रांची में हर्बल अबीर-गुलाल बना रही महिलाएं, बाजार के अभाव में बढ़ी चिंता
रांची में हर्बल अबीर गुलाल बनाने वाली महिलाएं बाजार के अभाव से परेशान हैं. बाजार मुहैया कराने के लिए सरकार से मांग की है.

Published : March 3, 2026 at 2:24 PM IST
रिपोर्ट: चंदन भट्टाचार्य
रांची: रंगों के पर्व होली के मौके पर जहां बाजारों में केमिकल युक्त रंगों की भरमार रहती है. वहीं दूसरी ओर कई महिलाएं घरेलू उत्पादों से शुद्ध हर्बल अबीर और गुलाल तैयार कर आत्मनिर्भर बनने की कोशिश कर रही हैं. बावजूद इसके, उन्हें इस बात का मलाल है कि प्राकृतिक और त्वचा के लिए सुरक्षित रंग तैयार करने के बाद भी उन्हें उचित बाजार और खरीदार नहीं मिल पा रहा है.
कम लागत में तैयार होता है अबीर-गुलाल
इस वर्ष भी रांची के एक महिला समूह ने कम लागत में घरेलू सामग्रियों से अबीर और गुलाल तैयार किया, लेकिन बिक्री के पर्याप्त अवसर नहीं मिलने के कारण उन्हें आर्थिक नुकसान झेलना पड़ रहा है. महिलाओं का कहना है कि वे पूरी सावधानी और पारंपरिक विधि से हर्बल रंग तैयार करती हैं. गुलाल बनाने के लिए वे बेसन या कॉर्न फ्लोर का उपयोग करती हैं. जिसमें चुकंदर, पालक, हल्दी, कचरी और टेसू के फूलों से निकाले गए प्राकृतिक रंग मिलाए जाते हैं.
अलग-अलग वनस्पति से तैयार होता है रंग
लाल रंग के लिए चुकंदर को सुखाकर उसका पाउडर तैयार किया जाता है. हरे रंग के लिए सूखी पालक या मेहंदी का प्रयोग होता है. जबकि पीले रंग के लिए हल्दी को बेसन के साथ मिलाया जाता है. इसी तरह टेसू के फूलों को उबालकर प्राकृतिक केसरिया रंग तैयार किया जाता है. इन रंगों को कई बार छानकर मुलायम बनाया जाता है, ताकि यह त्वचा पर सुरक्षित और आंखों के लिए नुकसानदायक न हो.

केमिकल वाले सस्ते रंग में दब जाते हैं हर्बल रंग
महिला समूह की सदस्य बताती हैं कि इस काम में काफी मेहनत और समय लगता है. पहले कच्चे माल को इकट्ठा करना, फिर उसे सुखाना, पीसना और पैकिंग करना, पूरी प्रक्रिया में कई दिन लग जाते हैं. इसके बावजूद बाजार में केमिकल वाले सस्ते रंगों की भरमार के कारण लोग कम कीमत की ओर आकर्षित हो जाते हैं. हर्बल रंग की लागत अधिक होने से उसकी कीमत भी थोड़ी ज्यादा पड़ती है. जिससे ग्राहकों की संख्या सीमित रह जाती है.
प्रशासन से बाजार उपलब्ध कराने की मांग
महिलाओं का कहना है कि यदि उन्हें स्थानीय प्रशासन या किसी संस्था की ओर से बाजार उपलब्ध कराया जाए, मेलों में स्टॉल लगाने के अवसर मिले या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से जोड़ा जाए, तो वे अपने उत्पाद को बेहतर तरीके से बेच सकती हैं. फिलहाल वे अपने स्तर पर कॉलोनी और आसपास के इलाकों में बिक्री की कोशिश कर रही हैं. लेकिन उतनी बिक्री नहीं हो पा रही है, जितनी उम्मीद थी. कई बार तैयार माल बच जाता है, जिससे पूंजी फंस जाती है और अगली बार उत्पाद के लिए संसाधन जुटाना मुश्किल हो जाता है.
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