ETV Bharat / state

हिमाचल के इस जिले में नहीं मनाते हैं बड़ी होली, त्योहार के 2 दिन पहले ही रंगों में सराबोर हो जाते हैं लोग

होलिका दहन से पहले होली खेलने की परंपरा. बसंत पंचमी से लेकर 40 दिनों तक मनाते हैं होली का त्योहार.

Big Holi not celebrated in Kullu
हिमाचल के इस जिले में नहीं मनाई जाती बड़ी होली (ETV Bharat GFX)
author img

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team

Published : March 2, 2026 at 4:12 PM IST

|

Updated : March 2, 2026 at 6:48 PM IST

7 Min Read
Choose ETV Bharat

कुल्लू: देश भर में होली का त्योहार जहां 4 मार्च को मनाया जाएगा तो कई जगह पर बसंत पंचमी के बाद से होली का त्योहार मनाया जा रहा है. हिमाचल प्रदेश के कुल्लू जिले में भी बड़ी होली से दो दिन पहले ही होली का त्योहार मनाने के परंपरा रही है. कुल्लू जिले में सोमवार, 2 मार्च को छोटी और 3 मार्च को बड़ी होली मनाई जाएगी. स्थानीय लोगों में मान्यता है कि कुल्लू में कभी भी बड़ी होली खेलने के परंपरा नहीं रही है. हालांकि, अन्य राज्यों में होलिका दहन के बाद होली खेली जाती है, लेकिन जिला कुल्लू में होलिका दहन से पहले ही लोग होली का त्योहार मना लेते हैं.

बसंत पंचमी से होली त्योहार की शुरुआत

जिला कुल्लू में होली का त्योहार बसंत पंचमी से शुरू हो जाता है. बसंत पंचमी से लेकर 40 दिनों तक बैरागी समुदाय की विशेष भूमिका रहती है. मान्यता है कि बैरागी समुदाय भगवान रघुनाथ के आगमन के साथ कुल्लू आया था, तब से यह समुदाय अयोध्या, ब्रज और अवध की पारंपरिक शैली में होली के गीत गाता है. होलाष्टक के आठ दिनों तक बैरागी समुदाय के लोग प्रतिदिन शाम को भगवान रघुनाथ के मंदिर जाते हैं, वहां होली के गीत गाकर भगवान को पवित्र गुलाल अर्पित करते हैं. इस दौरान भगवान रघुनाथ के छड़ी बरदार महेश्वर सिंह भी विशेष रूप से मौजूद रहते हैं. द्वादशी तिथि को भगवान रघुनाथ अपने गर्भगृह से बाहर आते हैं. भगवान रघुनाथ कमल आसन पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देते हैं. इस तरह सैकड़ों साल पुरानी परंपरा का आज भी निर्वहन किया जा रहा है.

देशभर में 4 मार्च और कुल्लू में 1 को होली

2 मार्च को छोटी होली और 3 मार्च को बड़ी होली का आयोजन होगा. प्राचीन मान्यताओं के अनुसार भगवान रघुनाथ के आगमन के बाद से ही यहां होली मनाई जाती है. यहां होलिका दहन से पहले ही होली खेली जाती है. होलिका दहन के अगले दिन भगवान रघुनाथ के मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना संपन्न होती है.

मान्यताओं के अनुसार कुल्लू में बड़ी होली या धुलेंडी खेलने की परंपरा कभी नहीं रही. प्राचीन परंपराओं के मुताबिक होलिका दहन से पहले होली खेली जाती है. कुछ लोगों का मानना है पुराने समय में अयोध्या के त्रेता नाथ मंदिर में भी होलिका दहन से पहले मंदिर में होली खेली जाती थी. यह परंपरा आज भी कुल्लू में निभाई जाती है.

अयोध्या के त्रेता नाथ मंदिर से लाई गई थी भगवान श्रीराम की मूर्ति

भगवान रघुनाथ के छड़ी बरदार महेश्वर सिंह ने बताया, "होलाष्टक के दिनों में कुल्लू के बैरागी समुदाय की विशेष भूमिका रहती है. वे मंदिर में होली के गीत गाते हैं. द्वादशी की रात भगवान रघुनाथ अपने गर्भगृह से बाहर निकलकर बैरागी समुदाय को दर्शन देते हैं. यह परंपरा सैकड़ों साल पुरानी है और आज भी इसका पालन किया जा रहा है."

वहीं, भगवान रघुनाथ के कारदार दानवेंद्र सिंह ने बताया, "जिला कुल्लू में होलिका दहन से पहले होली खेलने की परंपरा है. इसका आज भी पालन हो रहा है. पुरानी मान्यताओं के मुताबिक कुल्लू में बड़ी होली नहीं खेली जाती. 4 मार्च को भगवान रघुनाथ के मंदिर में केसर डोल का आयोजन होगा. इस कार्यक्रम में भगवान रघुनाथ बैरागी समुदाय को दर्शन देते हैं. भगवान के प्रमुख सेवकों द्वारा बैरागी समुदाय के लोगों को दक्षिणा भी दी जाती है. कुल्लू में केसर डोल के बाद होली उत्सव का समापन होता है."

Holi celebrated in Kullu
होली पर रंगों में सराबोर दिखे लोग (ETV Bharat)

सुल्तानपुर, सरवरी, अखाड़ा बाजार में मनाई गई छोटी होली

जिला कुल्लू में होली से दो दिन पहले ही अब होली का त्योहार शुरू हो गया है. ऐसे में सोमवार यहां छोटी होली मनाई गई. इस दौरान यहां गुलाल और रंग में रंगे सभी लोग आपस में भाईचारे का भी संदेश देते नजर आए. कुल्लू शहर के ढालपुर, लोअर ढालपुर, सरवरी, अखाड़ा बाजार, सुल्तानपुर में लोग ढोल नगाड़ों की थाप पर भी होली खेलते हुए नजर आए. सोमवार को यहां पर छोटी होली तो वहीं मंगलवार को बड़ी होली का आयोजन किया जाएगा. मंगलवार रात 9:00 बजे के बाद रघुनाथपुर में भगवान रघुनाथ अपने मंदिर से बाहर निकलेंगे और होलिका दहन की प्रक्रिया को भी विधिवत पूरा किया जाएगा.

होली पर रंगों में सराबोर दिखे लोग

सरवरी में होली खेलने पहुंचे कमलेश चौधरी ने बताया कि, जिला कुल्लू में होली का त्योहार दो दिनों तक धूमधाम से मनाया जाता है. ऐसे में सभी लोग एक दूसरों के घर में जाकर भी होली मनाते हैं और होली की बधाई देते हैं. यहां पर लोग दो दिनों तक होली खेलते हैं और आपसी भाईचारे का संदेश भी देते हैं.

बुजुर्ग भवानी चंद प्रसाद ने बताया कि, "कई सालों से कुल्लू में जो होली खेली जा रही है. पूरे प्रदेश में कहीं देखने को नहीं मिलती है. यहां पर लोग होली के गीत गाकर एक दूसरे को बधाई देते हैं. कुल्लू में भगवान रघुनाथ के आगमन से ही होली का त्योहार धूमधाम से मनाया जा रहा है और आज भी लोग पुरानी परंपरा का निर्वाहन करते आ रहे हैं."

दिग्विजय मोदगिल ने बताया कि, होली के दौरान आज भी लोग अपनी परंपरा को निभा रहे हैं. ऐसे में अब कुल्लू में आज भी होली मनाई जा रही है. यहां 2 दिनों तक होली खेली जाती है. सोमवार को छोटी होली मनाई जा रही है और मंगलवार को बड़ी होली मनाई जाएगी.

बेहद खास होती है कुल्लू की होली

वहीं, कुल्लू के रहने वाले अरुण शर्मा ने बताया कि, "होली का दिन रघुनाथ की नगरी में बेहद खास रहता है. यहां न सिर्फ लोग आपस में रंगों से खेलते हैं, बल्कि अपने पारंपरिक होली के गीत भी गाते हैं. कुल्लू की होली इसलिए भी बेहद खास है कि सभी समुदाय के लोग आपस में मिल जुल कर इस त्योहार को मनाते हैं. सुल्तानपुर में नरसिंह देवता के मंदिर से होली की शुरुआत होती है. कुल्लू की होली बेहद खास होती है. जहां गाजे बाजे के साथ मंदिर से होली की शुरुआत होती है और अंत में भगवान रघुनाथ के दरबार में होली गाकर इसका समापन किया जाता है. कुल्लू के अलग-अलग क्षेत्रों लोग टोलियां बना कर होली के लिए निकलते हैं और घर-घर जाकर होली के पारंपरिक गीत गाते हुए यह होली मनाते हैं."

कुल्लू के रहने वाले अभिनंदन ने बताया कि, कुल्लू में चली आ रही यह होली की परंपरा बेहद पुरानी है. यहां भगवान रघुनाथ के सुल्तानपुर आने के बाद से ही होली खेली जाती है. ऐसे में अब यहां 2 दिन तक होली का त्योहार मनाया जाता है. सुल्तानपुर, अखाड़ा के लोगों में होली को लेकर खासा उत्साह रहता है.

ये भी पढ़ें: अगले साल से अंतरराष्ट्रीय स्तर का होगा सुजानपुर होली मेला, कैबिनेट में लगेगी मुहर

ये भी पढ़ें: सामान्य से अधिक चल रहा तापमान, इस दिन तक बारिश-बर्फबारी के नहीं है कोई आसार

Last Updated : March 2, 2026 at 6:48 PM IST