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पलाश से महकी 'गुलाबी नगरी' व गुजरात, हर्बल गुलाल भर रहा जीवन में रंग

राजीविका जैसी सरकारी योजनाओं के माध्यम से डूंगरपुर में महिलाएं हर्बल गुलाल बनाकर अपनी आजीविका चला रही हैं.

herbal gulal from Palash flowers
गुलाल तैयार करती महिलाएं (ETV Bharat Dungarpur)
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By ETV Bharat Rajasthan Team

Published : February 27, 2026 at 3:29 PM IST

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डूंगरपुर: जिले में होली के त्योहार की आहट के साथ ही वागड़ के जंगलों में खिले पलाश के फूलों की रंगत अब केवल स्थानीय गलियों तक सीमित नहीं रही है. डूंगरपुर की ग्रामीण महिलाओं की ओर से तैयार किया गया 'हर्बल गुलाल' अब राजस्थान की राजधानी जयपुर सहित कई अन्य जिलों और पड़ोसी राज्य गुजरात के बाजारों को भी सराबोर कर रहा है. राजीविका मिशन के तहत महिला स्वयं सहायता समूह के माध्यम से डूंगरपुर जिले में ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का काम किया जा रहा है. इसी के तहत रामगढ़ गांव में 'वनधन' समूह की महिलाओं द्वारा जंगल में खिलने वाले पलाश के फूल, अन्य फूलों सहित वन उपज के माध्यम से होली को देखते हुए हर्बल गुलाल तैयार किया जा रहा है.

केमिकल युक्त रंगों के दुष्प्रभावों के बीच ये रंग पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से बनाए जा रहे हैं. हर्बल गुलाल त्वचा के लिए बेहद सुरक्षित माना जा रहा है. रामगढ़ गांव की गायत्री ननोमा ने बताया कि उनके 'वनधन' समूह के तहत करीब 50 महिलाओं की टीम होली से एक माह पूर्व इस काम में जुट जाती है. महिलाएं जंगलों से पलाश के फूल इकट्ठा करती हैं. इसके अलावा बाजार से गेंदा, रजनीगंधा और चुकंदर खरीदकर उन्हें गर्म पानी में उबाला जाता है. फिर प्राकृतिक रंगों को सुखाकर शुद्ध हर्बल गुलाल तैयार कर उसकी पैकिंग की जाती है. इस वर्ष होली पर रामगढ़ समूह ने करीब 5 क्विंटल हर्बल गुलाल तैयार करने का लक्ष्य रखा है.

यह बोले कर्मचारी व अधिकारी. (ETV Bharat Dungarpur)

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रोजगार का बना सशक्त माध्यम: यह पहल न केवल पर्यावरण के अनुकूल है, बल्कि स्थानीय महिलाओं के लिए आर्थिक संबल का मजबूत आधार भी बनी है. काम में जुटी महिलाओं को प्रतिदिन 250 रुपए मजदूरी मिलती है. वर्तमान में यह गुलाल 25 रुपए प्रति 100 ग्राम की दर से बेचा जा रहा है. डूंगरपुर से यह गुलाल उदयपुर के रास्ते जयपुर भेजा जाता है. साथ ही, गुजरात में भी हर साल 30 से 40 किलोग्राम गुलाल की सप्लाई की जा रही है. खास बात यह है कि होली का सीजन खत्म होने के बाद भी यह समूह खाली नहीं बैठता. महिलाओं ने बताया कि वे साल भर आंवले से विभिन्न उत्पाद जैसे कैंडी और चूर्ण तैयार करती हैं, जिन्हें प्रदेश भर के मेलों में बेचा जाता है. इससे उन्हें पूरे साल नियमित आय प्राप्त होती है.

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डूंगरपुर की इन महिलाओं ने यह साबित कर दिया है कि यदि पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक बाजार और सरकारी योजनाओं (जैसे राजीविका) का साथ मिले, तो ग्रामीण अंचलों में भी आर्थिक क्रांति लाई जा सकती है. 'वेस्ट से बेस्ट' बनाने की यह कला न केवल 'वोकल फॉर लोकल' को बढ़ावा दे रही है, बल्कि महिलाओं को सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त कर उन्हें अपने घर और समाज की धुरी बना रही है. पलाश की यह महक असल में आत्मनिर्भर भारत की महक है. राजीविका के जिला अधिकारी मोतीलाल मीणा ने बताया कि 'वनधन' से हर्बल गुलाल बनाकर महिला समूह आत्मनिर्भर बन रहा है. उनके लिए सरकार और विभाग की ओर से मेले भी आयोजित किए जा रहे हैं. वहीं, बाजार उपलब्ध करवाने के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं.