56 साल से फोटोग्राफी.. 55 देशों की यात्रा, कैमरा लेकर अंटार्कटिका तक पहुंचने वाले डॉक्टर की कहानी
विश्व फोटोग्राफी दिवस पर बात पटना के ऐसे डॉक्टर की, जिनका फोटोग्राफी से 56 साल पुराना प्रेम है. रिपोर्ट- डॉ. रंजीत कुमार

Published : August 19, 2026 at 7:05 AM IST
पटना: किसी डॉक्टर की पहचान आमतौर पर उसके चिकित्सा पेशे से होती है लेकिन पटना के डॉक्टर वरुण सिन्हा की एक दूसरी पहचान भी बेहद खास है. वह यूरोलॉजिस्ट होने के साथ पिछले करीब 55-56 वर्षों से फोटोग्राफी कर रहे हैं। कैमरा उनके लिए महज शौक नहीं, बल्कि प्रकृति, वन्यजीवन और दुनिया को करीब से देखने का माध्यम रहा है.
1970 के दशक में शुरू की फोटोग्राफी: डॉक्टर वरुण ने फोटोग्राफी की शुरुआत उस दौर में की, जब डिजिटल कैमरे और मोबाइल कैमरा जैसी सुविधाएं नहीं थीं. तस्वीर खींचना अपने आप में एक धैर्य और तकनीक का काम हुआ करता था. इसी दौर से शुरू हुआ उनका सफर आज अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच चुका है. फोटोग्राफी के लिए डॉक्टर वरुण को कई अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पुरस्कार मिले हैं.
वाइल्डलाइफ फोटोग्राफी में खास पहचान: डॉक्टर वरुण की तस्वीरों में वन्यजीवन, प्रकृति और दुर्लभ क्षणों को कैद करने की विशेष क्षमता दिखाई देती है. जंगल में घंटों इंतजार कर किसी खास पल को कैमरे में कैद करना उनके फोटोग्राफी सफर का अहम हिस्सा रहा है. भारत की तकरीबन सभी प्रमुख जंगलों में डॉक्टर वरुण वन्य जीव की तस्वीर उतार चुके हैं.
अंटार्कटिका तक पहुंचा कैमरा: फोटोग्राफी डे पर डॉक्टर वरुण की कहानी उन लोगों के लिए मिसाल है, जो अपने पेशे के साथ अपने जुनून को भी जिंदा रखना चाहते हैं.फोटोग्राफी के क्षेत्र में उनके काम को कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों और सम्मानों से नवाजा जा चुका है.उनकी खास उपलब्धियों में अंटार्कटिका तक जाकर फोटोग्राफी करना भी शामिल है.

फोटोग्राफी के क्षेत्र में मिला सर्वोच्च सम्मान: डॉक्टर वरुण को फोटोग्राफी के क्षेत्र में सर्वोच्च सम्मान दे मिला है. साल 2011 में डॉक्टर वरुण को एमएफआईए पी पुरस्कार से सम्मानित किया गया. यह पुरस्कार यूरोपीय बॉडी FIAP के द्वारा दिया जाता है और यूनेस्को द्वारा रिकॉग्नाइज्ड है. फोटोग्राफी के क्षेत्र में इसे सबसे ऊंचा पुरस्कार माना जाता है. चीता पर खींचे गए 20 अलग-अलग फोटोग्राफ के लिए डॉक्टर वरुण को यह पुरस्कार मिला वर्तमान में भारत में आधे दर्जन ऐसे लोग हैं, जिन्हें यह पुरस्कार मिल चुका है.
फोटोग्राफी के लिए अंटार्कटिका तक गए: डॉ वरुण को ARPS रॉयल फोटोग्राफिक समिति इंग्लैंड के द्वारा भी सम्मानित किया गया है. नेचर के ऊपर 15 फोटोग्राफ्स के लिए डॉक्टर वरुण को यह सम्मान हासिल हुआ. इसके अलावा जीएमपीएसए पुरस्कार भी डॉक्टर वरुण को अमेरिका में हासिल हुआ. फोटोग्राफी के लिए डॉक्टर वरुण अंटार्कटिका भी गए और वहां से वन्य जीव की फोटोग्राफी की.

डॉक्टरी और फोटोग्राफी साथ-साथ दो अलग दुनिया: एक तरफ मरीजों के इलाज की जिम्मेदारी और दूसरी तरफ कैमरे के जरिए प्रकृति को देखने की कोशिश डॉक्टर वरुण ने दोनों क्षेत्रों को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाया. उनके लिए फोटोग्राफी तनाव से बाहर निकलने और प्रकृति के साथ जुड़ने का जरिया भी रही.
55-56 साल का यह सफर बताता है कि जुनून उम्र का मोहताज नहीं होता. डॉक्टर वरुण ने मेडिकल प्रोफेशन के साथ फोटोग्राफी को भी लगातार समय दिया और कैमरे के जरिए बिहार से लेकर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों की प्रकृति और वन्यजीवन को देखने-समझने की कोशिश की है.

इंग्लैंड और सऊदी अरब में नौकरी की: डॉ वरुण ने 1974 में मच से मेडिकल की डिग्री हासिल की और फिर 1978 में एम एस की डिग्री प्राप्त किया. डॉ वरुण ने एडिनबरा से 1982 में एफआरसीएस की डिग्री हासिल की और फिर इंग्लैंड के बाद सऊदी अरब में बतौर चिकित्सक नौकरी की डॉक्टर वरुण ने बिहार सरकार में नौकरी नहीं कि सिर्फ प्रैक्टिस पर ही ध्यान लगाए.
"जब मैं फोटोग्राफी शुरू की थी, तब यह काम बेहद चुनौतीपूर्ण और संयम वाला था. सबसे पहले फोटोग्राफी पिनहोल कैमरे के द्वारा की जाती थी. इस कमरे के जरिए फोटो खींचने पर कुछ ही देर फोटो दिखता था और दोबारा आप फोटो नहीं देख सकते थे. फ्रेंच वैज्ञानिक डेग्युरे ने एक तकनीक डेवलप की, जिससे फोटो खींचने के बाद स्टेबल हो गया. हालांकि फोटो बनाने में 8 घंटे का वक्त लगा. आज भी वह फोटो टेक्सास के म्यूजियम में रखा हुआ है."- डॉ वरुण सिन्हा, यूरोलॉजिस्ट सह फोटोग्राफर

फोटोग्राफी में कैसे हुआ बदलाव?: डॉ. वरुण कहते हैं कि बाद में प्लेट कैमरे से फोटोग्राफी शुरू हुई. समय कम लगने लगा लेकिन प्रक्रिया लंबी थी और फोटोग्राफ्स अंधेरे में केमिकल में डुबोकर डेवलप किया जाता था. सिर्फ लाल बत्ती में फोटो डेवलप किए जाते थे. इसके बाद मिंटो कैमरा का दौर आया. मिंटो कैमरा के जरिए मिनट में फोटो निकल जाता था. अब तक फोटो ब्लैक एंड व्हाइट ही निकलता था.
55 से अधिक देशों का कर चुके हैं दौरा: बदलते दौर में फिल्म कैमरा आया और कलर फोटोग्राफ्स का दौर शुरू हुआ. एक फिल्म से फोटो बनाना काफी महंगा हुआ करता था और रील 150 से 200 रुपये में आते थे. प्रिंट करने में 30 से 40 रुपये का खर्चा आता था. अब तो मोबाइल का दौर चुका है और एआई के जमाने में फोटोग्राफी का एडवांसमेंट भी हो चुका है.

डॉ. वरुण कहते हैं, 'फोटोग्राफी हमारा जुनून है और जब तक शरीर साथ देगा, तबतक फोटोग्राफी करता रहूंगा. फोटोग्राफी के सिलसिले में मैं अबतक 55 से अधिक देशों का दौरा कर चुका हूं.'
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