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बिहार का 'खादी गांव'..जहां महिलाओं ने चरखा चलाकर बदल दी किस्मत

मोतिहारी के सुंदरपुर की महिलाएं चरखे से आत्मनिर्भर बन रही हैं. सुंदरपुर की खादी ब्रांड बनती जा रही है. ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर भी डिमांड है-

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आत्मनिर्भरता की उड़ान (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Bihar Team

Published : January 10, 2026 at 4:02 PM IST

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मोतिहारी : बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के मोतिहारी में स्थित सुंदरपुर गांव आज चरखों की चारों तरफ मधुर आवाज आ रही है, यहां की महिलाएं खादी ग्रामोद्योग को नई ऊंचाइयों पर ले जा रही हैं. गांव की हर गली-नुक्कड़ पर चरखा चल रहा है. हाथ से बुनी गई खादी न केवल उनकी आजीविका का स्रोत बनी हुई है, बल्कि उनकी पहचान भी बन चुकी है. महात्मा गांधी के स्वदेशी आंदोलन की याद दिलाते हुए ये महिलाएं आधुनिक बाजार में अपनी खादी को पहुंचा रही हैं, जिससे गांव की आर्थिक स्थिति में जबरदस्त सुधार हो रहा है.

आत्मनिर्भरता की उड़ान : सुंदरपुर गांव, जो कभी गरीबी और बेरोजगारी की मार झेल चुका था, आज आत्मनिर्भरता का प्रतीक बन गया है. लगभग 2,000 की आबादी वाले इस गांव में करीब 500 महिलाएं खादी उत्पादन से जुड़ी हुई हैं. गांव की सरपंच राधा देवी बताती हैं कि हमारे गांव में चरखा केवल एक उपकरण नहीं, बल्कि स्वावलंबन का प्रतीक है.

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हैंडलूम पर काम करतीं महिलाएं (ETV Bharat)

''पहले महिलाएं घरों तक सीमित थीं, लेकिन अब वे खादी बुनकर अपनी कमाई कर रही हैं. मैं खुद एक बुनकर हूं और मैने 2018 में सुंदरपुर खादी महिला समूह की स्थापना की थी. यह समूह अब जिला उद्योग केंद्र से जुड़कर सरकारी योजनाओं का लाभ उठा रहा है.''- राधा देवी, सरपंच, सुंदरपुर

खादी उत्पादन की शुरुआत और चुनौतियां : सुंदरपुर में खादी का सफर 2015 से शुरू हुआ, जब स्थानीय एनजीओ 'ग्रामीण विकास मंच' ने महिलाओं को चरखा चलाना सिखाया. शुरुआत में केवल 20 महिलाएं थीं, लेकिन आज संख्या में तेजी से इजाफा हो गया है. रमा जैसी कई मजबूर और गरीब महिलाओं ने अपनी जिंदगी खादी से जुड़कर बदली है. हालाकि चुनौतियां इस राह में भी कम नहीं है.

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हाथकरघे पर खादी का कपड़ा बनाती आत्मनिर्भर महिला (ETV Bharat)

"मैं दो बच्चों की मां हूं और विधवा हूं. चरखा चलाने से पहले मजदूरी करती थी, जहां दिनभर की मेहनत के बाद भी 200 रुपये ही मिलते थे. अब मैं महीने में 12,000 रुपये कमाती हूं."- रमा देवी, चरखा चलाने वाली महिला कामगार

यहां हर साल बनते हैं 10 लाख मीटर कपड़ा : कच्चे सूत की कमी, बाजार तक पहुंच और मशीनरी की पुरानी तकनीक ने शुरुआत में परेशान किया. लेकिन जिला प्रशासन की मदद से 2022 में गांव में एक आधुनिक खादी प्रसंस्करण इकाई स्थापित हुई. यह इकाई सोलर पावर से चलती है, जो पर्यावरण के अनुकूल है. खादी ग्रामोद्योग बोर्ड के अनुसार, सुंदरपुर अब प्रतिवर्ष 10 लाख मीटर खादी कपड़ा उत्पादित कर रहा है, जिसकी बाजार मूल्य 5 करोड़ रुपये से अधिक है.

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खादी का कपड़ा बनातीं समूह की महिलाएं (ETV Bharat)

महिलाओं के सशक्तिकरण की कहानी : खादी ने यहां न केवल आर्थिक सशक्तिकरण किया है, बल्कि सामाजिक बदलाव भी लाया है. पहले बाल विवाह और दहेज प्रथा आम थी, लेकिन अब लड़कियां शिक्षा ग्रहण कर रही हैं. गांव की 28 वर्षीय सीता देवी ने बताया, "मैंने चरखा चलाना सीखा और अपनी बेटी को स्कूल भेजा. खादी की कमाई से हमने घर बनवाया."

दिल्ली-मुंबई जैसे शहरों तक पहुंच : समूह की महिलाएं अब डिजाइनिंग कोर्स भी कर रही हैं, जहां वे पारंपरिक बिहारी मोटिफ्स के साथ आधुनिक प्रिंट जोड़ रही हैं. उनकी खादी साड़ियां, कुर्ते और शॉल दिल्ली, मुंबई के बाजारों तक पहुंच रही हैं. समूह की महिलाएं अब हाईटेक भी हो गई हैं. सुंदरपुर के प्रोडक्ट को ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर भी लेकर पहुंच गई हैं. जिससे उनकी डिमांड और देशभर में पहुंच बढ़ी है.

अमेजन और फ्लिपकार्ट पर ब्रांडिंग : ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म अमेजन और फ्लिपकार्ट पर 'सुंदरपुर खादी' ब्रांड ट्रेंड कर रहा है. सरकार की 'आत्मनिर्भर भारत' और 'मेक इन इंडिया' योजनाओं ने भी बल दिया है. पिछले साल केंद्र सरकार ने इस समूह को 50 लाख रुपये की सब्सिडी दी, जिससे 100 नई चरखियां खरीदी गईं.

'खादी गांव' का सीएम नीतीश ने दिया दर्जा : बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हाल ही में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के दौरान सुंदरपुर को 'खादी गांव' का दर्जा दिया. जिला मजिस्ट्रेट डॉ. नवीन कुमार ने कहा- "सुंदरपुर मॉडल पूरे बिहार के लिए प्रेरणा है. हम इसे अन्य गांवों में फैलाएंगे."

आर्थिक प्रभाव और भविष्य की योजनाएं : खादी उत्पादन से गांव की प्रति व्यक्ति आय दोगुनी हो गई है. पहले जहां औसत मासिक आय 3,000 रुपये थी, अब वह 8,000 रुपये से अधिक है. इससे गांव में पक्के घर, सोलर लाइट और शौचालय बने हैं. पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए 'खादी हाट' शुरू किया गया है, जहां पर्यटक चरखा चलाने का अनुभव ले सकते हैं.

समूह को जोड़ने पर फोकस : भविष्य में समूह 1,000 महिलाओं को जोड़ने की योजना बना रहा है. वे ऑर्गेनिक कॉटन की खेती शुरू करेंगे और एक्सपोर्ट के लिए जीएसटी रजिस्ट्रेशन कराएंगे. पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, चरखा उत्पादन कार्बन फुटप्रिंट कम करता है, जो सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स से मेल खाता है.

गांधीजी की प्रासंगिकता : महात्मा गांधी का चरखा आज भी प्रासंगिक है. सुंदरपुर की महिलाएं कहती हैं कि खादी केवल कपड़ा नहीं, बल्कि आजादी और आत्मसम्मान का प्रतीक है. गांव के युवा अब खादी स्टार्टअप शुरू कर रहे हैं, जो डिजिटल मार्केटिंग से जुड़े हैं.

पूरे देश को सुंदरपुर की महिलाओं का संदेश : सुंदरपुर साबित करता है कि ग्रामीण भारत में छिपी क्षमता को सही दिशा मिले तो चमत्कार हो सकता है. चरखों की गूंज न केवल गांव को गूंजा रही है, बल्कि पूरे देश को आत्मनिर्भरता का संदेश दे रही है.

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