हिमाचल के लिए बड़ी चिंता की खबर, कहीं एक करोड़ पेटी तक न सिमट जाए सेब उत्पादन
हिमाचल में मौसम की मार से सेब उत्पादन में गिरावट की आशंका है. बदलते मौसम के कारण 5000 करोड़ की सेब आर्थिकी संकट में है. रश्मिराज भारद्वाज की रिपोर्ट

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : June 21, 2026 at 7:37 PM IST
|Updated : June 21, 2026 at 10:34 PM IST
शिमला: देश की “एप्पल बास्केट” कहे जाने वाले हिमाचल के बागवानों के माथे पर इस बार मौसम ने चिंता की गहरी लकीरें खींच दी हैं, जिन पहाड़ियों पर हर साल लाल सेबों की बहार पांच हजार करोड़ रुपये की आर्थिकी को रफ्तार देती थी, वहां अबकी बार आशंकाओं के बादल मंडरा रहे हैं. कभी बर्फबारी की कमी, कभी असमय बारिश, तो कभी तापमान के लगातार बदलते मिजाज ने सेब के बागानों की सेहत बिगाड़ दी है. नतीजा यह है कि आमतौर पर ढाई करोड़ से चार करोड़ पेटी तक पहुंचने वाला उत्पादन इस बार सिमटकर महज एक करोड़ पेटी के आसपास रहने की आशंका जताई जा रही है.
प्रगतिशील बागवान संजीव चौहान का कहना है कि 'पिछले कुछ वर्षों से मौसम में लगातार हो रहे बदलाव से सेब उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है. कभी समय से पहले गर्मी पड़ना, कभी बर्फबारी और बारिश के पैटर्न में बदलाव, तो कभी फूल आने के दौरान प्रतिकूल मौसम की स्थिति फसल को नुकसान पहुंचा रही है, जिस कारण प्रदेश की लोअर बेल्ट में इस बार सेब की फसल पिछले वर्ष के मुकाबले केवल 10 से 20 फीसदी रह गई है. वहीं, मिडल बेल्ट में फसल 30 से 40 फीसदी के आसपास आंकी जा रही है.'

संजीव चौहान के अनुसार ऊंचाई वाले क्षेत्रों में स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है, लेकिन वहां भी फसल करीब 50 फीसदी तक सिमटने की संभावना है. मौजूदा हालातों को देखते हुए इस बार प्रदेश में कुल सेब उत्पादन एक करोड़ पेटियों तक सिमट सकता है. उत्पादन में इस बड़ी गिरावट का सबसे बड़ा कारण मौसम में आया बदलाव और जलवायु परिस्थितियों का लगातार असंतुलित होना है, जिसका असर सीधे तौर पर सेब की पैदावार पर पड़ रहा है.
यह हिमाचल की अर्थव्यवस्था की धड़कन से जुड़ा बड़ा संकट है. प्रदेश के हजारों परिवारों की आजीविका, लाखों मजदूरों की रोजी-रोटी, सेब ढुलाई में लगने वाले ट्रकों, पैकिंग करने वाले कर्मचारियों, सेब की पैकिंग के लिए प्रयोग होने वाले कार्टन और बाजारों की रौनक काफी हद तक सेब पर टिकी है. ऐसे में उत्पादन में संभावित भारी गिरावट ने बागवानों से लेकर कारोबारियों तक सभी को बेचैन कर दिया है. ईटीवी भारत की पड़ताल में सामने आए तथ्यों और जमीनी हालात से संकेत मिल रहे हैं कि मौसम की मार ने इस बार सेब उत्पादन को गहरी चोट पहुंचाई है.

मौसम की मार से सूना पड़ा सेबों का साम्राज्य
सेब की अच्छी फसल से प्रदेश की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है और लाखों लोगों को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार मिलता है, लेकिन इस बार प्रकृति का मिजाज कुछ ऐसा बदला कि बागवानों की उम्मीदें खिलने से पहले ही मुरझाने लगीं. प्रदेश के सबसे बड़े सेब उत्पादक जिला शिमला में इस साल बागवानों के चेहरों पर खुशी की जगह चिंता साफ दिखाई दे रही है. सर्दियों में अपेक्षित बर्फबारी न होना, तापमान में लगातार उतार-चढ़ाव, चिलिंग आवर्स पूरे न होना और फ्लावरिंग के समय हुई बेमौसमी बारिश ने सेब उत्पादन पर गहरा असर डाला है. इसका सबसे बड़ा असर उन बागवानों पर पड़ा है, जिनकी आजीविका पूरी तरह से सेब की फसल पर निर्भर है. कई बागवानों को इस बार उत्पादन में 60 से 70 प्रतिशत तक गिरावट का अंदेशा है.
बागवानी विशेषज्ञ एसपी भरद्वाज का कहना है कि 'अलग-अलग फलों और उनकी किस्मों के लिए चिलिंग आवर्स की आवश्यकता भी अलग होती है. सेब की लोकप्रिय रेड डिलीशियस वैरायटी को सबसे अधिक करीब 1200 घंटे के चिलिंग आवर्स चाहिए होते हैं. वहीं, रॉयल सेब के लिए 1000 से 1100 घंटे की ठंड आवश्यक मानी जाती है. स्पर वैरायटी के लिए 800 से 900 घंटे और गाला प्रजाति के लिए 700 से 800 घंटे तक चिलिंग आवर्स पूरे होना जरूरी है. केवल सेब ही नहीं, बल्कि अन्य स्टोन फ्रूट्स और समशीतोष्ण फलों की अच्छी पैदावार भी पर्याप्त ठंड पर निर्भर करती है. प्लम और खुबानी के लिए 300 से 400 घंटे, नाशपाती के लिए 700 से 800 घंटे, अंगूर के लिए 300 से 400 घंटे और चेरी के लिए लगभग 1200 घंटे के चिलिंग आवर्स की आवश्यकता होती है.'

पेड़ों पर नहीं दिख रहे सेब
एक तस्वीर शिमला जिले की बखौल पंचायत से सामने आई है, जहां वर्षों से सफल बागवानी कर रहे प्रदीप चौहान का बगीचा इस बार मौसम की मार का जीता-जागता उदाहरण बन गया है, उनके बगीचे से हर साल सेबों की भरमार रहती थी और जहां से पांच से सात हजार पेटियां तैयार होकर बाजारों तक पहुंचती थीं, वहां इस बार गिने-चुने फलों की मौजूदगी ही नजर आ रही है.
प्रदीप चौहान बताते हैं कि 'अच्छी बर्फबारी न होने से पेड़ों को आवश्यक चिलिंग आवर्स नहीं मिल पाए. इसके बाद जब फ्लावरिंग का समय आया तो लगातार हुई बेमौसमी बारिश ने परागण प्रक्रिया को प्रभावित कर दिया. परिणामस्वरूप पेड़ों पर फल बनने की दर बेहद कम रही, जहां हर साल बगीचे से हजारों पेटियां निकलती थीं, वहीं इस बार मुश्किल से एक हजार पेटी उत्पादन होने की संभावना है. हालात ऐसे हैं कि फसल से होने वाली आय बगीचे के रखरखाव, मजदूरी, खाद और दवाइयों पर हुए खर्च की भरपाई भी नहीं कर पाएगी.'

कई लोगों पर पड़ेगा इसका असर
इस उत्पादन में आई भारी गिरावट का असर केवल बागवान तक सीमित नहीं रहेगा. सेब सीजन में बगीचों में काम करने वाले मजदूरों, पैकिंग करने वाले कर्मचारियों, ट्रांसपोर्टरों और कारोबार से जुड़े अन्य लोगों के लिए भी रोजगार के अवसर कम हो जाएंगे. हिमाचल प्रदेश में बागवानी क्षेत्र से 12 लाख लोगों को रोजगार मिल रहा है. देश सरकार की योजना फल कारोबार को बढ़ाकर 6 हजार करोड़ करने का लक्ष्य है, लेकिन मौसम की बदलती परिस्थितियों में लक्ष्य काफी दूर होता दिख रहा है.

कुछ सौ पेटियों में सिमट जाएगा सेब सीजन?
प्रदेश की अर्थव्यवस्था में सेब हजारों परिवारों की आजीविका का आधार है, लेकिन बदलते मौसम और जलवायु अस्थिरता ने इस आधार को गंभीर चुनौती के सामने खड़ा कर दिया है. जिला शिमला के कोटखाई क्षेत्र के प्रगतिशील बागवान अनंत राम का बगीचा इस संकट की एक जीवंत मिसाल बनकर उभर रहा है. हर वर्ष हजारों पेटी सेब देने वाला उनका बगीचा इस बार लगभग खाली दिखाई दे रहा है. पिछले सीजन में जहां करीब 2,000 पेटी सेब का उत्पादन हुआ था, वहीं इस वर्ष मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण उत्पादन घटकर मात्र 300 पेटियों तक सिमटने की आशंका है.
यह केवल एक बागवान की कहानी नहीं, बल्कि पूरे सेब उत्पादक क्षेत्र के सामने खड़े उस संकट की तस्वीर है, जिसमें अनियमित मौसम, तापमान में उतार-चढ़ाव और प्राकृतिक परिस्थितियों की मार ने बागवानी की परंपरागत व्यवस्था को झकझोर कर रख दिया है. अनंत राम का अनुभव इस बात की महत्वपूर्ण केस स्टडी प्रस्तुत करता है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब आंकड़ों तक सीमित नहीं है. यह अब सीधे किसानों की आय और भविष्य को प्रभावित कर रहा है.
सेब का पेटियों में कब कितना उत्पादन
प्रदेश के लाखों बागवानों की आजीविका से जुड़ा यह लाल फल हर साल मौसम की चाल पर निर्भर रहता है. कभी समय पर बर्फबारी और अनुकूल तापमान बंपर फसल का कारण बनते हैं, तो कभी ओलावृष्टि, अनियमित बारिश, गर्म होती जलवायु और रोगों का प्रकोप उत्पादन को प्रभावित कर देता है. यही वजह है कि हिमाचल में सेब उत्पादन पिछले एक दशक में लगातार उतार-चढ़ाव के दौर से गुजरता रहा है. दिलचस्प बात यह है कि कुछ वर्षों में रिकॉर्ड उत्पादन दर्ज हुआ, जबकि कुछ सालों में फसल अपेक्षाकृत कम रही. प्रदेश में वर्ष 2025-26 में 3,49,93,800 पेटियों का उत्पादन हुआ था. इसी तरह से वर्ष 2024-25 में 2,51,47,400 पेटियों की पैदावार रही थी. वर्ष 2023-24 में 2,11,11,972, 2022-23 में 3,36,17,133, 2021-22 में 3,05,95,058, 2020-21 में 2,40,53,100, 2019-20 में 3,57,62,650, 2018-19 में 1,84,150, 2017-18 में 2,23,28,700, 2016-17 में 2.34,06,700, 2015-16 में 3,88,56,300 करोड़ पेटी का उत्पादन हुआ था.

फल उत्पादन की सेहत तय करती है सर्दियों की ठंड
पहाड़ों में सर्दियों की बर्फबारी और कड़ाके की ठंड बागवानी अर्थव्यवस्था की रीढ़ भी मानी जाती है. हर साल फल उत्पादक किसान दिसंबर से मार्च के बीच पड़ने वाली ठंड पर विशेष नजर रखते हैं, क्योंकि यही वह समय होता है, जब पेड़ों को पर्याप्त चिलिंग आवर्स मिलते हैं.
बागवानी विशेषज्ञ एसपी भरद्वाज का कहना है कि 'जलवायु परिवर्तन के कारण सर्दियों की अवधि और ठंड की तीव्रता में लगातार बदलाव देखने को मिल रहा है, जिसका सीधा असर सेब, नाशपाती, चेरी, प्लम और खुबानी जैसे समशीतोष्ण फलों की उत्पादकता पर पड़ रहा है, यदि पेड़ों को उनकी आवश्यकता के अनुसार चिलिंग आवर्स नहीं मिलते, तो फूल आने की प्रक्रिया प्रभावित होती है, फल सेटिंग कमजोर होती है और उत्पादन में भारी गिरावट दर्ज की जा सकती है. चिलिंग आवर्स का मतलब उन घंटों से है, जब तापमान एक निश्चित सीमा के भीतर रहता है और फलदार पेड़ अपनी निष्क्रिय अवस्था (डॉर्मेंसी) को पूरा करते हैं. ये प्रक्रिया पेड़ों के स्वस्थ विकास, समान रूप से फूल आने और बेहतर गुणवत्ता वाले फलों के उत्पादन के लिए बेहद जरूरी होती है. यही कारण है कि फलदार पौधों के लिए सर्दियों की ठंड उतनी ही महत्वपूर्ण है, जितनी फसल के लिए समय पर बारिश.'
हिमाचल के इतने हेक्टेयर में बागवानी
हिमाचल प्रदेश में बागवानी के तहत कुल 2,37,368 हेक्टेयर क्षेत्र आता है, जो कुल कृषि क्षेत्र का 26 फीसदी है, जिसमें सेब प्रमुख फसल है, जो कुल फल उत्पादन का 77.58 फीसदी योगदान देती है. प्रदेश में बागवानी का लगातार विस्तार हो रहा है. हिमाचल में वर्ष 1950-51 में सेब के अंतर्गत 400 हेक्टेयर क्षेत्र था, जो वित्त वर्ष 2024-25 में बढ़कर 1,16,338 हेक्टेयर हो गया है, जबकि 27,386 हेक्टेयर क्षेत्र स्टोन फ्रूट के तहत है. ड्राई फ्रूट का उत्पादन 9,277 हेक्टेयर में किया जाता है. सिट्रस फ्रूट के तहत बागवानी का करीब 26,432 हेक्टेयर एरिया कवर होता है, लेकिन चिंता की बात ये है कि प्रदेश में बागवानी के तहत क्षेत्र तो लगातार बढ़ रहा है, लेकिन उत्पादन में इतनी अधिक बढ़ोतरी नजर नहीं आ रही है, जिसमें पिछले कई सालों से मौसम में हो रहा बदलाव एक मुख्य कारण है.

मौसम ने बिगड़ा सेब का खेल
प्रदेश के आठ राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित प्रगतिशील बागवान रामलाल का कहना है कि 'इस वर्ष प्रदेश में सेब की फसल पिछले साल की तुलना में करीब 30 प्रतिशत तक कम रहने का अनुमान है. इसके पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं. पिछले वर्ष मानसून सीजन में हुई अत्यधिक बारिश के कारण सेब के पेड़ों में समय से पहले पतझड़ हो गया, जिससे पौधों को आवश्यक पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में नहीं मिल पाए. इसके बाद सर्दियों में समय पर और पर्याप्त बर्फबारी न होने से सेब के पौधों के लिए जरूरी चिलिंग आवर्स भी पूरे नहीं हुए. वहीं, फ्लावरिंग के दौरान हुई बारिश के कारण तापमान में स्थिरता नहीं रह सकी और परागण में अहम भूमिका निभाने वाली मधुमक्खियां भी सक्रिय नहीं हो पाईं. इन सभी कारणों के चलते इस बार बागानों में सेब का उत्पादन काफी कम देखने को मिल रहा है.'
सेब का उत्पादन कम होगा ये बात तो साफ है. बागवान इसे लेकर चिंतित हैं. इससे बागवान समेत ट्रांसपोर्टर, दिहाड़ी मजदूर, लदानी समेत अन्य लोग प्रभावित होंगे, क्योंकि सेब सीजन के समय मंडियों तक इसे पहुंचाने के लिए कई लोग इससे जुड़े होते हैं. सेब उत्पान कम रहने की संभावना बागवानी विभाग भी जता रहा है.
पिछली साल की तुलना में इस बार सेब की फसल कम है. उत्पादन में कितनी गिरावट आएगी, इसका स्पष्ट आकलन जून के अंत तक तैयार होने वाली अंतिम रिपोर्ट में सामने आएगा.- बागवानी मंत्री जगत सिंह नेगी

