क्या है आरडीजी का A to Z, क्या कहता है संविधान और कैसे मिलती है ग्रांट, हिमाचल को क्यों चाहिए हर साल 10 हजार करोड़ की मदद
आरडीजी बंद होने को लेकर हिमाचल में हंगामा बरपा है. सरकार इसे हिमाचल के हितों के साथ कुठारघात बता रही है.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : February 9, 2026 at 5:33 PM IST
|Updated : February 9, 2026 at 7:07 PM IST
शिमला: ऐसा प्रतीत हो रहा है कि इस समय हिमाचल के कोने-कोने में आरडीजी शब्द गूंज रहा है. सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, कर्मचारी हों या पेंशनर्स, आम जनता हो या नौकरी के लिए संघर्ष करता यूथ, हर कोई किसी न किसी रूप में आरडीजी की चर्चा कर रहा है. यहां गौरतलब है कि सोलहवें फाइनेंस कमीशन ने अपने गठन के बाद सबसे पहले हिमाचल का दौरा किया था. हिमाचल सरकार ने कमीशन के समक्ष राज्य की कठिन आर्थिक स्थितियों का ब्यौरा पेश किया था और उदार रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट की मांग की थी.
फाइनेंस कमीशन का संदर्भ भारतीय संविधान के आर्टिकल 280 में है. इसके अलावा आर्टिकल 275 (1) में संविधान कहता है- ऐसे राज्य, जो अपनी राजस्व प्राप्तियां व खर्च के बीच के अंतर यानी गैप को पूरा नहीं कर पाता है, उनके लिए ग्रांट-इन-एड दी जा सकती है. विभिन्न राज्यों को उनके परिस्थितियों के अनुसार ग्रांट मिल सकती है.
क्यों खत्म की आरडीजी
हिमाचल की राजनीति पर गहरी पकड़ रखने वाले हिमाचल उत्थान मंच के कार्यकारी अध्यक्ष प्रवीण कुमार शर्मा कहते हैं-'राजस्व घाटा अनुदान केंद्र सरकार की संवैधानिक प्रतिबद्धता नहीं है और न ही ये प्रदेश सरकार का हक है. ये क्रमिक रूप से कम होने वाला अनुदान है. राज्य सरकारें खुद राजस्व घाटे को कम नहीं कर पा रही हैं. यही कारण है कि आरडीजी खत्म करनी पड़ी है. देश के कुछ ही राज्यों को ये अनुदान मिल रहा था.'
क्या है फाइनेंस कमीशन
फाइनेंस कमीशन का गठन हर पांच साल के लिए होता है. इसके गठन का मूल उद्देश्य केंद्र व राज्यों के बीच करों यानी टैक्सिस का कैसे बंटवारा करना है, उसकी सिफारिश करता है. इसकी रिपोर्ट पहले राष्ट्रपति को सबमिट की जाती है और फिर उसको सदन की मंजूरी मिलती है. राज्यों को कैसे ग्रांट देनी है, उसकी क्या प्रक्रिया रहेगी, इन बातों को कमीशन ध्यान में रखता है और उसकी सिफारिशें करता है. कमीशन हर राज्य में जाकर वहां की सरकारों, विपक्ष, विभिन्न राजनीतिक दलों, स्थानीय निकायों के साथ बैठक कर उनकी राय लेता है. साथ ही राज्य विशेष की आर्थिक स्थितियों का अध्ययन करता है. शहरी निकायों व ग्राम पंचायतों को कैसे ग्रांट-इन-एड देनी है, इसकी सिफारिश भी यही करता है. केंद्र सरकार इन सिफारिशों पर आगे काम करता है.
16वें फाइनेंस कमीशन ने किया था सबसे पहले हिमाचल का दौरा
सोलहवें फाइनेंस कमीशन का गठन 31 दिसंबर 2023 को हुआ. गठन के बाद कमीशन ने सबसे पहला दौरा हिमाचल का किया था. ये दौरा 24 व 25 जून 2024 को था. कमीशन को राज्य सरकार ने अपनी प्रेजेंटेशन में आरडीजी के महत्व पर फोकस किया था. इस बात का जिक्र प्रजेंटेशन में किया गया था कि हिमाचल में उद्योग लगाने की संभावनाएं सीमित हैं. यहां की भौगोलिक परिस्थितियां कठिन हैं. राज्य का 66 फीसदी हिस्सा वन क्षेत्र है. अपने गठन में हिमाचल पहाड़ी राज्य है. इस कारण यहां के आर्थिक संसाधन सीमित हैं. ये सारी बातें फाइनेंस कमीशन को बताई गई. यदि दूरस्थ व दुर्गम इलाकों में सरकारी दफ्तर व स्टाफ रखना है तो उसकी कॉस्ट अधिक है. बेशक हिमाचल की आबादी कम है, लेकिन जनता को सुविधाएं देने के लिए अपेक्षाकृत अधिक संसाधन चाहिए. 23 मई 2025 को राज्य ने एक अतिरिक्त ज्ञापन दिया था. उसमें कहा गया था कि 66 फीसदी लैंड एरिया फॉरेस्ट है. इसमें सघन वन कम है और खुला वन क्षेत्र अधिक है. लाहौल-स्पीति पूरे हिमाचल का 24 फीसदी एरिया है, लेकिन डेजर्ट है. हिमाचल को पिछले फाइनेंस कमीशनों में वन क्षेत्र को लेकर कोई लाभ नहीं मिला है. फाइनेंस कमीशन की रिपोर्ट 17 दिसंबर 2025 को आई थी. केंद्र सरकार ने उसे मंजूर कर पहली फरवरी 2026 को बजट के दौरान सदन में रखा.
17 राज्यों को मिलती थी आरडीजी
सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू ने फाइनेंस कमीशन के चेयपर्सन अरविंद पनगढ़िया से मुलाकातों में ये मांग उठाई थी कि राज्य को सालाना कम से कम दस हजार करोड़ रुपए रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट के तौर पर दिए जाएं, लेकिन फाइनेंस कमीशन की रिपोर्ट लोकसभा में टेबुल की गई तो उसमें आरडीजी पूरी तरह से ही खत्म कर दी गई. कुल 17 राज्यों को ये ग्रांट मिलती थी. हिमाचल पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ा है. अब ऐसा शोर मचा है कि यदि आरडीजी बहाल नहीं हुई तो जैसे हिमाचल की आर्थिक गाड़ी पूरी तरह से थम जाएगी. सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू का कहना है कि 'आरडीजी हिमाचल का हक है. इसे खत्म करना राज्य के साथ सौतेला व्यवहार है. ऐसा फैसला किसी सरकार के खिलाफ नहीं बल्कि प्रदेश की जनता के अधिकारों पर सीधा हमला है.'
बजट का 12.71 फीसदी आरडीजी
15वें फाइनेंस कमीशन में 17 राज्यों को आरडीजी की सिफारिश की थी. किसी भी स्टेट का जो टोटल बजट है, उसमें आरडीजी कितने प्रतिशत मिली है, उससे पता चलता है कि वो राज्य रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट पर कितना निर्भर है. पिछले फाइनेंस कमीशन को देखें तो नागालैंड के बाद हिमाचल प्रदेश आरडीजी पाने वालों में दूसरे नंबर पर था. हिमाचल के बजट का 12.71 फीसदी हिस्सा आरडीजी का था. हिमाचल का 2025-26 का बजट आकार 58,514 करोड़ रुपए का था. उसमें आरडीजी की सालाना औसतन रकम 7440 करोड़ रुपए थी. ये बजट का 12.71 फीसदी बनता है. इससे सिद्ध होता है कि हिमाचल के लिए आरडीजी कितनी जरूरी है.
वरिष्ठ पत्रकार धनंजय शर्मा के अनुसार 'तेजी से बदलते आर्थिक परिदृश्य को देखते हुए अब हिमाचल को भी अपने आप को बदलना होगा. फिजूलखर्ची पर अंकुश समय की मांग है. आरडीजी जारी रहती तो प्रदेश सरकार बजट का कुछ हिस्सा विकास परियोजनाओं पर लगा सकती थी. अब तो वेतन व पेंशन के लाले पड़ने की नौबत है.'
हिमाचल को क्या मिला
फाइनेंस कमीशन ने हिमाचल को केंद्रीय करों में हिस्सेदारी में 0.914 फीसदी का शेयर दिया. ये 15वें फाइनेंस कमीशन की सिफारिश में 0.83 फीसदी था. ये कुल मिलाकर .084 की बढ़ौतरी थी. इस बार हिमाचल प्रदेश को ग्रामीण स्थानीय निकायों व शहरी स्थानीय निकायों के लिए 4179 करोड़ रुपए मिले हैं. स्टेट डिजास्टर मैनेजमेंट फंड व नेशनल डिजास्टर मैनेजमेंट फंड के तहत 2682 करोड़ रुपए मिलेंगे. केंद्रीय करों में हिस्सेदारी के तौर पर 13950 करोड़ रुपए सालाना आएंगे. सभी फाइनेंस कमीशनों ने ये माना था कि हिमाचल को आरडीजी की जरूरत है.
हिमाचल होगा सबसे अधिक प्रभावित
पूर्व वित्त सचिव केआर भारती का कहना है कि 'हिमाचल जैसे भौगोलिक रूप से कठिन परिस्थितियों वाले राज्य के आरडीजी जरूरी है. ये भी सही है कि राज्य को वित्तीय सुधारों की तरफ अधिक तेजी से अग्रसर होना चाहिए. वैसे तो आरडीजी सभी के लिए खत्म की गई है, लेकिन हिमाचल इससे बहुत प्रभावित होगा. केंद्र सरकार को कोई उपाय करना चाहिए.'
क्यों नहीं की आरडीजी की सिफारिश
16वें फाइनेंस कमीशन ने आरडीजी खत्म करने के कई कारण दिए हैं. कमीशन का कहना है कि स्टेट को विभिन्न सब्सिडी खत्म करनी चाहिए, कैश ट्रांस्फर खत्म करके टैक्स एफिशिएंसी बढ़ाए और फिस्कल डिस्पिलन लाया जाए. 15वें फाइनेंस कमीशन में हिमाचल के लिए कहा गया था कि 2021 से 2026 तक हिमाचल को 90 हजार करोड़ रुपए विभिन्न स्रोतों से आएंगे. साथ ही राज्य का खर्च 1.70 लाख करोड़ होगा. कुल 80 हजार करोड़ रुपए का घाटा होगा. उस घाटे को पूरा करने के लिए 35 हजार करोड़ रुपए टैक्स डिवोल्यूशन से मिलेगा, बाकी का गैप पूरा करने के लिए 37199 करोड़ रुपए की आरडीजी दी. तब कमीशन ने ये माना था कि हिमाचल में स्ट्रक्चरल दिक्कतें हैं. इस बार कमीशन की रिपोर्ट में ऐसी कोई कैलकुलेशन नहीं की गई है. ये रिपोर्ट में दर्ज ही नहीं है कि क्या खर्च है और राज्य की गाड़ी कैसे चलेगी.
कड़वी दवा की जरूरत
पूर्व कैबिनेट मंत्री और भाजपा नेता महेंद्र नाथ सोफ्त के अनुसार 'हिमाचल के समक्ष पेश आई विकट परिस्थितियों से निपटने के लिए कड़वी दवा की जरूरत है. ये कड़वी दवा कुछ इस प्रकार है कि मुफ्त की रेवड़ियां बंद की जाएं. फिजूलखर्ची पर रोक लगाई जाए. इसे सबसे पहले सरकार के स्तर पर शुरू करना होगा. नेताओं और बड़े अफसरों को खुद आगे आकर उदाहरण पेश करना होगा.'
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