भीषण ठंड में भी शरीर में गर्मी पैदा कर देता है हर्रा, आदिवासियों के जादूई फल की जबरदस्त डिमांड
आदिवासियों की आय का जरिया है ये जंगली फल, आयुर्वेद में इसे बताया है उत्तम औषधि, ठंड और कई बीमारियों से करता है बचाव

By ETV Bharat Madhya Pradesh Team
Published : January 3, 2026 at 1:08 PM IST
बालाघाट : जंगल व आदिवासी क्षेत्रों में कुछ ऐसे पेड़ पौधे पाए जाते हैं, जो अपने चमत्कारिक गुणों की वजह से प्रसिद्ध हो जाते हैं. वहीं, बालाघाट में एक ऐसा ही फल पाया जाता है, जिसे ठंड के मौसम में जादूई फल माना जाता है. इस मौसम में जंगलों में मिलने वाला यह फल आदिवासियों के लिए फल से ज्यादा औषधि और आय का साधन भी बन जाता है. इस आर्टिकल में जानें ऐसे ही जादूई फल हर्रा के बारे में.
बालाघाट में हर्रा की भरमार
आयुर्वेद की दृष्टि में उत्तम औषधि माने जाने वाले हरण (हरितकी) को ग्रामीण भाषा में 'हर्रा' कहा जाता है. बालाघाट जिले के जंगलों में इसकी भरमार है. आदिवासी वनांचल क्षेत्र में यह बड़ी संख्या में पाया जाता है. हर्रा जंगलों के अलावा खेतों की मेढ़ों सहित अन्य जगहों पर भी आसानी के साथ मिल जाता है. इसका कारण यह भी है कि बालाघाट जिले का 53 प्रतिशत हिस्सा जंगल है. ऐसे में यहां हर्रा आसानी से ऊग जाता है.

हर्रा फल खाने के कई फायदे
ठंड के मौसम में हर्रा पकाव में आता है, जिसके बाद पेड़ से नीचे गिरता है, जिसे एकत्रित कर वनांचल क्षेत्र के आदिवासी लाभ अर्जित करते हैं. दरअसल, हर्रा सर्दी, खांसी के लिए ग्रामीण अंचलों में अक्सर उपयोग किया जाता है. एक्सपर्ट कहते हैं कि हर्रा वात, पित्त और कफ तीनों के संतुलन को बनाए रखने में कारगर साबित होता है. इसके सेवन से सर्दी जुकाम, खांसी तुरंत छू मंतर हो जाती है. इसमें पित्त को संतुलित रखने का भी गुण पाया जाता है और इसके सेवन से रक्त शुध्द होता है, त्वचा संबंधी रोगों में आराम मिलता है और तो और जोड़ों का दर्द भी ठीक हो जाता है.

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ग्रामीण अंचलों में भोजन के बाद हर्रा चबाने की परंपरा आज भी बुजुर्गों में देखी जा सकती है क्योंकि इससे पाचन भी बेहतर होता है.
गुठलियों के भी मिलते हैं दाम
हर्रा ठंड के मौसम में आदिवासियों के लिए जीविकोपार्जन का एक बेहतर विकल्प है, जिसके संग्रहण से ये लोग अच्छा खासा मुनाफा कमा लेते हैं. हालांकि ग्रामीण अंचल में निवासरत लोगों को इसके संग्रहण के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है. हर्रा का संग्रहण करने लोग अलसुबह ही अपने घरों से जंगल की ओर निकल पड़ते हैं. और जगलों से हर्रा चुनकर लाने के बाद घरों में कुचलकर उसकी गुठली को अलग अलग करते हैं. फिर हर्रा को दो चार दिनों तक धूप में सुखाया जाता है, जिसके बाद सूखा हुआ हर्रा बेचकर आर्थिक लाभ अर्जित किया जाता है. बाजार में इसकी गुठली भी बेची जाती है, जिससे इसे बेचने वालों को डबल मुनाफा होता है.

क्या कहते हैं आयुर्वेद एक्सपर्ट?
आयुर्वेदाचार्य डॉ. रमेश सेवलानी कहते हैं, ''आयुर्वेद में हरण (हर्रा) को अमृत माना गया है. इसके बहुत से उपयोग हैं, जैसे ये भोजन पचाने में बहुत मददगार है, गैस, कब्ज और अपच जैसी समस्याओं में लाभकारी है. इसके साथ ही रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने और बीमारियों से लड़ने की क्षमता बढ़ाता है. सर्दी खांसी में भी इसका उपयोग होता है. इसका सेवन गुड़, सोंठ, सेंधानमक व सौंफ के साथ किया जा सकता है, जो सर्दी को दूर भगाता है. ये शरीर को डिटॉक्स भी करता है और शरीर के विषाक्त तत्वों को बाहर करने में मदद करता है. आंखों की रोशनी बढ़ाने के लिए भी इसे आंवला के साथ चूर्ण के रूप में लिया जाता है. इतना ही नहीं ये पेट और लिवर की समस्याओं में भी आराम देता है. गर्भवती महिलाओं और बच्चों को चिकित्सकीय सलाह के बाद ही इसे लेना चाहिए.

