रामनगर की महिलाएं तैयार कर रहीं हर्बल कलर, न आंखों में जलन, न चेहरे पर एलर्जी
रामनगर में महिलाएं होली के लिए हर्बल गुलाल तैयार कर रही हैं. इन रंगों से त्वचा को किसी भी प्रकार का नुकसान नहीं है.

By ETV Bharat Uttarakhand Team
Published : February 28, 2026 at 7:23 PM IST
रामनगर: होली का त्योहार नजदीक है और रंगों की बाजार में भरमार है. लेकिन अगर आप केमिकल वाले रंगों से त्वचा को होने वाले नुकसान से बचना चाहते हैं तो रामनगर के पास स्थित कानियां ग्रामसभा की महिलाओं ने इसका बेहतरीन विकल्प तैयार किया है. यहां महिलाएं पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से हर्बल गुलाल बना रही हैं. जिसकी मांग स्थानीय स्तर से लेकर महानगरों तक पहुंच चुकी है.
होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि आपसी प्रेम, भाईचारे और सौहार्द का प्रतीक है. लोग पुराने गिले-शिकवे भूलकर एक-दूसरे को रंग लगाते हैं और खुशियां बांटते हैं. लेकिन पिछले कुछ सालों में बाजार में मिलने वाले केमिकल युक्त रंगों ने कई लोगों को परेशानी में डाला है. त्वचा पर एलर्जी, आंखों में जलन और बालों को नुकसान जैसी समस्याएं आम हो गई हैं. ऐसे में लोग अब सुरक्षित और प्राकृतिक विकल्प तलाश रहे हैं. इसी मांग को समझते हुए रामनगर की कानियां ग्रामसभा में वुमन रिसोर्सेज सेंटर (WRC) समूह की महिलाओं ने हर्बल गुलाल तैयार करने की अनोखी पहल शुरू की है. यह समूह देहरादून से संचालित पद्मश्री सम्मानित पर्यावरणविद् डॉ. अनिल जोशी के संस्थान हिमालयन एनवायरनमेंटल स्टडीज़ एंड कंजरवेशन ऑर्गनाइजेशन (HESCO) के अंतर्गत कार्य कर रहा है. इस पहल का उद्देश्य महिलाओं को रोजगार उपलब्ध कराना और पर्यावरण के अनुकूल उत्पाद तैयार करना है.
समूह की सदस्य गंगा बिष्ट और हेमा जीना बताती हैं कि गुलाल बनाने में पूरी तरह प्राकृतिक सामग्री का उपयोग किया जाता है. सबसे पहले आरारोट पाउडर को आधार (बेस) के रूप में लिया जाता है. इसके बाद विभिन्न सब्जियों, फलों और फूलों से रंग निकाला जाता है. चुकंदर से गुलाबी रंग तैयार किया जाता है. पालक और धनिया से हरा रंग बनता है. हल्दी से पीला रंग प्राप्त होता है. गेंदा के फूल से नारंगी रंग तैयार किया जाता है.

इन सभी प्राकृतिक स्रोतों से रस निकालकर उसे आरारोट में मिलाया जाता है. मिश्रण को अच्छी तरह मिलाने के बाद धूप में सुखाया जाता है. जब यह पूरी तरह सूख जाता है, तो इसे मिक्सी में बारीक पीसा जाता है. फिर छन्नी से छानकर एकदम महीन और मुलायम गुलाल तैयार किया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के केमिकल या कृत्रिम रंग का इस्तेमाल नहीं किया जाता.

इस पहल से वर्तमान में 12 से अधिक महिलाएं सीधे तौर पर जुड़ी हुई हैं. महिलाएं बताती हैं कि इस कार्य से वे आत्मनिर्भर बनी हैं और अपने परिवार की आय में सहयोग कर रही हैं. गंगा बिष्ट और हेमा जीना बताती हैं कि हम पूरी तरह ऑर्गेनिक चीजों पर काम करते हैं. हमारे यहां बनाए जाने वाले सभी रंग प्राकृतिक होते हैं और त्वचा के लिए सुरक्षित हैं. हेमा जीना कहती हैं कि समूह से जुड़कर उन्हें न सिर्फ आय का साधन मिला है बल्कि आत्मविश्वास भी बढ़ा है.

उन्होंने बताया कि पिछले साल समूह ने लगभग 2 क्विंटल हर्बल रंग तैयार किया था. लेकिन इस बार मांग में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. अब तक करीब 4 क्विंटल गुलाल का ऑर्डर मिल चुका है. समूह को उम्मीद है कि इस बार उत्पादन 5 क्विंटल से भी अधिक रहेगा.

स्थानीय रिसॉर्ट्स और दुकानदार बड़ी मात्रा में हर्बल गुलाल खरीद रहे हैं. इसके अलावा दिल्ली और मुंबई जैसे महानगरों से भी लगातार ऑर्डर मिल रहे हैं. पर्यावरण के प्रति बढ़ती जागरूकता और त्वचा सुरक्षा को लेकर लोगों की चिंता ने हर्बल रंगों की मांग को बढ़ावा दिया है. महिलाओं का कहना है कि केमिकल रंग जहां त्वचा और आंखों को नुकसान पहुंचाते हैं. वहीं जल स्रोतों और मिट्टी को भी प्रदूषित करते हैं. इसके विपरीत, प्राकृतिक रंग आसानी से नष्ट हो जाते हैं और पर्यावरण पर कोई दुष्प्रभाव नहीं छोड़ते. हर्बल गुलाल त्वचा के लिए सुरक्षित है और बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक सभी इसे बिना डर के इस्तेमाल कर सकते हैं.

कानियां ग्रामसभा की महिलाओं की यह पहल सिर्फ रंग बनाने तक सीमित नहीं है. बल्कि यह महिला सशक्तिकरण और आत्मनिर्भरता की मिसाल बन चुकी है. समूह से जुड़ी महिलाएं कहती हैं कि उन्हें इस काम से आर्थिक मजबूती के साथ-साथ समाज में पहचान भी मिली है. वे अब अपने पैरों पर खड़ी हैं और अपने हुनर से दूसरों के लिए प्रेरणा बन रही हैं.
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