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अगले 5 महीने में बदल जाएगी मदरसों की किताबें, अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के लिए बन रहा सिलेबस

उत्तराखंड में मदरसों के साथ ही बाकी अल्पसंख्यकों से जुड़े शैक्षणिक संस्थानों के लिए भी नए सिलेबस पर काम शुरू हो चुका है.

CM Pushkar Singh Dhami
जल्द बदलेगा अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों का सिलेबस (Photo-ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttarakhand Team

Published : February 21, 2026 at 6:45 AM IST

4 Min Read
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देहरादून: उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा व्यवस्था एक बड़े बदलाव की ओर बढ़ रही है. राज्य सरकार ने मदरसों के साथ-साथ अन्य अल्पसंख्यक समुदायों द्वारा संचालित शैक्षणिक संस्थानों के लिए एक समान व्यवस्था लागू करने की दिशा में काम शुरू कर दिया है. इसके तहत न सिर्फ नए सिलेबस की तैयारी हो रही है, बल्कि इन संस्थानों के संचालन के लिए रूल एंड रेगुलेशन भी बनाए जा रहे हैं. सरकार ने इसके लिए 1 जुलाई तक की समय सीमा तय की है.

यह पहला मौका है जब उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा को लेकर इतनी व्यापक और केंद्रीकृत व्यवस्था लागू की जा रही है. सरकार का उद्देश्य मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी समुदायों द्वारा स्थापित शैक्षणिक संस्थानों को एक ही छतरी के नीचे लाना है, ताकि सभी के लिए समान नियम, मानक और शिक्षा गुणवत्ता सुनिश्चित की जा सके. खास तौर पर मदरसों के लिए यह बदलाव ऐतिहासिक और बेहद अहम माना जा रहा है.

बदल जाएगी मदरसों की किताबें (Video-ETV Bharat)

राज्य सरकार पहले ही उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम को लागू कर चुकी है. इसी अधिनियम के तहत एक नए प्राधिकरण का गठन किया गया है, जो अब इन सभी संस्थानों की मान्यता, निगरानी और संचालन से जुड़े फैसले करेगा. सरकार की योजना है कि 1 जुलाई से पहले-पहले मदरसा बोर्ड को भंग कर दिया जाए और उसके बाद पूरी शिक्षा व्यवस्था इस नए प्राधिकरण के अधीन आ जाए.

CM Pushkar Singh Dhami
अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के न्यू सिलेबस पर गंभीर सरकार (Photo-ETV Bharat)

इस नई व्यवस्था में दो बड़े मोर्चों पर काम चल रहा है. पहला छात्रों के लिए ऐसा सिलेबस तैयार करना जो आधुनिक शिक्षा मानकों के अनुरूप हो और दूसरा मदरसों व अन्य अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों के संचालन के लिए स्पष्ट नियम-कानून तय करना है. इन नियमों में यह भी निर्धारित किया जाएगा कि अगर कोई संस्था मानकों का पालन नहीं करती है तो उसके खिलाफ किस तरह की कार्रवाई की जाएगी.
पराग मधुकर धकाते, विशेष सचिव, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग

धामी सरकार का मानना है कि लंबे समय से अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों की शिक्षा व्यवस्था अलग-अलग नियमों और बोर्डों के तहत चल रही थी, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता और मानकीकरण में अंतर देखने को मिलता था. अब नई प्रणाली के तहत इन संस्थानों में भी उत्तराखंड बोर्ड के मानकों के अनुसार शिक्षा लागू की जाएगी और वही सिलेबस पढ़ाया जाएगा जो प्राधिकरण द्वारा तय किया जाएगा. हालांकि सरकार के इस फैसले को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर विरोध भी सामने आ रहा है.

Minority Educational Institutions
देहरादून स्थित अल्पसंख्यक कल्याण भवन (Photo-ETV Bharat)

मदरसा बोर्ड को भंग करने का निर्णय बिना किसी व्यापक सलाह-मशविरा और संवाद के लिया गया है. अब जो नया सिलेबस और शिक्षा ढांचा तैयार किया जा रहा है, उसमें भी अल्पसंख्यक समाज की राय नहीं ली जा रही. आजाद अली का आरोप है कि अल्पसंख्यक समाज न तो इस प्राधिकरण को मान्यता देता है और न ही इस सिलेबस को स्वीकार करेगा, ऐसे में आने वाले समय में यह मामला अदालत तक पहुंच सकता है.
आजाद अली, अध्यक्ष जन अधिकार पार्टी

सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि ऐसा सिलेबस तैयार किया जाए जो एक तरफ आधुनिक शिक्षा, विज्ञान और रोजगार से जुड़ी जरूरतों को पूरा करे, वहीं दूसरी तरफ अल्पसंख्यक समुदायों की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का भी सम्मान करे. सिलेबस तैयार करते समय यह कोशिश की जा रही है कि धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान और भाषा जैसे विषयों पर भी विशेष जोर दिया जाए.

राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के गठन की अधिसूचना पहले ही जारी की जा चुकी है और इसमें अध्यक्ष समेत कई सदस्यों की नियुक्ति हो चुकी है. नई व्यवस्था के तहत अब सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को इसी प्राधिकरण से मान्यता लेनी होगी. प्राधिकरण न सिर्फ नियमों के पालन की निगरानी करेगा, बल्कि वित्तीय गड़बड़ियों या अन्य अनियमितताओं की स्थिति में कार्रवाई की संस्तुति भी करेगा.

उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा व्यवस्था एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है. आने वाले पांच महीनों में मदरसों की किताबें, सिलेबस और संचालन प्रणाली पूरी तरह बदल सकती है. यह बदलाव शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगा या विवादों को और गहरा करेगा, इसका फैसला आने वाला समय करेगा.

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