क्या है FIR क्वैशिंग पिटीशन जिसकी चर्चा खान सर के मामले में होने लगी? जानें HC के पास कितनी बड़ी ताकत
खान सर की टीम हाईकोर्ट में क्वैशिंग पिटीशन दाखिल करने पर विचार कर रही है. जानें कब रद्द होती है FIR?

Published : June 9, 2026 at 8:23 PM IST
पटना : पटना में कोचिंग संस्थान विवाद से जुड़े मामले में फैजल खान उर्फ खान सर के खिलाफ दर्ज एफआईआर को हाई कोर्ट में चुनौती देने की तैयारी की खबरें सामने आ रही हैं. बताया जा रहा है कि उनकी कानूनी टीम हाईकोर्ट में एफआईआर क्वैशिंग पिटीशन दाखिल करने पर विचार कर रही है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर एफआईआर क्वैशिंग पिटीशन क्या होती है, किन परिस्थितियों में एफआईआर रद्द की जा सकती है और इस मामले में हाईकोर्ट के पास कितनी शक्तियां होती हैं.
HC के पास है विशेष अधिकार : भारतीय कानून में किसी व्यक्ति के खिलाफ दर्ज एफआईआर को सीधे पुलिस या निचली अदालत द्वारा खत्म नहीं किया जा सकता. हालांकि, देश के हाईकोर्ट को यह विशेष अधिकार प्राप्त है कि वह अपने अंतर्निहित अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए किसी एफआईआर या आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर सकता है. इसी उद्देश्य से संबंधित याचिका को एफआईआर क्वैशिंग पिटीशन कहा जाता है.
पटना हाईकोर्ट की अधिवक्ता पुतुल सिन्हा का कहना है कि हाईकोर्ट के पास केवल एफआईआर रद्द करने की ही शक्ति नहीं होता, बल्कि वह जांच पर अंतरिम रोक भी लगा सकता है या गिरफ्तारी से अस्थायी राहत दे सकता है. हालांकि अदालत ऐसा तभी करती है जब उसे प्रथम दृष्टया लगे कि याचिकाकर्ता के पक्ष में कोई मजबूत कानूनी आधार मौजूद है.
''एफआईआर क्वैशिंग पिटीशन एक असाधारण कानूनी उपाय है. इसलिए अदालत हर मामले में बेहद सावधानी से तथ्यों, दस्तावेजों और कानूनी प्रावधानों का परीक्षण करती है. यदि खान सर की ओर से हाईकोर्ट में ऐसी याचिका दाखिल की जाती है, तो अदालत सबसे पहले एफआईआर की सामग्री, शिकायतकर्ता के आरोपों और उपलब्ध साक्ष्यों का अध्ययन करेगी. इसके बाद ही यह तय होगा कि एफआईआर को जारी रखा जाए, जांच पर रोक लगाई जाए या फिर उसे पूरी तरह रद्द कर दिया जाए.''- पुतुल सिन्हा, अधिवक्ता, पटना हाईकोर्ट
'खान सर HC का दरवाजा खटखटा सकते हैं' : अधिवक्ता पुतुल सिन्हा बताती हैं कि अभी सिविल कोर्ट में इस मामले पर फैसला चल रहा है और कोर्ट की ओर से फैजल खान उर्फ खान सर पर पुलिस प्रशासन द्वारा दंडात्मक कार्रवाई किए जाने पर रोक लगाई गई है. नो कोर्सीव का ऑर्डर हुआ है और अगली सुनवाई 30 जून को होनी है. ऐसे में खान सर चाहें तो संविधान की धारा 226 का प्रयोग करते हुए वह सुनवाई से पहले हाई कोर्ट में एफआईआर रद्द कराने के लिए क्वैशिंग पिटीशन दायर कर सकते हैं. हालांकि पुलिस ने उन पर अनुसंधान के क्रम में मामला दर्ज किया है और धारा 109 यानी हत्या का प्रयास का मामला दर्ज किया है. यह एक गंभीर धारा है और इस मामले में साक्ष्य को अदालत देखेगी.
अधिवक्ता पुतुल सिन्हा ने बताया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी बीएनएसएस की धारा 528 के प्रावधानों के तहत हाईकोर्ट यह जांच करता है कि दर्ज एफआईआर में प्रथम दृष्टया कोई अपराध बनता भी है या नहीं. यदि अदालत को लगता है कि शिकायत दुर्भावनापूर्ण है, तथ्यों से अपराध सिद्ध नहीं होता या कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग किया जा रहा है, तो वह एफआईआर को रद्द कर सकती है.
HC हर पहलु को बारीकी से देखता है : पुतुल सिन्हा बताती हैं कि केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होता कि आरोपी निर्दोष है. हाईकोर्ट इस बात पर विचार करता है कि एफआईआर में लगाए गए आरोपों को यदि पूरी तरह सच भी मान लिया जाए, तब भी क्या कोई संज्ञेय अपराध बनता है या नहीं. यदि जवाब 'नहीं' है, तो एफआईआर रद्द की जा सकती है.
''एफआईआर क्वैशिंग पिटीशन कोई नियमित कानूनी उपाय नहीं है. हाईकोर्ट तभी हस्तक्षेप करता है जब उसे प्रथम दृष्टया लगे कि एफआईआर में अपराध नहीं बनता, प्रक्रिया का दुरुपयोग हो रहा है या न्याय के हित में हस्तक्षेप आवश्यक है.''- पुतुल सिन्हा, अधिवक्ता, पटना हाईकोर्ट

स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजन लाल : पुतुल सिन्हा आगे कहती हैं कि एफआईआर रद्द करने के लिए सबसे अधिक उदाहरण दिया जाने वाला फैसला स्टेट ऑफ हरियाणा बनाम भजन लाल (1992) माना जाता है. इस ऐतिहासिक निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने उन परिस्थितियों का उल्लेख किया था, जिनमें हाईकोर्ट एफआईआर को रद्द कर सकता है. इनमें आरोपों का पूरी तरह असंभव होना, कानून का दुरुपयोग, दुर्भावना से की गई शिकायत या किसी अपराध का प्रथम दृष्टया न बनना जैसी स्थितियां शामिल हैं.
''इसके अलावा, यदि मामला निजी विवाद से जुड़ा हो और दोनों पक्षों के बीच समझौता हो जाए, तब भी कुछ मामलों में हाईकोर्ट एफआईआर रद्द कर सकता है. हालांकि हत्या, बलात्कार, भ्रष्टाचार, हत्या का प्रयास या समाज पर व्यापक प्रभाव डालने वाले गंभीर अपराधों में अदालत आमतौर पर समझौते के आधार पर एफआईआर रद्द नहीं करती.''- पुतुल सिन्हा, अधिवक्ता, पटना हाईकोर्ट

