विश्व एनजीओ दिवस 2026: आपके आस-पास के वे संगठन जो बिना शोर मचाए बदल रहे हैं लाखों जिंदगियां
गैर-सरकारी संगठनों को सम्मान देने के लिए विश्व एनजीओ दिवस मनाया जाता है. इसकी शुरुआत 2010 में हुई थी.

Published : February 27, 2026 at 6:33 AM IST
|Updated : February 27, 2026 at 8:10 AM IST
जयपुर: हर वर्ष 27 फरवरी को दुनिया भर में विश्व एनजीओ दिवस (World NGO Day) मनाया जाता है. यह दिन उन लाखों सामाजिक कार्यकर्ताओं, स्वयंसेवकों और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) को सम्मान देने के लिए समर्पित है, जो समाज के कमजोर, वंचित और हाशिए पर खड़े वर्गों के जीवन में बदलाव लाने के लिए निरंतर प्रयासरत हैं. यह केवल उत्सव का दिन नहीं, बल्कि आत्ममंथन और मूल्यांकन का अवसर भी है कि सामाजिक संगठन लोकतंत्र, विकास और मानवाधिकारों की रक्षा में कितने प्रभावी हैं और आगे उनकी क्या भूमिका होनी चाहिए.
विश्व एनजीओ दिवस की पृष्ठभूमि: विश्व एनजीओ दिवस की शुरुआत 2010 में हुई थी और 2014 में इसे वैश्विक स्तर पर औपचारिक मान्यता मिली. इस पहल को European Movement International का समर्थन प्राप्त था और बाद में United Nations सहित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने इसे स्वीकार किया. इस दिवस का उद्देश्य एनजीओ के योगदान को रेखांकित करने के साथ सरकार और समाज के बीच संवाद को प्रोत्साहित करना, सामाजिक संगठनों में पारदर्शिता और जवाबदेही को बढ़ावा देना है. आज यह दिन दुनिया के अनेक देशों में संगोष्ठियों, सेमिनारों, पुरस्कार समारोहों और जन-जागरूकता अभियानों के रूप में मनाया जाता है.
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नाम नहीं, काम से पहचान: सूचना के अधिकार और रोजगार गारंटी जैसे ऐतिहासिक कानूनों की लड़ाई में सक्रिय सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे का मानना है कि किसी भी एनजीओ का मूल्यांकन उसके नाम से नहीं, बल्कि उसके कार्य और प्रभाव से होना चाहिए. उनके अनुसार, लोकतांत्रिक व्यवस्था में यदि सरकार अपने संवैधानिक दायित्वों का पूरी तरह निर्वहन करे तो सामाजिक संगठनों की भूमिका सीमित हो सकती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि समाज के अंतिम व्यक्ति तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचाने में अक्सर सामाजिक संगठनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है. एनजीओ केवल सहायता देने वाली संस्थाएं नहीं हैं, बल्कि वे सामाजिक चेतना जगाने, अधिकारों की रक्षा करने और नीति निर्माण को प्रभावित करने वाले सशक्त माध्यम हैं.

लोकतंत्र और सिविल सोसायटी का गहरा रिश्ता: निखिल डे कहते हैं कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में सिविल सोसायटी की भूमिका ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण रही है. जब-जब सरकार नीति निर्देशक तत्वों के अनुरूप काम करने में असफल रहीं, तब-तब सामाजिक संगठनों ने जन आंदोलन खड़े किए. निखिल डे का कहना है कि कई बार परिस्थितियां ऐसी बन जाती हैं जब जन संगठनों को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ता है. ये आंदोलन केवल विरोध नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की मांग का लोकतांत्रिक माध्यम होते हैं, यदि असहमति की आवाज को “आंदोलनजीवी” कहकर खारिज किया जाए, तो यह लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए चिंता का विषय हो सकता है. लोकतंत्र की मजबूती के लिए आलोचना और संवाद दोनों आवश्यक हैं.

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सूचना का अधिकार, राजस्थान से राष्ट्रीय पहचान: निखिल कहते हैं कि राजस्थान सामाजिक आंदोलनों की भूमि के रूप में जाना जाता है. यहीं से सूचना के अधिकार की लड़ाई ने संगठित रूप लिया. लंबे संघर्षों और जन-सुनवाइयों के बाद 2005 में Right to Information Act, 2005 लागू हुआ. इस कानून ने प्रत्येक नागरिक को सरकारी दस्तावेजों और निर्णयों के बारे में जानकारी प्राप्त करने का अधिकार दिया. इससे शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ी. यह कानून इस बात का उदाहरण है कि जब सिविल सोसायटी और सरकार सहयोग करते हैं, तो ऐतिहासिक बदलाव संभव होते हैं. निखिल कहते हैं कि रोजगार गारंटी कानून, सामाजिक सुरक्षा की मिसाल बना. राजस्थान से शुरू हुई रोजगार गारंटी की अवधारणा बाद में राष्ट्रीय स्तर पर लागू हुई और इसे Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act (मनरेगा) के रूप में जाना गया, मौजूदा सरकार ने इसे जी-रामजी का नाम दिया.

आपदा और संकट के समय एनजीओ की भूमिका: डायन प्रथा जैसी सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ कानून बनाने में भूमिका निभाने वाली सामाजिक कार्यकर्ता निशा सिद्धू कहती हैं कि सामाजिक संगठन की अपनी अलग तरह की भूमिका रही है. महामारी, बाढ़, भूकंप या युद्ध जैसी परिस्थितियों में सामाजिक संगठनों की भूमिका को कोई नकार नहीं सकता. कोविड-19 महामारी के दौरान ऑक्सीजन, भोजन, दवाइयों और प्रवासी श्रमिकों की सहायता में सामाजिक संगठनों ने अग्रणी भूमिका निभाई. निशा ने कहा कि जहां सरकारी तंत्र तक पहुंचने में समय लगता है. वहां स्थानीय एनजीओ तुरंत राहत कार्य प्रारंभ कर देते हैं.
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निशा कहती है कि आज के समय में एनजीओ केवल सहायता देने वाली संस्थाएं नहीं हैं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन के महत्वपूर्ण वाहक हैं. उनकी भूमिका तभी सार्थक होगी जब वे पारदर्शिता, समावेशन और नवाचार के साथ समाज के कमजोर वर्गों की आवाज बने. निशा सिद्धू कहती हैं कि हाल के वर्षों में कुछ सामाजिक संगठनों पर सरकारी जांच और फंडिंग नियमों की सख्ती बढ़ी है. यह तर्क दिया जाता है कि पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए यह आवश्यक है. आलोचनात्मक आवाजों को दबाना लोकतंत्र के लिए उचित नहीं है. लोकतंत्र में असहमति देश विरोधी नहीं, बल्कि स्वस्थ संवाद का संकेत है.
NGOs का मजाक भी बना: निशा का कहना है कि आज देश में अनेक सामाजिक संगठन बेहतरीन कार्य कर रहे हैं और वे वास्तव में गरीबों, महिलाओं, बच्चों और वंचित वर्गों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रहे हैं. ऐसे संगठनों को पहचानना, उनकी मदद करना और उनकी सेवाएं लेना समाज की जिम्मेदारी है, क्योंकि वे सरकार और जनता के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी का काम करते हैं. हालांकि, कुछ गैर-सरकारी संस्थाएं केवल दिखावे के लिए काम करती हैं. कभी-कभी प्रतीकात्मक रूप से कंबल बांटकर या फोटो खिंचवाकर सेवा का प्रचार किया जाता है, जिससे जरूरतमंदों की गरिमा भी आहत होती है.
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निशा का मानना है कि यदि ईमानदारी से काम किया जाए और हर सक्षम व्यक्ति या संस्था एक-एक गांव को गोद लेकर शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार पर ध्यान दे, तो भारत में गरीबी कम करने की दिशा में बड़ा बदलाव संभव है. निशा ने कहा कि इस तरह के NGO के कारण मौजूदा सरकार ने सभी सामाजिक संगठनों को एक ही चश्मे से देखना शुरू कर दिया, जबकि ऐसा नहीं है. सामाजिक संगठनों ने सरकार और आम जनता के बीच विशेष कड़ी की भूमिका निभाई है.
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