पकौली की 'गूंज': जहां रेडियो की लहरों पर सवार होकर बेटियां लिख रही हैं गांव की नई तकदीर
आज जब पूरा विश्व रेडियो दिवस मना रहा, तो आइये आपको वैशाली के पकौली गांव लिए चलते हैं. यहां की तस्वीर बदलकर रख दी गई.

Published : February 13, 2026 at 2:49 PM IST
रिपोर्ट : रंजीत पाठक
वैशाली : आज जब दुनिया डिजिटल क्रांति के चरम पर है. जब लोग अपनी उंगलियों के पोरों पर पूरी दुनिया को सिमटा हुआ महसूस करते हैं, तब बिहार के वैशाली जिले का एक छोटा सा गांव 'पकौली' हमें एक अलग ही दुनिया में ले जाता है. यहां की सुबह स्मार्टफोन के शोर से नहीं, बल्कि रेडियो की उस जानी-पहचानी 'खरखराहट' और उसके बाद गूंजने वाली एक मधुर आवाज से होती है. यह आवाज है 'रेडियो गूंज' की.
World Radio Day : 13 फरवरी को जब दुनिया 'विश्व रेडियो दिवस' मना रही है, तब वैशाली के बिदुपुर प्रखंड की राजासन पंचायत का यह छोटा सा रेडियो स्टेशन संचार के सबसे पुराने माध्यम की सार्थकता को नए सिरे से परिभाषित कर रहा है.
दो बेटियां, एक सपना और 'रेडियो गूंज' : इस पूरी कहानी के केंद्र में दो युवा चेहरे हैं, 21 वर्षीया गरिमा सिंह और उनकी साथी 21 वर्षीय रौशिका कुमारी. दोनों ग्रेजुएट हैं, आंखों में बड़े सपने हैं, लेकिन उन सपनों की जड़ें अपने गांव पकौली की मिट्टी में ही धंसी हुई हैं.
"यह बहुत प्राउड की बात है कि अपने ही गांव में रेडियो स्टेशन है और अपने ही गांव में हम लोग यहां कार्यक्रम करते हैं. मुझे इसी लाइन में आगे जाना है. मैं यहां भी सीख रही हूं. खुद पर काम करना है और अच्छे से सीखना है. मैं और रौशिका दोनों मिलकर कार्यक्रम का संचालन करते हैं"- गरिमा कुमारी, आरजे, रेडियो गूंज पकौली

आज से करीब चार वर्ष पहले जब 'सुप्रा मेंटल फाउंडेशन' के राजेश कुमार ने इस गांव में कदम रखा था, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि गांव में ही बना रेडियो गूंज पूरे प्रखंड की सूचना क्रांति का केंद्र बन जाएगा. राजेश कुमार ने ग्रामीणों से संवाद किया, उनकी जरूरतों को समझा और 'रेडियो गूंज' की नींव रखी. दो वर्ष उन्हें सबकुछ को संभालने में लगे और 2 वर्षों से ज्यादा समय हो गया रेडियो गूंज को निर्वाध रूप से प्रसारित होते हुए.
इस तरह खुला रेडियो गूंज : 15 साल पहले जमीन को खरीदा गया. फिर रेडियो गूंज की स्थापना 2200 स्क्वायर फीट की बिल्डिंग में हुई. जहां एक छोटी-मोटे रेडियो स्टेशन के हिसाब से जरूरत के सभी संसाधन मौजूद हैं. जिसमे इंटरव्यू रूम, मिक्सिंग रूम, लाइव रूम और गेस्ट के बैठने की जगह शामिल हैं. कुल भूमि 4500 स्क्वायर फीट में है.
सुपरमेंटल फाउंडेशन के ऑनर राजेश कुमार हैं. उनकी पत्नी माधुरी कुमार वहां स्टेशन मैनेजर हैं. शुरुआत में गरिमा इस मुहिम से जुड़ीं. धीरे-धीरे रौशिका और गांव के अन्य युवाओं का साथ मिलता गया. आज यह 10 लोगों की एक समर्पित टीम है, लेकिन रेडियो पर जिसकी आवाज सबसे ज्यादा पहचानी जाती है, वो गरिमा और रौशिका ही हैं.
सुबह के भजन से शाम की चौपाल तक : रेडियो गूंज का प्रसारण रोजाना सुबह 8 बजे शुरू होता है और शाम 8 बजे तक निर्बाध रूप से चलता है. जिसमें गरिमा और रौशिका दोनों अपनी ड्यूटी सुबह के 7.30 बजे से रात के 8 बजे तक करती हैं. कार्यक्रम की रूपरेखा इतनी व्यवस्थित है कि यह किसी बड़े महानगर के एफएम स्टेशन को टक्कर दे सकती है.
स्टेशन मैनेजर माधुरी कुमार कहती हैं कि हमने अब तक आसपास के ग्रामीणों को ही काम दिया है. वहीं के युवाओं को ट्रेंड किया और उन लोगों को ही काम दिया है. हमारा उद्देश्य लोकल जागरूकता फैलाना है. मेरी कोशिश रहती है कि मैं शनिवार और रविवार वहीं रहूं.

आध्यात्मिक शुरुआत : सुबह की शुरुआत भक्ति संगीत और भजनों से होती है, जो गांव के बुजुर्गों और महिलाओं को सुकून पहुंचाती है. भजन हिंदी के साथ-साथ क्षेत्रीय भाषाओं में होते हैं. रेडियो गूंज पर जब भजन की शुरुआत होती है तो ऐसा लगता है जैसे गांव में सुबह हुआ है.
खेत-खलिहान : दोपहर का समय किसानों के नाम होता है. इसमें मिट्टी की जांच, खाद का सही उपयोग, उन्नत बीज और मौसम के पूर्वानुमान जैसी महत्वपूर्ण जानकारियां साझा की जाती हैं. साथ ही ग्रामीणों को खेती करने के तरीकों के बारे में भी बताया जाता है. किस मौसम में वह क्या खेती करें जिससे उनको आमदनी होगी. फसल को किस बाजार में कैसे बेचें जिससे उनकी आमदनी में इजाफा होगा.
चौपाल और सूचना : बिहार और भारत सरकार की तमाम कल्याणकारी योजनाएं, चाहे वो 'उज्ज्वला योजना' हो या 'आयुष्मान भारत', सहित बिहार सरकार की कई योजनाएं जिसे ग्रामीणों को फायदा हो सकता है, इन बेटियों की आवाज में गांव के हर घर तक पहुंचती है.
स्वास्थ्य और परामर्श : समय-समय पर मेडिकल सलाह और स्वच्छता को लेकर विशेष बुलेटिन चलाए जाते हैं. विभिन्न मौके पर उन्हें बताया जाता है कि किस तरीके से वह सुरक्षित रहें, क्या टीका लें, क्या दवा दें और क्या सावधानी रखें. जिससे ग्रामीणों को काफी मदद मिलती है.
फिल्मी और क्षेत्रीय भाषाओं के गाने : रेडियो गूंज पर तमाम महत्वपूर्ण जानकारी के साथ ही फिल्मी गानों को भी तवज्जो दी जाती है. सबसे बड़ी बात है कि उन गानों को यहां ग्रामीणों के लिए परोसा जाता है जो स्वच्छ और साफ सुथरा हो. इनमें हिंदी गाने भी शामिल होते हैं, मैथिली, भोजपुरी, मगही व बज्जिका भाषाओं के क्षेत्रीय गानों को भी बखूबी समाहित किया जाता है.
"यहां शुरू में भक्ति गीत चलता है. फिर सरकार की जो प्लानिंग होती है, ग्रामीण परिवेश में जो कार्यक्रम होता है, उसका प्रसारण होता है. इसके लिए एक ऐप होता है, जो मोबाइल में हम लोगों ने डाउनलोड किया. इससे हम लोग सीखते हैं. केंद्रीय और बिहार सरकार की योजनाओं को बताया जाता है. हमारे गांव की दो बेटियां हैं जिनकी आवाज हम लोग को सुनने के लिए मिलती है. बहुत अच्छा लगता है."- अनुज कुमार सिंह, स्थानीय
बदलाव की बयार : पकौली के रहने वाले बुजुर्ग रामवृक्ष सिंह, अनिल सिंह जैसे कई ग्रामीण आज रेडियो गूँज को अपनी जीवनशैली का हिस्सा मान चुके हैं. रामवृक्ष सिंह बताते हैं, "पहले हमें सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते थे, लेकिन अब ये बेटियां रेडियो पर ही सब समझा देती हैं. चाहे वो टीकाकरण की तारीख हो या नई फसल के दाम, रेडियो गूंज ने हमें आत्मनिर्भर बना दिया है."
यह बदलाव सिर्फ सूचना तक सीमित नहीं है. यह महिलाओं के आत्मविश्वास से भी जुड़ा है. जब गांव की बहुएं और बेटियां रेडियो पर गरिमा और रौशिका को आत्मविश्वास के साथ बोलते सुनती हैं, तो उन्हें भी अपनी उड़ान के लिए पंख मिलते हैं.
"मैं यहां पर रेडियो गूंज में काम करती हूं. मुझे यहां 7 महीने हो गए. जब से मैं यहां आई हूं, हुत खुशी मिली है. यहां पर मुझे आरजे का काम करना पड़ता है. एडिटिंग भी खुद करती हूं."- रौशिका, आरजे, रेडियो गूंज, पकौली

विश्व रेडियो दिवस पर क्यों खास है पकौली का मॉडल? : यूनेस्को द्वारा घोषित 'विश्व रेडियो दिवस' का इस साल का विषय रेडियो के स्थायित्व और इसके विकास पर केंद्रित है. पकौली का मॉडल यह साबित करता है कि रेडियो कभी 'आउटडेटेड' नहीं हो सकता. यह आज भी सबसे सस्ता, सबसे सुलभ और सबसे विश्वसनीय माध्यम है. खासकर ग्रामीण भारत में, जहां बिजली की आवाजाही और इंटरनेट की धीमी गति अक्सर सूचनाओं के रास्ते का रोड़ा बनती है, वहां रेडियो की तरंगें बिना रुके पहुंचती हैं.
चुनौतियां और भविष्य की राह : गरिमा और रौशिका के लिए यह सफर इतना आसान नहीं था. शुरुआत में गांव के लोगों को यह समझाना मुश्किल था कि एक छोटे से कमरे से निकलने वाली आवाज उनके जीवन में क्या बदलाव लाएगी. लेकिन राजेश कुमार के मार्गदर्शन में सुप्रा मेंटल फाउंडेशन ने इन लड़कियों को न केवल तकनीकी ट्रेनिंग दी, बल्कि उन्हें एक 'कम्युनिटी लीडर' के रूप में भी तैयार किया.

आज ये दोनों बेटियां इसी क्षेत्र में अपना भविष्य देखती हैं. पकौली की यह 'रेडियो गूंज' सिर्फ एक स्टेशन नहीं, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन है. यह कहानी है उन दो बेटियों की, जिन्होंने साबित कर दिया कि अगर इरादे नेक हों और हाथ में संचार का सही माध्यम हो, तो बदलाव के लिए शहर जाने की जरूरत नहीं है. गांव की तरक्की की चाबी गांव की ही बेटियों के हाथ में है.
ये भी पढ़ें :-
बिहार के बैदा गांव में RADIO की ऐसी दीवानगी! FM की धुनें आज भी दिल चुरा लेती हैं गांव की धड़कन

