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जिन्होंने जिम कॉर्बेट को शिकारी से बनाया बाघ संरक्षक, सात समुंदर पार से आए उनके पोते ने दिया ये संदेश

एफडब्ल्यू चैंपियन ने वन्यजीव संरक्षण के लिए अभियान चलाने वाले पहले लोगों में से एक थे.

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एफडब्ल्यू चैंपियन के पोते (ETV Bharat)
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By ETV Bharat Uttarakhand Team

Published : February 12, 2026 at 1:40 PM IST

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रामनगर: उत्तराखंड के गौरव और भारतीय वन्यजीव फोटोग्राफी के जनक एफडब्ल्यू चैंपियन की स्मृति में रामनगर महाविद्यालय में एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया. इस अवसर पर एफडब्ल्यू चैंपियन के पोते जेम्स चैंपियन ने महाविद्यालय में पहुंचकर एक इंटरैक्टिव सत्र और प्रस्तुति के माध्यम से अपने दादा के जीवन, कार्यों और वन्यजीव संरक्षण में उनके अतुलनीय योगदान पर प्रकाश डाला. जेम्स चैंपियन ब्रिटिश नागरिक है.

कार्यक्रम के दौरान बातचीत में जेम्स चैंपियन ने कहा कि उनका नाम जेम्स चैंपियन है और वे एफडब्ल्यू चैंपियन पोते हैं, जो 1920 और 1930 के दशक में कॉर्बेट टाइगर रिज़र्व क्षेत्र में रहे और कार्यरत थे. उन्होंने बताया कि उनके दादा वन्यजीव संरक्षण के लिए अभियान चलाने वाले पहले लोगों में से एक थे. विशेष रूप से बाघ संरक्षण को लेकर, उन्होंने जंगल में बाघों की तस्वीरें लेने की ऐतिहासिक शुरुआत की और वे दुनिया के पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने प्राकृतिक परिवेश में बाघों की तस्वीरें खींचकर दुनिया के सामने प्रस्तुत कीं.

रतीय वन्यजीव फोटोग्राफी के जनक एफडब्ल्यू चैंपियन के पोते रामनगर आए. (ETV Bharat)

ब्रिटिश नागरिक और बर्ड टूर्स करते हैं गेस्ट्स को दुनिया के विभिन्न हिस्सों में। लेखक भी है और अपने दादा के काम को लोगों के बीच पहचान दिल रहे हैं

जेम्स चैंपियन ने बताया कि उनके दादा का प्रसिद्ध शिकारी और लेखक जिम कॉर्बेट के साथ गहरा मित्रतापूर्ण संबंध था. उन्होंने जिम कॉर्बेट को शिकार के बजाय बाघ संरक्षण, वन्यजीव फोटोग्राफी और लेखन की ओर प्रेरित किया, जिसमें वे काफी हद तक सफल भी रहे.

एफडब्ल्यू चैंपियन ने कुमाऊं में अपने जीवन और अनुभवों पर आधारित कई महत्वपूर्ण पुस्तकें भी लिखीं. उन्होंने कहा कि जिस क्षेत्र में उनके दादा ने अपना जीवन बिताया, वहां दोबारा आना उनके लिए बेहद भावुक और गर्व का विषय है.

इस महाविद्यालय में आकर अपने दादा के जीवन और कार्यों पर प्रस्तुति देना उनके लिए एक बड़ा सम्मान है और वो खुद को अत्यंत सौभाग्यशाली महसूस करते हैं. उन्होंने यह भी बताया कि ढिकाला क्षेत्र में उनके दादा के नाम पर एक सड़क है, जो रामगंगा नदी में स्थित चैंपियन पूल की ओर जाती है. उनके दादा और दादी को यहां मछली पकड़ना बहुत पसंद था, इसी कारण यह स्थान आज भी चैंपियन पूल के नाम से जाना जाता है और वहां तक जाने वाला मार्ग चैंपियन रोड कहलाता है.

वहीं इस अवसर पर वन्यजीव प्रेमी और संरक्षण विशेषज्ञ संजय छिम्वाल ने कहा कि यह अत्यंत हर्ष का विषय है कि एफडब्ल्यू चैंपियन की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए उनके पोते आज कॉर्बेट पहुंचे हैं. उन्होंने कहा कि एफडब्ल्यू चैंपियन किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. वर्ष 1924 के दशक में उन्होंने पहली बार जंगल में एक बाघ की तस्वीर खींचकर पूरी दुनिया को दिखाई. उस दौर में जब लोग बंदूक के माध्यम से वन्यजीवों का शिकार कर रहे थे, तब एफडब्ल्यू चैंपियन पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने यह संदेश दिया कि जानवरों को मारा नहीं जाना चाहिए, बल्कि कैमरे से संरक्षित किया जाना चाहिए.

संजय छिम्वाल ने बताया कि एफडब्ल्यू चैंपियन ने यह भी सिद्ध किया कि हर बाघ की धारियां अलग-अलग होती हैं, जो आज टाइगर रिज़र्व में बाघों की गणना के लिए अपनाई जा रही आधुनिक तकनीकों का आधार बनीं. उन्होंने कहा कि यह सौभाग्य की बात है कि एफडब्ल्यू पियन का ज्ञान और विचार आज उनके पोते के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंच रहा है.

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