'गाजर' घोल रही है इनके जीवन में मिठास, गिरिडीह में बंजर भूमि पर हल चलाकर महिलाएं बदल रहीं किस्मत
गिरिडीह जिले के मोतीलेदा पंचायत में महिलाएं खेती करके खुद को आत्मनिर्भरता की ओर ले जा रही है.

Published : January 9, 2026 at 2:09 PM IST
गिरिडीह: कभी घर की चारदीवारी में सिमटी रहने वाली महिलाएं आज बंजर समझी जाने वाली जमीन पर मेहनत की फसल उगाकर किस्मत बदल रही हैं. अपने हाथों की ताकत और हौसलों के दम पर ये महिलाएं न सिर्फ अपनी आजीविका संवार रही हैं बल्कि अपने जीवन में आत्मनिर्भरता की मिठास भी घोल रही हैं.
खेती से आर्थिक संपन्नता की ओर
गिरिडीह जिले के बेंगाबाद प्रखंड अंतर्गत मोतीलेदा पंचायत में महिलाओं की मेहनत की एक ऐसी ही प्रेरक तस्वीर देखने को मिल रही है. यहां महिला किसान बड़े पैमाने पर गाजर की खेती कर खुद को आर्थिक रूप से मजबूत बना रही हैं. ग्राम संगठन और स्वयं सहायता समूह से जुड़ी महिलाएं, अब खेती को सिर्फ आजीविका नहीं बल्कि आत्मसम्मान का जरिया बना चुकी हैं.
पंजाब की तर्ज पर आधुनिक तकनीक
महिला कृषकों की मेहनत से उनके जीवन स्तर में ना सिर्फ सुधार हो रहा है बल्कि मिठास भी घुल रहा है. मोतीलेदा में पहली बार लगभग 4 से 5 एकड़ भूमि पर महिला कृषकों द्वारा गाजर की खेती की जा रही है. यह खेती पंजाब की तर्ज पर आधुनिक तकनीक के साथ की जा रही है. इस पहल में गांव की करीब 24 से अधिक महिला किसान शामिल हैं, जो अपने-अपने खेतों में गाजर की खेती कर रही हैं. कभी जो जमीन बंजर पड़ी रहती थी, आज उसी जमीन पर फसल लहरा रही है.

जेएसएलपीएस ने दिया प्रशिक्षण तो शुरू की उन्नत खेती
वैसे यहां की महिलाएं गाजर की खेती पहले भी करती रहीं थीं, लेकिन पैदावार सही नहीं होता था. इस बीच बेंगाबाद जेएसएलपीएस की ओर से इन महिलाओं को गाजर की उन्नत खेती का प्रशिक्षण दिया गया था. चूंकि पहले यहां महिलाएं पारंपरिक तरीके से गाजर की खेती करती थी. प्रशिक्षण के बाद इस वर्ष नई तकनीक अपनाते हुए कियारी और बेड पद्धति से खेती की गई, जिसका असर सीधे उत्पादन पर दिखा है.

गाजर के साथ-साथ मटर, गोभी और दूसरी सब्जियों की भी खेती
महिलाओं का लक्ष्य है कि आने वाले सालों में और भी बड़े स्तर पर खेती की जाए. खेती में जुटी एसएचजी से जुड़ी महिला कृषक आशा वर्मा, कविता कुमारी, लक्ष्मी कुमारी, बिनती देवी और सुनीता देवी बताती हैं कि वे पूरी तरह कृषि पर निर्भर हैं. गाजर के साथ-साथ मटर, गोभी और अन्य सब्जियों की भी खेती की जाती है. पहले सीमित पैमाने पर उत्पादन होता था, लेकिन अब तकनीक बदलने से पैदावार और आमदनी दोनों में बढ़ोतरी हुई है.
जैविक तकनीकी से खेती
महिलाओं का कहना है कि वे पूरी तरह जैविक विधि से खेती कर रही हैं. रासायनिक खाद और कीटनाशकों का प्रयोग नहीं किया जाता, जिससे फसल की गुणवत्ता भी बेहतर है. नई तकनीक अपनाने से उत्पादन पहले की तुलना में काफी बढ़ गया है. महिला कृषकों ने बताया कि प्रत्येक किसान 15 से 20 डिसमिल जमीन पर खेती कर रही है. 10 डिसमिल में गाजर की खेती से लगभग 6 से 7 क्विंटल उत्पादन होता है, जिससे उन्हें 15 से 20 हजार रुपये तक का मुनाफा मिल जाता है.

जैविक खेती और आधुनिक तकनीक का तालमेल
एसएचजी से जुड़े किसान कोलेश्वर वर्मा और बिनोद वर्मा बताते हैं कि महिला, किसान प्रशिक्षण पाकर काफी उत्साहित हैं. जैविक खेती और आधुनिक तकनीक के सहारे वे बेहतर उत्पादन कर रही हैं और आत्मनिर्भर बन रही हैं. उन्होंने बताया कि इस वर्ष मोतीलेदा में लगभग 5 एकड़ भूखंड पर महिला कृषक गाजर की खेती कर रही हैं. एक एकड़ में करीब 65 क्विंटल गाजर का उत्पादन होता है, जिससे लगभग 2 लाख रुपये की आमदनी हो जाती है. गाजर की खेती में प्रति एकड़ 20 से 25 हजार रुपये का खर्च आता है.
सिंचाई की सुविधा नहीं
हालांकि, खेती में कुछ चुनौतियां भी हैं. महिला किसानों का कहना है कि सिंचाई की सुविधा पूरी तरह उपलब्ध नहीं है. खेतों तक बिजली नहीं पहुंचने के कारण डीजल पंप के सहारे सिंचाई करनी पड़ती है, जिससे लागत बढ़ जाती है. यदि बिजली की व्यवस्था हो जाए, तो कम खर्च में बड़े पैमाने पर खेती संभव है. कुल मिलाकर, मोतीलेदा की ये महिला किसान आज न सिर्फ खेतों में गाजर उगा रही हैं बल्कि समाज में महिला सशक्तिकरण की एक मजबूत मिसाल पेश कर रही हैं.
ये भी पढ़ें- कड़ाके की ठंड से फसल भी हो रहे बर्बाद, किसानों के छूट रहे पसीने

