पिंजौर के जटायु की लंबी उड़ान, N09 ने रचा इतिहास, हिमालय और PoK तक पहुंचा, गिद्ध संरक्षण को मिली नई उम्मीद
पिंजौर से छोड़ा N09 गिद्ध 21 महीने जंगल में जीवित रहा. 13 हजार किमी उड़ा और जंगली गिद्धों में घुलमिल गया. अविनाश शर्मा की रिपोर्ट

Published : September 2, 2026 at 1:16 PM IST
|Updated : September 2, 2026 at 1:59 PM IST
पंचकूला: पंचकूला के पिंजौर स्थित जटायु कंजर्वेशन ब्रीडिंग सेंटर यानी कि JCBC से दिसंबर 2024 में छोड़े गए GPS-टैग वाले गिद्ध ने जंगल के प्राकृतिक माहौल में 21 महीने पूरे कर लिए हैं. खास बात यह है कि यह "व्हाइट-रम्पड वल्चर N09" नामक गिद्ध कैप्टिव-ब्रीडिंग से पैदा हुआ था. वहीं, मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने अपने हाथों से 17 दिसंबर 2024 को JCBC पिंजौर में पाले-पोसे गए 25 गिद्धों को जंगल में छोड़ा था, जिनमें से N09 नामक यह गिद्ध भी शामिल था.
गिद्धों की निगरानी से संभावित खतरों की पहचान: GPS-टैग वाले इस गिद्ध ने 13 हजार किलोमीटर से अधिक का सफर तय किया और 3144 मीटर की ऊंचाई तक जा पहुंचा और जंगली गिद्धों के झुंड के साथ घुलने-मिलने में भी सफल रहा है. "गिद्ध संरक्षण प्रजनन और पुनर्वास कार्यक्रम" के दौरान गिद्धों की निगरानी से उनके लिए सभी संभावित खतरों की पहचान भी की गई है. BNHS द्वारा की गई निगरानी से पता लगा है कि गिद्धों के रहने की जगहों को बिजली के बुनियादी ढांचे यानी कि बिजली के तार से सुरक्षित बनाना काफी आवश्यक है.
पैर में लगाई गई मेटल रिंग: यह N09 गिद्ध साल 2023 में JCBC पिंजौर में पैदा हुआ एक नर व्हाइट-रम्पड वल्चर यानी कि जिप्स बेंगलेन्सिस है. यह उन 25 व्हाइट-रम्पड वल्चर में शामिल था, जिन्हें मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी की मौजूदगी में जंगल में छोड़ा गया. यह उन्हें जंगल में वापस लाने के उस वैज्ञानिक रूप से तैयार प्रोग्राम का हिस्सा था, जिसका मकसद गंभीर रूप से लुप्तप्राय व्हाइट-रम्पड वल्चर की आबादी को दोबारा बढ़ाना था. उस दौरान छोड़े गए हर पक्षी की पहचान के लिए उसके पैर में एक मेटल रिंग लगाई गई, जिसमें एक GSM-GPS ट्रांसमीटर लगा था. इससे उन्हें छोड़ने के बाद उनके जीवित रहने, फैलने, रहने की जगह के इस्तेमाल और जंगली गिद्धों के साथ उनके व्यवहार पर लगातार नजर रखने के मकसद से लगाया गया था.

15 महीने पिंजौर-शिवालिक क्षेत्र में रहा: JCBC पिंजौर के प्रमुख और BNHS के एक्सपर्ट वेटेरिनेरियन डॉ. अर्शवरिंदर सिंह और गिद्धों के एक्सपर्ट हेमंत बाजपेयी ने गिद्धों की गतिविधियों के पैटर्न का विश्लेषण किया. उन्होंने बताया कि 17 दिसंबर 2024 से 1 सितंबर 2026 तक (लगभग 623 दिनों तक) N09 नामक गिद्ध के GPS-GSM टेलीमेट्री के विश्लेषण से जानकारी मिली है कि कैद में पाला-पोसा गया गिद्ध प्राकृतिक माहौल में खुद को कैसे ढालता है. जंगल में छोड़े जाने के बाद N09 नाम का जटायु शुरू में लगभग 15 महीनों तक ज्यादातर पिंजौर-शिवालिक इलाके में ही रहा. रिलीज वाली जगह के साथ यह लंबा जुड़ाव सॉफ्ट-रिलीज़ प्रक्रिया की एक अहम खासियत है. इससे पक्षी आसपास के माहौल से परिचित हो पाता है और खुले में घूमने वाले दूसरे गिद्धों के साथ घुल-मिल पाता है.
हिमालय तक खोजबीन वाली यात्राएं: मार्च 2026 से जटायु N09 ने लंबी दूरी की खोज-बीन वाली यात्राएं शुरू की. यह शिवालिक इलाके से होते हुए पूरब की ओर उत्तराखंड गया और हल्द्वानी इलाके व उससे सटे तराई इलाके तक पहुंचा, जो रिलीज वाली जगह से लगभग 330 किलोमीटर दूर था. इसके बाद यह सफलता से पिंजौर-शिवालिक इलाके की ओर लौट आया.

जटायु N09 PoK तक पहुंच गया: रिलीज किए गए पक्षियों पर नज़र रखने वाले BNHS के बायोलॉजिस्ट अरिंदम आदित्य ने कहा कि, "मार्च 2026 के कुछ ही समय बाद जटायु N09 ने हिमाचल प्रदेश-पठानकोट-जम्मू के बड़े क्षेत्र से होते हुए उत्तर-पश्चिम की ओर ओर भी लंबी यात्रा की. वह पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) के खुइरट्टा-कोटला सेक्टर तक पहुंच गया. अपनी यात्रा के सबसे दूर के रिकॉर्ड किए गए बिंदु पर N09 JCBC पिंजौर से लगभग 405 किलोमीटर दूर था. लेकिन बाद में यह गिद्ध हिमाचल प्रदेश लौट आया और कांगड़ा-ऊना की तलहटी वाले क्षेत्र में कई महीने बिताए, जहां इसे बार-बार जंगली गिद्धों के साथ उड़ते, खाना ढूंढते और खाते हुए देखा गया." वहीं, BNHS के डायरेक्टर किशोर रिथे ने कहा कि, "फील्ड में सीधे तौर पर की गई निगरानी अहम है, क्योंकि ये GPS मूवमेंट के अलावा व्यवहार से जुड़े सबूत भी देती है. इससे पता चलता है कि N09 ने जंगल में रहने के तरीके को सफलतापूर्वक अपनाया और आजाद घूमने वाले गिद्धों के साथ घुल-मिल गया है."
13 हजार किमी. से अधिक रिकॉर्ड मूवमेंट: GPS से पता चला कि N09 ने जंगल में लगभग 21 महीनों के दौरान 13 हजार किलोमीटर से अधिक की मूवमेंट पूरी की है. यह आंकड़ा लगातार GPS लोकेशन के बीच कुल मूवमेंट को दर्शाता है. नतीजतन इसे पक्षी द्वारा इस्तेमाल किए गए क्षेत्र के तौर पर समझा जाना चाहिए, न कि उसकी कुल उड़ान की दूरी के सटीक माप के तौर पर. हिमाचल प्रदेश के ऊंचे पहाड़ी इलाकों में घूमने के दौरान N09 ने समुद्र तल से लगभग 3144 मीटर की अधिकतम GPS ऊंचाई दर्ज की. इसकी लंबी दूरी की मूवमेंट, लंबी खोजपूर्ण यात्राओं के बाद लौटने की क्षमता, लंबे समय तक जीवित रहने और जंगली गिद्धों के साथ घुलने-मिलने की बातें मिलकर इस बात का अहम वैज्ञानिक सबूत देती हैं कि सही तरीके से तैयार किए गए और कैद में पाले-पोसे गए गिद्ध प्राकृतिक माहौल में जीवित रहने और काम करने में सक्षम होते हैं.
वैज्ञानिक तरीके से "सॉफ्ट रिलीज": विशेषज्ञों के अनुसार पक्षियों को आज़ाद करने से कहीं अधिक N09 का अच्छा प्रदर्शन वैज्ञानिक तरीके से तैयार "सॉफ्ट रिलीज" प्रोटोकॉल का पालन करने की अहमियत को दर्शाता है. इन्हें दोबारा जंगल में बसाने की प्रक्रिया में कई चरण शामिल हैं, जैसे-
- कैद में पाले गए स्वस्थ और व्यवहार के लिहाज से उपयुक्त गिद्धों को चुनना
- रिलीज करने से पहले पशु-चिकित्सक से जांच और स्वास्थ्य की जांच
- रिलीज से पहले के माहौल में ढलने का समय देना
- पैर के छल्लों और ट्रांसपोंडर के जरिए हर गिद्ध की अलग पहचान करना
- GPS-GSM ट्रांसमीटर लगाना
- ऐसे क्षेत्र में छोड़ना जहां जंगली गिद्ध रहते हों
- रिलीज के बाद सिस्टमैटिक तरीके से दूर से और जमीन पर जाकर निगरानी करना और जरूरत पड़ने पर दखल देना व बचाना.

री-इंट्रोडक्शन का अहम संकेत: शिवालिक और उससे सटे हिमालय की तलहटी में जंगली गिद्धों की पहले से मौजूद आबादी का होना अहम माना गया है. जिप्स गिद्ध बहुत मिलनसार पक्षी होते हैं, जो अक्सर एक साथ उड़ते हैं, खाना ढूंढ़ते हैं, खाते हैं और आराम करते हैं. वहीं, जंगली गिद्धों की मौजूदगी, कैद में पाले गए और हाल ही में रिलीज़ किए गए गिद्धों को जरूरी इकोलॉजिकल और सामाजिक संकेत दे सकती है. नतीजतन N09 का जंगली गिद्धों के साथ बार-बार घुलना-मिलना सफल री-इंट्रोडक्शन का एक अहम संकेत है.
25 पक्षियों के समूह का प्रदर्शन: इसके अलावा दिसंबर 2024 में छोड़े गए पक्षियों से आबादी के स्तर पर भी अहम जानकारी मिली है. JCBC पिंजौर से छोड़े गए 25 कैप्टिव-ब्रेड (नियंत्रित माहौल में पाले-पोसे गए) व्हाइट-रम्पड गिद्धों में से लगभग 11 पक्षी अभी भी जंगल में जीवित हैं. छोड़े जाने के लगभग 21 महीने बाद भी ताजा मॉनिटरिंग के अनुसार वे जंगल में अच्छी तरह ढल चुके हैं और जंगली गिद्धों की आबादी के साथ घुल-मिल गए हैं. लंबे समय तक इन पक्षियों का जीवित रहना बड़ी उपलब्धि माना गया है. क्योंकि इन्हें नियंत्रित माहौल में पाला गया लेकिन इन्हें खुद ही खाना खोजना, रहने के लिए सही जगह चुनना, मौसम के हिसाब से व्यवहार करना, अनजान इलाकों में रास्ता खोजना और जंगली गिद्धों के साथ घुलना-मिलना सीखना पड़ा था.
क्षेत्रों को सुरक्षित बनाना जरूरी: गिद्धों की मौत की घटनाओं से उनके लिए संभावित खतरों के बारे में भी अहम वैज्ञानिक जानकारी प्राप्त की गई है. कार्यक्रम को आगे बढ़ाने से पहले इन खतरों पर ध्यान देना आवश्यक माना गया है. गिद्धों को सफलतापूर्वक दोबारा बसाने के लिए सुरक्षित इलाके की जरूरत है. इस कार्यक्रम से यह साफ हो गया है कि केवल गिद्धों को पालने और छोड़ने से ही उनकी आबादी ठीक नहीं हो सकेगी, जब तक कि उन क्षेत्रों को सुरक्षित न बनाया जाए, जहां उन्हें छोड़ा जा रहा है. उन्हें छोड़ने के बाद की मॉनिटरिंग के दौरान सबसे गंभीर चिंताओं में से एक बिजली के बुनियादी ढांचे से बिजली का झटका लगना है. बिजली के असुरक्षित ढांचे के संपर्क में आने से कई गिद्धों की जान चली गई है. गिद्ध जैसे ऊंची उड़ान भरने वाले पक्षी अधिक खतरे में होते हैं, क्योंकि वे अक्सर बिजली के खंभों और टावरों पर बैठते हैं और उतरते, उड़ते या पंख फैलाते समय बिजली के चालू हिस्सों के संपर्क में आ सकते हैं.

जीपीएस ट्रांसमीटर अहम उपकरण साबित: निगरानी से पता लगा है कि ऊपर से गुजरने वाली बिजली की तारों से टकराना एक अतिरिक्त चिंता का विषय है. खासकर उन क्षेत्रों में जहां गिद्ध अक्सर उड़ान भरते हैं, भोजन और विश्राम स्थलों के बीच आवागमन करते हैं या घाटियों और पर्वत श्रृंखलाओं से होकर गुजरते हैं. ये खतरे कुछ ही सेकंडों में वर्षों के संरक्षण और प्रजनन प्रयासों को बर्बाद कर सकते हैं. जीपीएस टेलीमेट्री अब आवासों को सुरक्षित बनाने में मदद कर सकती है. इसलिए एन09 और अन्य छोड़े गए गिद्धों द्वारा ले जाए गए जीपीएस ट्रांसमीटरों को केवल निगरानी उपकरण के रूप में नहीं, बल्कि भू-भाग स्तर पर संरक्षण योजना के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में देखा जाना चाहिए.
खतरनाक बिजली के खंभों से बचाव: उच्च उपयोग वाले उड़ान गलियारे, भोजन क्षेत्र, विश्राम स्थल, अक्सर देखे जाने वाले भू-भाग और वे स्थान, जहां गिद्धों की गतिविधियां संभावित रूप से खतरनाक बिजली अवसंरचना के साथ ओवरलैप होती है. ऐसी जानकारी लक्षित शमन उपायों का मार्गदर्शन कर सकती है. इनमें खतरनाक बिजली के खंभों का नवीनीकरण, खुले हुए सक्रिय घटकों का इन्सुलेशन, असुरक्षित क्रॉस-आर्म डिजाइनों में संशोधन, टक्कर की संभावना वाली लाइनों पर उपयुक्त रूप से डिजाइन किए गए पक्षी-उड़ान डायवर्टर स्थापित करना और यह सुनिश्चित करना कि नई बिजली अवसंरचना जहां तक संभव हो महत्वपूर्ण गिद्ध जमाव क्षेत्रों से दूर रहे. सुरक्षित भूदृश्यों के निर्माण के लिए वन विभागों, बिजली वितरण कंपनियों, संरक्षण संगठनों और स्थानीय प्रशासनों के बीच घनिष्ठ समन्वय आवश्यक होगा.
इन बातों पर ध्यान देना आवश्यक:गिद्धों के लिए जहरीली वेटेरिनरी दवाओं को हटाना, साफ़-सुथरे शवों की उपलब्धता पक्की करना, जान-बूझकर या गलती से जहर दिए जाने से रोकना, घोंसले बनाने और आराम करने की जगहों को बचाना, दखलअंदाजी कम करना, और बिजली का झटका लगने व टकराने के खतरों को कम करना. इसलिए विशेषज्ञों के अनुसार किसी री-इंट्रोडक्शन प्रोग्राम की सफलता को केवल इस बात से नहीं मापा जाना चाहिए कि कितने गिद्ध पैदा हुए या छोड़े गए, बल्कि इस बात पर विचार किया जाना चाहिए कि उनमें से कितने जिंदा रह पाए, घुल-मिल पाए, प्रजनन कर पाए और खुद से फल-फूल रही जंगली आबादी में योगदान दे पाए. N09 और छोड़े गए दूसरे पक्षियों से मिले अनुभव भविष्य में गिद्धों को जंगल में छोड़ने और भारत में गिद्धों की आबादी को लंबे समय तक बचाने के वैज्ञानिक आधार को मजबूत करने में मददगार साबित हो रहे हैं.

