शिमला की बर्फीली हवाएं और 805 दिनों का 'अदृश्य' संघर्ष, जब व्यवस्था के आगे बेबस हुआ दिव्यांगों का जज्बा
शिमला में दृष्टिबाधितों के धरने को 800 से ज्यादा दिन हो गए है. दृष्टिबाधित खुले आसमान के नीचे संघर्ष करने को मजबूर हैं.

By ETV Bharat Himachal Pradesh Team
Published : January 5, 2026 at 10:46 PM IST
|Updated : January 5, 2026 at 11:00 PM IST
शिमला: पहाड़ों की रानी शिमला इन दिनों सिर्फ सैलानियों की चहल-पहल के लिए नहीं, बल्कि एक गहरे मानवीय संघर्ष के लिए भी चर्चा में है. जहां एक ओर माल रोड पर पर्यटक गर्म कपड़ों में घूमते नजर आते हैं, वहीं दूसरी ओर हिमाचल प्रदेश सचिवालय के बाहर समाज का एक ऐसा वर्ग बैठा है, जो अपने अधिकारों के लिए पिछले कई महीनों से कड़ाके की ठंड झेल रहा है. यह कहानी है उन दृष्टिबाधित और दिव्यांग लोगों की, जिनकी रातें माइनस डिग्री तापमान में खुले आसमान के नीचे गुजर रही हैं.
माइनस डिग्री तापमान और हौसलों की परीक्षा
जनवरी के महीने में शिमला की रातें बेहद सर्द होती हैं. जब तापमान माइनस 2 से माइनस 3 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाता है, तब आम लोग अपने घरों से बाहर निकलने से भी बचते हैं. लेकिन सचिवालय के बाहर बैठे दिव्यांगजन पिछले कई हफ्तों से इसी ठंड में रातें काट रहे हैं. उनके पास न तो पुख्ता टेंट हैं और न ही ठंड से बचाव के पर्याप्त साधन.
खुले आसमान के नीचे संघर्ष
दिव्यांग प्रदर्शनकारी प्लास्टिक की तिरपाल और कुछ कंबलों के सहारे दिन-रात गुजार रहे हैं.ठंडी हवाएं, बर्फीला मौसम और बारिश की आशंका के बीच इन लोगों का हौसला अभी भी टूटा नहीं है. इनके लिए हर रात एक नई जंग जैसी होती है, जहां दुश्मन सिर्फ सरकारी अनदेखी ही नहीं, बल्कि जानलेवा ठंड भी है.
कालीबाड़ी मंदिर के पास 805 दिनों से धरना
कालीबाड़ी मंदिर के पास दिव्यांगजन पिछले 805 दिनों से लगातार धरने पर बैठे हैं. दो साल से ज्यादा का समय बीत चुका है, मौसम बदले, सरकारें बदलीं, लेकिन इन दिव्यांगों की स्थिति जस की तस बनी हुई है. उनका कहना है कि उन्होंने उम्मीद के साथ यह आंदोलन शुरू किया था, लेकिन अब यह उनकी मजबूरी बन चुका है.
सचिवालय का घेराव और चक्का जाम
पिछले 70 दिनों से दिव्यांग प्रदर्शनकारी सचिवालय के बाहर डेरा डाले हुए हैं. सोमवार को जब उनकी सहनशक्ति जवाब दे गई, तो उन्होंने चक्का जाम का रास्ता अपनाया. सुबह करीब 10 बजे शिमला की व्यस्त कार्ट रोड पर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं. इससे आम लोगों को भी परेशानी का सामना करना पड़ा.
क्या हैं दिव्यांगों की मुख्य मांगें?
दृष्टिहीन जनसंगठन के जिला प्रभारी राजेश ठाकुर का कहना है कि उनकी मांगें कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं, बल्कि कानूनी अधिकार हैं. पहली मांग यह है कि वर्ष 1995 से खाली पड़े दिव्यांगों के चतुर्थ श्रेणी बैकलॉग पदों को भरा जाए. सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार के निर्देशों के बावजूद शिक्षा, वन, लोक निर्माण और जल शक्ति विभाग में ये पद आज तक खाली हैं.
दिव्यांगों की दूसरी बड़ी मांग पेंशन से जुड़ी है. वर्तमान में दिव्यांगों को 1700 रुपये प्रतिमाह पेंशन दी जाती है, जो बढ़ती महंगाई में नाकाफी है. संगठन का कहना है कि इस राशि को कम से कम 5,000 रुपये किया जाए, ताकि दिव्यांगजन सम्मान के साथ जीवन यापन कर सकें.
योजनाओं में कटौती का आरोप
प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि सरकार ने ‘सहारा योजना’ जैसी कल्याणकारी योजनाओं को कमजोर कर दिया है. इसके साथ ही दिव्यांगों को मिलने वाले बस पास की सुविधाओं में भी कटौती की जा रही है, जिससे उनकी रोजमर्रा की जिंदगी और मुश्किल हो गई है.
दिव्यांगों की सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री धनी राम शांडिल के साथ बैठक भी हुई. राजेश ठाकुर के अनुसार मंत्री ने आश्वासन दिए, लेकिन कोई ठोस फैसला नहीं हुआ. उनका कहना है कि उन्हें फाइलों की प्रक्रिया नहीं, बल्कि नियुक्ति पत्र और अधिसूचना चाहिए.
उग्र आंदोलन की चेतावनी
सोमवार के चक्का जाम के दौरान प्रदर्शनकारियों में गहरा आक्रोश देखा गया. संगठन ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द मांगें पूरी नहीं हुईं, तो आंदोलन और तेज किया जाएगा.अगला कदम मुख्यमंत्री के सरकारी आवास ‘ओक ओवर’ का घेराव होगा.
मुख्यमंत्री को ठहराया जिम्मेदार
दिव्यांग संगठनों ने साफ शब्दों में कहा है कि इस कड़ाके की ठंड में यदि किसी भी दिव्यांग की तबीयत बिगड़ती है या कोई अप्रिय घटना होती है, तो इसके लिए सीधे तौर पर मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू जिम्मेदार होंगे.
शिमला की सर्द रातों में चल रहा यह आंदोलन केवल मांगों का मामला नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनशीलता की परीक्षा भी है. सवाल यह है कि क्या लोकतंत्र का यह कमजोर वर्ग यूं ही ठंड में बैठा रहेगा या उसकी आवाज आखिरकार सुनी जाएगी.
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