'हेलो नीतीश जी.. सुन रहे हैं आप.. पानी नहीं आ रहा है..' बूंद-बूंद के लिए तरसते लोगों को देखकर सिहर जाएंगे आप
प्यासा बिहार का कोरमा.. शादी के बाद इस गांव की दुल्हनियां ढोने लगती है पानी.. विरोध का भी अनोखा अंदाज..

Published : February 28, 2026 at 6:38 AM IST
गया : बिहार के गया का बेलागंज विधानसभा, उस विधानसभा का कोरमा पंचायत और उस पंचायत की रहने वाली अनीता देवी. ईटीवी भारत से जब उन्होंने अपना दर्द साझा किया तो हमारे भी रोंगटे खड़े हो गए. जरा सोचिए, अगर कोई महिला आपसे कहे कि जानवरों के नाद (टब) का पानी पीती हूं तो आपका रिएक्शन क्या होगा? वही हमारे संवाददाता रत्नेश कुमार का था, स्तब्ध.
अनीता देवी कहती हैं, "जानवरों के नाद में पीने या अन्य उपयोग का पानी रखती हूं. 15 दिनों में जाला पड़ जाता है, पानी गंदा हो जाता है. फिर भी उसे छानकर पीती हूं और उससे प्यास बुझाती हूं. इसी पानी को पीकर मैं बीमार पड़ी हूं.''

'शादी क्या हुई, पानी ढोने की जिम्मेदारी मिल गई' : कोरमा गांव की ज्ञानती देवी बताती हैं कि उसकी शादी के 8 से 9 साल हो गए. शादी क्या हुई, जैसे पानी ढोने की जिम्मेदारी मिल गई. शादी के बाद से ही वह पानी ढो रही है. 8-9 सालों से वह लगातार पानी ढोने का काम कर रही है और अपने घर की जरूरतों को किसी तरह से पूरा करती है.
''इस गांव में पानी की शुरू से ही किल्लत रही है, किल्लत अभी भी बनी हुई है. यहां जिसकी भी शादी होती है, उस दुल्हनिया के नसीब में पानी ढोना ही होता है.''- ज्ञानती देवी, कोरमा गांव की महिला
'हर रोज 15-20 KM चलना है' : कोरमा की ही रहने वाली गुड़िया देवी बताती हैं कि यहां की महिलाओं को रोज पानी के लिए 15-20 किलोमीटर चलना पड़ता है. 4 किलोमीटर दूर दूसरे गांव जाकर पानी भरना पड़ता है. एक बार में तो ज्यादा पानी नहीं ला सकते हैं. ऐसे में तीन से चार चक्कर काटना पड़ना है. यहां की हर महिलाओं को हर रोज लगभग 15 से 20 किलोमीटर चलना ही है.
'' इस इलाके में पानी नहीं है. दूसरे गांव में पानी लाने के लिए जाते हैं. यहां से दूरी पर कुछ गांव है जहां खेत में पटवन के लिए बोरिंग चलती है. बोरिंग से जो पानी निकलता है, उसे लाने हम महिलाएं रोजाना जाते हैं. बोरिंग भी एक से दो किलोमीटर की दूरी पर पड़ता है. इतनी दूरी पर पानी लाने जब जाती हूं तो एक-दो गैलन ही पानी ला पाती हूं. एक-दो गैलन पानी से कुछ नहीं होता, तो फिर दोबारा जाना पड़ता है. इसी प्रकार कई बार पानी लाने जाते हैं और फिर वापस लौटते हैं.''- गुड़िया देवी, ग्रामीण महिला

कई गांव प्यासे.. : दरअसल, गया जिला मुख्यालय से महज 12 किलोमीटर दूर कोरमा पंचायत के कई गांव प्यासे हैं. इन गांवों में पानी की आपूर्ति आज तक जमीनी स्तर पर ठोस तरीके से नहीं हो पाई है. वैकल्पिक उपाय भी फेल हो गए. बेलागंज विधानसभा क्षेत्र के कोरमा, छतु बाग, चन्ना ऐसे बड़ी आबादी वाले गांव हैं, जो पानी की किल्लत के कारण त्राहिमाम हैं. इन गांवों में आजादी के बाद से आज तक सुचारू रूप से पानी की उपलब्धता संभव नहीं हो सकी.
'गिड़गिड़ाकर पानी भरते हैं' : गांव की दर्जनों महिलाएं एक श्वर में कहती हैं कि बूंद-बूंद के लिए हम लोग मोहताज हैं. जेठ महीने में तो और भी स्थिति बुरी हो जाती है. हमें कई किलोमीटर दूर चलकर बगल के गांव बलना-चलना से पानी लाना पड़ता है. बलना की दूरी डेढ़ से 2 किलोमीटर पर है. वहां किसी किसान के खेत में बोरिंग चलती है, तो जो पानी निकलता है, किसी तरह से गिड़गिड़ाकर पानी वहां से अपने गैलन में भरते हैं और फिर अपने गांव वापस लौटते हैं.
''स्कूल में हमारे बच्चे पानी के बिना गंदे कपड़े पहने हुए जाते हैं. स्कूल में जब बच्चे जाते हैं तो शिक्षक कहते हैं कि गंदा कपड़ा पहनकर आए हो. हम लोग क्या करें? हम लोग खुद विवश हैं. पति काम पर जाते हैं, लेकिन उनके लिए खाना नहीं बन पाता, क्योंकि सुबह-सुबह घर के बर्तनों में पानी ही नहीं होता.''- दम्यंति देवी, ग्रामीण महिला

दोनों ओर से पहाड़ी, बीच में है गांव : कोरमा, छतु बीघा और चनना गांव मिलाकर 600 से अधिक घर हैं और 3000 के करीब आबादी है. इसमें 400 से अधिक घर और 2000 की आबादी पानी के बिना प्रभावित बताई जाती है. गांव के बुजुर्ग ग्रामीण बताते हैं कि दोनों ओर से पहाड़ है और बीच में यह गांव है. इस पहाड़ी क्षेत्र में आज भी पानी नहीं है.
''यहां नल जल गांव के वार्डों में लगाया गया था, लेकिन 11 और 12 नंबर वार्ड में पानी आया ही नहीं. रोज-रोज पानी की चुनौती से निपटना पड़ रहा है. यहां जो भी कुआं था वह कब का सूख चुका है. चापाकल के लिए सैकड़ों फीट बोरिंग किया जाए तो भी पानी बड़ी मुश्किल से आता है. पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण वह भी फेल हो जाता है. ऐसे में यहां बोरिंग करने की हिम्मत भी ग्रामीणों में नहीं है. जिनके पास काफी पैसा है, वही अपवाद में बोरिंग कर उसका लाभ उठा सकते हैं.''- देवनंदन मांझी, ग्रामीण

हर जाति के रहते हैं लोग : इस इलाके में यादव, कोईरी, महादलित, ब्राह्मण तकरीबन सभी जाति के लोग निवास करते हैं. किंतु सभी के लिए पानी की समस्या नासूर के सामान बन गई है, जिससे कोई दूर ही नहीं करता है. देवनंदन मांझी बताते हैं कि अभी भी यदि हमारे पाइप में पानी आने लगे तो खुशहाली आ जाएगी. हमारा विकास तो उसी में है कि कम से कम पानी देते, तभी हम लोग समझेंगे कि हम लोग विकास कर गए. किंतु हम लोगों को पानी देने वाला कोई नहीं है.
''कई दिन तो ऐसा होता है कि घर में खाना भी पानी के बिना नहीं बनता है. लोग चांद पर जा रहे हैं लेकिन हम लोग इतने पीछे हैं कि रोज यहां पानी के लिए ही जुगाड़ में जुटते हैं.''- देवनंदन मांझी, ग्रामीण

नल जल योजना की क्या है स्थिति? : कोरमा पंचायत के कई गांव में नल जल की योजना की पाइप लगी है, लेकिन उसकी टोटी नहीं है. टोटी इसलिए नहीं है क्योंकि उसे ग्रामीणों ने उखाड़ दिया. ग्रामीणों में आक्रोश था कि नल जल की पाइप क्यों लगायी, जब पानी ही नहीं देना था. आज कोई भी इन गांवों में जाता है तो उसे ग्रामीणों की खीझ सुननी पड़ती है, क्योंकि पानी की लाचारी के कारण ग्रामीण काफी आक्रोश में रहते हैं.
ऐसे जताते हैं अनोखा आक्रोश : यहां के ग्रामीण पानी की समस्या से इस कदर आजीज आ चुके हैं कि वह अपने आक्रोश व्यक्त करने के अलग-अलग तरीके अपनाते हैं. यहां जब ग्रामीणों से बात करनी शुरू की गई, तो ग्रामीणों ने गुस्से में आकर नल जल की लगी पाइप के समीप पहुंचकर अचानक पाइप से ही बात करना शुरू कर दिया.

पाइप से बात करते हुए ग्रामीण अनोखे अंदाज में विरोध जताते हैं. कहते हैं, ''हेलो मैं कोरमा के क्षेत्र से बोल रहा हूं. मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी हमारे यहां पानी नहीं है. हम लोगों ने आपको जिताया है, लेकिन हमारे यहां पानी नहीं है. नल जल का पाइप लगा दिया है, जिसमें पानी आता ही नहीं है. हम लोगों को पानी दीजिए. हम लोगों की गुहार सुनिए. मुख्यमंत्री नीतीश जी कब हमारी परेशानी समझिएगा. कब हमारी गुहार सुनिएगा. हमारी पानी की समस्या को दूर कीजिएगा.''
''कोरमा के इलाके में पानी की कमी की सूचना मिली थी. इसके लिए उपाय किए गए थे. ठेकेदार के द्वारा बताया गया था कि पानी जा रहा है. किंतु अब जब इस तरह की शिकायत मिल रही है कि कोरमा छतु बीघा और चनना गांव में पानी का घोर अभाव है तो ठेकेदार से पूछा जाएगा और आवश्यक कार्रवाई करते हुए पानी की उपलब्धता कराई जाएगी.''- ममता गोप, जूनियर इंजीनियर, पीएचईडी विभाग
कई दिनों तक स्नान नहीं करते हैं ग्रामीण : हालात यह हैं कि इस क्षेत्र के ग्रामीण पीने के पानी को तरसते हैं, तो स्नान के लिए पानी कहां से लाएगें. यही वजह है कि यहां के ग्रामीण पानी के बिना स्नान भी नहीं कर पाते. ग्रामीणों का कहना है कि जब पानी ही नहीं है तो स्नान कहां से होगा. पीने के पानी जो बचता है उससे तीन चार दिनों के अंतराल में स्नान करते हैं. ऐसा कभी नहीं होता है, जब रोज स्नान करते हों. कई-कई दिनों तक स्नान किए बिना ही यहां के लोग रह जाते हैं.

शादी-विवाह में टैंकर मंगवाना पड़ता है : पानी नहीं होने का असर शादी-विवाहों पर भी पड़ता है. शादी-ब्याह का जब समय आता है तो लोग और भी परेशानी में पड़ जाते हैं. जब किसी की शादी लगती है तो यहां टैंकर से पानी मंगाया जाता है. टैंकर का पानी ही शादी में इज्जत बचाता है. इसके लिए बड़ी रकम ग्रामीणों को भुगतान करने पड़ते हैं.
हालात जस के तस : स्थानीय वार्ड सदस्य जितेंद्र कुमार गिरी बताते हैं कि पहले भी पानी ढोकर लोग लाते थे. आज भी पानी ढोकर ला रहे हैं. पहले भी पैदल जाते थे. आज भी पैदल जा रहे हैं. यहां का पुराना सभी कुआं वर्षों पहले ही सूख गया. यह पहाड़ी क्षेत्र है. दोनों ओर पहाड़ है. बीच में गांव है. हाथ वाला बोरिंग यहां नहीं होता है. अपवाद स्वरूप ही एकाध बोरिंग किसी प्रकार से हो पाते हैं. सबसे बड़ी बात यह है कि इंसान तो अपनी प्यास किसी तरह से बुझा लेता है किंतु जानवरों के लिए बड़ी समस्या होती है पानी की समस्या यहां लगातार बनी हुई है.

''हम सरकार और प्रशासन से गुहार लगाते हैं कि इस दिक्कत को जल्दी दूर किया जाए. यदि सरकार और प्रशासन चाहे तो यहां पानी की समस्या का समाधान हो सकता है. मैं वार्ड सदस्य हूं. ऐसे में ग्रामीण हमसे भी खीझे रहते हैं. किंतु मैं बेबस हूं क्योंकि हमारे ऊपर वाले कुछ सुनते नहीं है.''- जितेंद्र कुमार गिरी, स्थानीय वार्ड सदस्य
विधानसभा में मामला उठा है : बिहार विधानसभा में यह मामला स्थानीय विधायक उठा चुकी है. बेलागंज की विधायक मनोरमा देवी ने सदन में कहा है कि उनके इलाके के पहाड़ी क्षेत्रों में पानी की घोर समस्या है जिसे दूर करने की जरूरत है. इसके लिए आवश्यक कदम उठाया जाए.
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