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विश्व हिंदी दिवस : डिजिटल और मनोरंजन ने हिंदी को दिलाया विस्तार, ये मानवीय संवेदना की भाषा

विश्व हिंदी दिवस पर जानिए वैश्वीकरण, बाजारवाद और उपभोक्तावादी संस्कृति के दौर में हिंदी आज वैश्विक परिदृश्य में पूरे प्रभाव के साथ मौजूद है...

विश्व हिंदी दिवस पर विशेष
विश्व हिंदी दिवस पर विशेष (ETV Bharat Jaipur)
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : January 10, 2026 at 2:47 PM IST

6 Min Read
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जयपुर : हिंदी आज केवल भारत तक सीमित भाषा नहीं रही, बल्कि वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत पहचान बना रही है. भाषा, संस्कृति, शिक्षा, व्यापार, सिनेमा और डिजिटल माध्यमों के जरिए हिंदी दुनिया के कोने-कोने तक पहुंच रही है. विश्व हिंदी दिवस और अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं.

हिंदी की बढ़ती वैश्विक पहचान : ईटीवी भारत से खास बातचीत में प्रोफेसर सुंदरम शांडिल्य ने बताया कि पहली बार 2006 में विश्व हिंदी दिवस मनाने का विचार सामने आया. इसकी पृष्ठभूमि 10 जनवरी 1975 से जुड़ी है, जब नागपुर में पहला विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित हुआ था. इसी तिथि को प्रतीक मानते हुए हर वर्ष 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस मनाया जाता है. इस दिन भारत के विदेशों में स्थित दूतावासों और सांस्कृतिक केंद्रों में व्याख्यान, संगोष्ठियां और साहित्यिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं, ताकि हिंदी के प्रचार-प्रसार के साथ लोगों में इसके प्रति जागरूकता बढ़ाई जा सके और हिंदी को एक अंतरराष्ट्रीय भाषा के रूप में पहचान मिल सके.

ईटीवी भारत ने हिंदी के प्रोफेसर से खास बातचीत की (ETV Bharat Jaipur)

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समावेशन और मानवीय संवेदना की भाषा : प्रोफेसर मीता शर्मा ने हिंदी की ताकत को रेखांकित करते हुए कवि त्रिलोचन की पंक्तियों का उल्लेख किया कि 'भाषा की लहरों में जीवन की हलचल है, ध्वनि में क्रिया भारी है और क्रिया में बल है'. उन्होंने कहा कि हिंदी की सबसे बड़ी शक्ति उसका समावेशन और बहना है. इन्हीं गुणों के कारण हिंदी आज वैश्विक परिदृश्य में पूरे प्रभाव के साथ मौजूद है. वैश्वीकरण, बाजारवाद और उपभोक्तावादी संस्कृति के दौर में जहां जीवन मूल्यों में कमी देखी जा रही है. वहीं, हिंदी एक ऐसी भाषा है जो मानवीय संवेदनाओं को जोड़ती है. यही नहीं, हिंदी आज बाजार और रोजगार की भी प्रमुख भाषा बन चुकी है.

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हिंदी सिनेमा बना वैश्विक संवाद का माध्यम : वैश्विक स्तर पर हिंदी के प्रसार में हिंदी सिनेमा की भूमिका बेहद अहम रही है. प्रोफेसर मीता ने बताया कि विदेशों में रहने वाले प्रवासी भारतीयों के साथ-साथ विदेशी दर्शक भी हिंदी फिल्मों और गीतों के जरिए भाषा से जुड़ते हैं. दिवंगत अभिनेता राज कपूर का मशहूर गीत 'मेरा जूता है जापानी… फिर भी दिल है हिंदुस्तान' इसका बड़ा उदाहरण है, जिसे रूस की जनता ने भी खूब पसंद किया और बाद में ये गीत रूसी अनुवाद के साथ भी जारी किया गया. हिंदी फिल्मों के गीत भारतीय संस्कृति, परंपरा, लोक जीवन, मिथकों और सामाजिक परिवेश को अभिव्यक्त करते हैं, साथ ही भाषा के शब्द भंडार को भी समृद्ध करते हैं.

इन हिंदी गानों ने विदेशों में भी मचाई धूम :
इन हिंदी गानों ने विदेशों में भी मचाई धूम : (ETV Bharat GFX)

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वैश्वीकरण और बाजार में हिंदी की बढ़ती ताकत : उन्होंने ये भी कहा कि ये भूमंडलीकरण का दौर है, जहां भाषाई साम्राज्यवाद भी देखने को मिलता है. भाषा आज बाजार और प्रभाव बढ़ाने का माध्यम बन चुकी है. भारत एक बड़ा उपभोक्ता बाजार है, इसलिए विदेशी कंपनियां और सरकारें यहां की जनता से जुड़ने के लिए हिंदी को अपनाने लगी हैं. विज्ञापन और ब्रांडिंग में हिंदी शब्दों और वाक्यों का प्रयोग इसका उदाहरण है. 'ठंडा मतलब कोका-कोला' जैसी टैगलाइन ने हिंदी के आम बोलचाल के शब्दों को ब्रांड की पहचान बना दिया.

अब तक हुए अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन :
अब तक हुए अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन : (ETV Bharat GFX)

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अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन से मिली मजबूती : प्रोफेसर मीता शर्मा ने बताया कि हिंदी को विश्व स्तर पर पहुंचाने में अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलनों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है. पहला सम्मेलन 1975 में नागपुर में हुआ और हालिया सम्मेलन 2023 में फिजी में आयोजित किया गया. फिजी, मॉरीशस जैसे 'गिरमिटिया देश' कहलाते हैं, जहां ब्रिटिश शासन के दौरान भारत से मजदूर ले जाए गए थे. ये लोग अपने साथ भाषा, संस्कृति, रामचरितमानस, धर्म और परंपराएं लेकर गए और विदेशों में हिंदी को जीवित रखा. मॉरीशस, फिजी के साथ-साथ गुयाना, त्रिनिदाद, सूरीनाम और टोबैगो जैसे देशों में भी हिंदी आज सक्रिय रूप से जीवित है. वहां हिंदी सम्मेलनों के जरिए भाषा के भविष्य पर गंभीर चर्चा होती है.

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डिजिटल और मनोरंजन ने हिंदी को दिलाया विस्तार : मनोरंजन और डिजिटल माध्यमों की भूमिका पर उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया, ओटीटी प्लेटफॉर्म, सिनेमा और ऑनलाइन कंटेंट ने हिंदी को वैश्विक मंच दिलाने में अहम योगदान दिया है. वर्ष 2015 के अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन में भारतकोश की स्थापना की गई थी, जिसकी शुरुआत आदित्य चौधरी ने की. इस पोर्टल के माध्यम से हिंदी में देश के करीब 7 लाख गांवों तक जानकारी पहुंचाई जा रही है और अब तक इस पर 15 हजार से अधिक लेख प्रकाशित हो चुके हैं. ये भारतीय संस्कृति और सभ्यता को जानने का एक सशक्त माध्यम बन चुका है.

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तकनीक से जुड़कर आगे बढ़ रही है हिंदी : वहीं, प्रोफेसर शांडिल्य ने विश्व हिंदी डेटाबेस का भी उल्लेख किया, जो एक ऑनलाइन मंच के रूप में हिंदी के विद्वानों, संस्थाओं और संगठनों को जोड़ने का काम कर रहा है. इसके जरिए हिंदी के प्रचार-प्रसार, शोध और विकास से जुड़े प्रयासों को एक साझा मंच मिलता है. उन्होंने कहा कि सूचना क्रांति के इस युग में हिंदी को तकनीक से जोड़ने के लिए लगातार नए प्रयोग किए जा रहे हैं. कुल मिलाकर, हिंदी आज डिजिटल युग में वैश्विक पहचान बना रही है. युवाओं के बीच इसका आकर्षण बढ़ रहा है. शिक्षा, रोजगार, बाजार, संस्कृति और तकनीक के हर क्षेत्र में हिंदी अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा रही है. यही वजह है कि हिंदी अब केवल भारत की भाषा नहीं, बल्कि विश्व मंच पर उभरती एक प्रभावशाली भाषा बन रही है.