाला आसाव. यह काम बेंगलुरु के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस यानी IISc की अलोके लैब में किया गया. इस काम में शुभांशु शुक्ला के साथ मृत्युंजय बरुआ, अमोघ रविंद्र जाधव, बिमलेंदु महापात्रा और प्रोफेसर अलोके कुमार भी शामिल थे. इन सभी ने मिलकर यह मॉडल तैयार किया है.
शुभांशु शुक्ला ने अपने पोस्ट में साफ लिखा कि अगर बीस साल बाद दूसरे ग्रह पर रहना है तो उसके लिए आज से ही सोचना होगा. सिर्फ ईंट रखने से काम नहीं चलेगा. हमें इसके लिए सबसे पहले कल्पना करनी होगी कि घर कैसा होगा.
BHEEM कैसे काम करता है
अंतरिक्ष में घर बनाना आसान नहीं है. रॉकेट में जगह कम होती है. वजन भी सीमित होता है. पुराने स्पेस स्टेशन बड़े-बड़े टुकड़ों में जाते थे. BHEEM मॉडल इससे अलग है. इसमें छोटे-छोटे पैनल होते हैं. ये पैनल त्रिकोण, वर्ग और पंचकोण के आकार के होते हैं. इन सभी के किनारे एक जैसे लंबे होते हैं, जिनकी लंबाई करीब 2.5 मीटर है.
![(a) Example of a joinery with 4-4-4-3 panel configuration. This shows that the joinery can attach panels that have 4, 4, 4, and 3 sides all having side length of 2.5 m in a counterclockwise order. (b) The angle configuration (81.6, 81.6, 71.1, 71.1) is the in-plane 2D angle that is formed between two consecutive flanges of the joinery when projected on a plane in counterclockwise order. The panel configuration along with the angle configuration can uniquely determine the joinery. (c) 1:12 scale model of a cube module of the habitat. This structure is knock-down and follows the collapsibility principle of ‘Assembly’ [28]. It has 6 panel faces which are made of MDF of 3mm thickness and fabricated by laser CNC. Each panel has a side length of 300mm. The joineries (with panel configuration 4-4-4 and angle configuration 60o -60o -60o ) have been fabricated using FDM 3D printing with PLA filament. The joineries and the panels are assembled seamlessly via nuts and bolts. The purpose of this structure is to understand the junction between the panels and the joinery and their assembly process.](https://imgs.etvbharat.com/etvbharat/prod-images/02-09-2026/27539846_kk.jpg)
इन पैनल्स को जोड़ने के लिए खास जोड़ियां बनी हैं. इन जोड़ियों में सारी जानकारी छिपी होती है, जैसे - कौनसा पैनल किस कोण से जुड़ेगा. सिर्फ सात तरह की जोड़ियों में कई आकार के कमरे बन जाते हैं. जैसे घन, क्यूबोक्टाहेड्रॉन, रॉम्बिक्यूबोक्टाहेड्रॉन और कुछ और बड़े आकार वाले भी.
इन पैनल्स को जब ढेर में रखा जाता है, तो यह काफी कम स्पेस लेते हैं. इतना कम कि एक स्टारशिप के पेलोड में लगभग 422 पैनल्स समा जाते हैं और उसके बाद जब ये पैनल्स डेस्टिनेशन पर पहुंचने के बाद जुड़ेंगे तो इसके अंदर की जगह इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन यानी ISS से लगभग दोगुना हो जाता है. इसके अंदर का एरिया करीब 2130 घन मीटर है.
इंसान की जरूरत क्या है?
डिजाइन बनाने वाले वैज्ञानिकों ने पहले यह सोचा कि अंतरिक्ष यात्री क्या-क्या काम करेंगे. इंसान खाना बनाना, नहाना, व्यायाम करना, मेडिकल जांच, मिशन प्लानिंग, सोना और वेस्ट मैनेजमेंट यानी कचरा का इंतजाम करेंगे. उसके बाद शुभांशु की टीम ने सोचा कि इंसानों के ये सभी काम करने के लिए कितनी जगह चाहिए. इसे लिए उन्होंने कंप्यूटर मॉडल्स बनाए. उसके बाद उन्होंने अलग-अलग माप लिए, फिर इन जगहों को अलग-अलग मॉड्यूल में बांटा.

निजी क्वार्टर, स्वच्छता वाला इलाका, एक्सरसाइज़ वाला हिस्सा, मेडिकल रूम, मिशन प्लानिंग सेंटर आदि. कुछ मॉड्यूल रोजमर्रा की जिंदगी के लिए हरे रंग में दिखाए गए. कुछ मिशन वाले काम के लिए लाल रंग में दिखाए गए. ये मॉडल्स हैच के जरिए एक-दूसरे से जुड़ सकते हैं. अगर एक मॉड्यूल में दिक्कत हो तो बाकी सुरक्षित रह सकते हैं.
वैज्ञानिकों की इस टीम ने BHEEM मॉडल के एक लेआउट में 16 लोगों के लिए जगह बनाई है. पहले स्टेप में काम का मुख्य कमरा, फिर सोने के लिए पर्सनल रूम, फिर स्टोरेज, लैब और आखिर में खेती के लिए ग्रीनहाउस की जगह. ये सबकुछ धीरे-धीरे बढ़ सकता है.

मजबूती की जांच
पैनल और जोड़ियों की मजबूती चेक की गई. कंप्यूटर से सिमुलेशन किया गया. वैज्ञानिकों ने चेक किया कि गुरुत्वाकर्षण यानी ग्रैविटी के दबाव में कितना झुकेगा और कहां पर ज्यादा तनाव होगा. उन्होंने पाया कि सबसे ज्यादा तनाव निचले जोड़ों पर आया, लेकिन वो भी टाइटेनियम जैसे मेटल की सहनशक्ति से काफी कम था. इसका मतलब है कि यह डिज़ाइन सुरक्षित है.
इस मॉडल के पैनल्स को 200 मिलीमीटर मोटे रखे गए हैं. अंदर थर्मल, रेडिएशन और छोटे उल्कापिंड से बचाव की परतें लग सकती हैं. शुभांशु शुक्ला की टीम ने इसमें बाद में अंदर एक सॉफ्ट इन्फ्लेटेबल भी लगाने की बात सोची गई है, जिससे सुरक्षा और मजबूत होगी. इससे अगर बाहर दरार पड़े तो अंदर वाली परत हवा रोक लेगी.

अब टेक्निकल रूप से समझें BHEEM
ऊपर हमने आपको आसान शब्दों में इस मॉडल के बारे में समझाया. अब हम आपको चांद या मंगल पर रहने के लिए बनाए गए घर के मॉडल की टेक्निकल बाते समझाते हैं, जिसे शुभांशु शुक्ला ने अपने एक्स अकाउंट के जरिए एक पीडीएफ फॉर्मेट में शेयर किया है. पीडीएफ के मुताबिक, BHEEM का डिजाइन बॉटम्स-अप और ह्यूमन-सेंटर्ड है.
- वैज्ञानिकों ने पहले नासा के एंथ्रोपोमेट्रिक डेटा से 5वें और 95वें पर्सेंटाइल के इंसान के CAD मॉडल बनाए.
- फिर हर गतिविधि के लिए जगह मापी. उदाहरण के लिए व्यक्तिगत स्वच्छता के कामों के लिए लगभग 1.2 घन मीटर, ईवीए सूट मेंटेनेंस के लिए 4.8 घन मीटर और एडवांस्ड मेडिकल केयर के लिए 5.8 घन मीटर जगह निकाली गई.
- पर्याप्त क्लियरेंस लगभग 0.7 मीटर रखा गया.
- इन अलग-अलग वॉल्यूम को जोड़कर मॉड्यूल बनाए गए.
- जो एक्टिविटीज़ एक-साथ हो सकती हैं या एक जैसी फर्नीचर की जरूरत पड़ती है, उन्हें एक मॉड्यूल में रखा गया. जैसे हाइजीन से जुड़े सारे काम एक जगह पर हो और लैब से जुड़े सारे काम एक जगह.
- प्राइवेट क्वार्टर में चार लोगों के लिए 60 घन मीटर जगह मानी गई.
| विषय | विवरण |
| पैनल के प्रकार | त्रिकोण, वर्ग, पंचकोण |
| पैनल की साइड लंबाई | 2.5 मीटर |
| पैनल की मोटाई | 0.2 मीटर |
| कुल पैनल | 422 (312 वर्ग + 108 त्रिकोण + 2 पंचकोण) |
| स्टैक्ड वॉल्यूम | लगभग 700 घन मीटर |
| डिप्लॉयड वॉल्यूम | लगभग 2130 घन मीटर (ISS से लगभग दोगुना) |
| जोड़ियों की संख्या | 7 |
| एनालिसिस सॉफ्टवेयर | Ansys 2024 R2 |
एक क्यूबोक्टाहेड्रॉन मॉड्यूल लगभग 31 घन मीटर लेटरल वॉल्यूम देता है, जिससे दो लोग आराम से रह सकते हैं. पैनल की साइड लंबाई 2.5 मीटर रखी गई. यह ESA के मून विलेज रिपोर्ट और इंसानों की औसत ऊंचाई 1.8 मीटर को ध्यान में रखकर तय की गई. छत की ऊंचाई कम से कम 2.5 मीटर हो ताकि कम गुरुत्वाकर्षण में चलने-दौड़ने में टक्कर न लगे. हर पैनल की मोटाई 0.2 मीटर है ताकि थर्मल, रेडिएशन और माइक्रो-मीटियोराइट प्रोटेक्शन की परतें लगाई जा सकें.

तीन तरह के पैनल्स
सिर्फ तीन तरह के पैनल (त्रिकोण, वर्ग, पंचकोण) से पांच मुख्य मॉड्यूल चुने गए। ये हैं:
- क्यूब (स्टैक्ड 7.5 घन मीटर, डिप्लॉयड 8 घन मीटर)
- क्यूबोक्टाहेड्रॉन (स्टैक्ड 25 घन मीटर, डिप्लॉयड 77.42 घन मीटर)
- रॉम्बिक्यूबोक्टाहेड्रॉन (स्टैक्ड 32.5 घन मीटर, डिप्लॉयड 136.16 घन मीटर)
- एक्सटेंडेड रॉम्बिक्यूबोक्टाहेड्रॉन (स्टैक्ड 62.5 घन मीटर, डिप्लॉयड 362.49 घन मीटर)
- मॉडिफाइड रॉम्बिकोसिडोडेकाहेड्रॉन (स्टैक्ड 40 घन मीटर, डिप्लॉयड 192.85 घन मीटर)
इनके लिए कुल सात अलग-अलग जोड़ियों की जरूरत है. हर जोड़ी को पैनल कॉन्फिगरेशन (जैसे 4-4-4-3) और एंगल कॉन्फिगरेशन (जैसे 81.6°-81.6°-71.1°-71.1°) से पहचाना जाता है.
उसके बाद वैज्ञानिकों ने इस मॉडल का स्ट्रक्चरल एनालिसिस Ansys 2024 R2 सॉफ्टवेयर से किया. इसे सिर्फ गुरुत्वाकर्षण लोड के तहत देखा गया. एक्सटेंडेड रॉम्बिक्यूबोक्टाहेड्रॉन में सबसे ज्यादा डिफ्लेक्शन लगभग 6.9 मिलीमीटर और सबसे ज्यादा वॉन माइसेस स्ट्रेस लगभग 393 मेगापास्कल पाया गया. यह टाइटेनियम अलॉय की यील्ड स्ट्रेंथ (लगभग 1200 मेगापास्कल) से काफी कम है. इसके अलावा प्रिंसिपल स्ट्रेस वेक्टर से पता चला कि निचली फ्लैंज पर तनाव ज्यादा जमा होता है. बाकी फ्लैंज में टॉर्शनल प्रभाव भी दिखता है.
इन सभी प्रोसेस को फॉलो करने के बाद सिम्युलेशन की वैलिडेशन भी की गई. एक केस में बोल्ट प्रीटेंशन की तुलना एक्सपेरिमेंटल डेटा से की गई. दूसरी में कोने से सपोर्टेड प्लेट के डिफ्लेक्शन की तुलना एनालिटिकल फॉर्मूला से की गई. इन दोनों में ही एरर काफी कम रहा.

पूरे प्रस्तावित लेआउट के लिए 312 वर्ग पैनल, 108 त्रिकोणीय पैनल और 2 पंचकोणीय पैनल यानी कुल 422 पैनल चाहिए, जैसा कि हमने आपको ऊपर भी बताया. इनका स्टैक्ड वॉल्यूम लगभग 700 घन मीटर है. स्टारशिप का पेलोड वॉल्यूम लगभग 800 मीटर है, इसलिए एक लॉन्च में सारे पैनल जा सकते हैं. इसे खोलने यानी डिप्लॉय करने के बाद इसका कुल क्षेत्रफल 2130 घन मीटर हो जाता है.
| मॉड्यूल | स्टैक्ड वॉल्यूम | डिप्लॉयड वॉल्यूम | खास बात |
| क्यूब | 7.5 m³ | 8 m³ | सबसे छोटा |
| क्यूबोक्टाहेड्रॉन | 25 m³ | 77.42 m³ | 2 लोगों के लिए उपयुक्त |
| रॉम्बिक्यूबोक्टाहेड्रॉन | 32.5 m³ | 136.16 m³ | |
| एक्सटेंडेड रॉम्बिक्यूबोक्टाहेड्रॉन | 62.5 m³ | 362.49 m³ | सबसे ज्यादा डिफ्लेक्शन (6.9 mm) |
| मॉडिफाइड रॉम्बिकोसिडोडेकाहेड्रॉन | 40 m³ | 192.85 m³ |
यह सोच जरूरी क्यों है?
चंद्रमा और मंगल पर तापमान बहुत तेज बदलता है. रेडिएशन ज्यादा है. धूल और मिट्टी भी अलग है. वहां ईंट-सीमेंट ले जाना बहुत महंगा पड़ेगा. ऐसे में BHEEM जैसा मॉडल काफी आसान और सस्ता पड़ेगा. टूटा पैनल बदला जा सकता है. लेआउट को भी अलग-अलग मिशन के हिसाब से बदला जा सकता है.
शुभांशु शुक्ला ने कहा कि ट्रेनिंग में रिसर्च का हिस्सा था. उन्होंने स्पेसकाफ्ट से आगे सोचा और कहा कि इंसान कैसे रहेंगे. यही सवाल BHEEM मॉडल का आधार बना. अभी यह सिर्फ एक डिज़ाइन है. असली मटेरियल, सीलिंग, लाइफ सपोर्ट और टेस्टिंग अभी बाकी है, लेकिन इसकी दिशा बिल्कुल साफ है. भारत सिर्फ अंतरिक्ष में जानें की नहीं, बल्कि वहां रहने के बारे में भी सोच रहा है.

BHEEM मॉडल दिखाता है कि छोटे पैनल बड़े सपने पूरे कर सकते हैं. एक रॉकेट में ही पूरा आवाल लेकर जाया जा सकता है. वहां उसे जोड़कर पूरा घर बना सकते हैं और जरूरत पड़ने पर ज्यादा पैनल्स को जोड़कर बड़ा घर बना सकते हैं.

