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जिस जमीन पर होती थी अफीम की खेती, अब वहां से मिलेगी शहद की मिठास, महिलाओं ने उठाया बदलाव का बीड़ा

अफीम की खेती से प्रभावित पलामू के इलाके के ग्रामीण अब मधुमक्खी पालन कर रहे हैं.

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ग्राफिक्स इमेज (Etv Bharat)
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By ETV Bharat Jharkhand Team

Published : December 28, 2025 at 5:04 PM IST

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पलामू: झारखंड के पलामू के अफीम की खेती से प्रभावित इलाकों में एक सुखद बदलाव की शुरुआत हुई है. जिस जमीन पर कभी अफीम उगती थी, अब उससे शहद की मिठास निकलने वाली है. इस बदलाव की वाहक स्थानीय महिलाएं बनी हैं.

पलामू के मनातू में 200 से ज्यादा महिलाओं ने मधुमक्खी पालन शुरू किया है. इस पहल में पुरुष भी महिलाओं का साथ दे रहे हैं. अफीम की खेती से प्रभावित कई इलाकों में पारंपरिक खेती भी फिर से शुरू की गयी है. अब खेतों में चना और सरसों की फसलें लहलहा रही हैं.

2024-25 में, पलामू इलाके में पुलिस ने 600 एकड़ जमीन पर अफीम की फसल नष्ट की है. सबसे ज्यादा मनातू इलाके में 470 एकड़ जमीन पर लगी अफीम नष्ट की गई. इस बदलाव की शुरुआत मनातू इलाके से ही शुरू हुई, जहां गांव वालों ने मुख्यधारा में शामिल होकर अफीम की खेती का बहिष्कार किया है.

अफीम की खेती से प्रभावित इलाके में मधुमक्खी पालन (Etv Bharat)

200 से अधिक महिलाओं को उपलब्ध कराया गया किट

झारखंड लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी और पलामू पुलिस ने मिलकर अफीम की खेती से प्रभावित इलाकों में बदलाव के लिए एक योजना तैयार की थी. मार्च 2025 में, मनातू थाना क्षेत्र के भीतडीहा गांव में 29 परिवार मधुमक्खी पालन से जुड़े. अब, इसका दायरा एक दर्जन से अधिक गांवों तक फैल गया है.

मनातू के मुरधवई, रबदा, जसपुर, पन्नाडीह और सेमरी जैसे गांवों में 200 से ज्यादा महिलाएं मधुमक्खी पालन कार्यक्रम से जुड़ गई हैं. झारखंड लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी ने हर महिला को 20 मधुमक्खी पालन किट दिए हैं. सोसाइटी मधुमक्खी पालन से बनने वाले शहद के लिए बाजार भी उपलब्ध कराएगी और पलाश मार्ट के माध्यम से उसकी खरीददारी भी की जाएगी.

"अफीम की खेती के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाया गया है. ग्रामीणों को रोजगार के दूसरे विकल्प भी दिए जा रहे हैं. ग्रामीणों को मधुमक्खी पालन के लिए किट दिए गए हैं, और 200 से ज्यादा महिलाएं और ग्रामीण इससे जुड़े हैं. इस अभियान में कई और ग्रामीणों को भी जोड़ा जा रहा है." - कुमारी नम्रता, बीपीएम, जेएसएलपीएस

पुलिस ने ग्रामीणों के साथ की थी बैठक

झारखंड में अफीम की खेती की शुरुआत अक्टूबर और नवंबर के महीनों में होती है. जिसे रोकने के लिए पुलिस ने गांव वालों के साथ एक बैठक की. इस बैठक में सैकड़ों ग्रामीणों ने अफीम की खेती न करने की शपथ ली. पुलिस और झारखंड लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी ने भी प्रभावित इलाकों के ग्रामीणों को मदद का भरोसा दिलाया और उनसे परंपरागत खेती से जुड़ने की अपील की.

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मधुमक्खी पालन करते ग्रामीण (ईटीवी भारत)

"साल में 8 महीने मधुमक्खी पालन किया जा सकता है, जिससे गांव वालों को बहुत फायदा होगा और उनकी आमदनी बढ़ेगी. जिन ग्रामीणों को मधुमक्खी पालन किट दी गई हैं, वे मधुमक्खी पालन से 40,000 से 50,000 रुपये की एक्स्ट्रा इनकम कमा सकते हैं." - नवल किशोर राजू, कार्यक्रम प्रबंधक, जेएसएलपीएस

पुलिस ने एक सर्वे भी किया था और ग्रामीणों की एक लिस्ट तैयार की. गांव वालों से खेती के बारे में उनकी पसंद पूछी गई. पांकी, पिपराटांड और मनातू के कई ग्रामीणों को परंपरागत खेती के लिए चना, सरसों और अरहर समेत कई फसलों के बीज उपलब्ध कराए गए.

"गांव वालों के साथ कई बार बैठक की गई और उनसे अफीम की खेती न करने की अपील की गई. लोगों को समझाया गया कि अफीम की खेती समाज के लिए कैसे नुकसानदायक हो सकती है और कानूनी रूप से उन्हें कैसा नुकसान होगा. पुलिस की कोशिशों से प्रभावित होकर, कई लोग मुख्यधारा में शामिल हो गए हैं और अब पारंपरिक खेती कर रहे हैं. पुलिस गांव वालों को प्रोत्साहित कर रही है और उन्हें मदद दे रही है. जिस इलाके में खेती हो रही है, वह जंगली इलाका है. पहले अफीम की खेती से प्रभावित इलाकों में सत्यापन किया गया, और यह सुखद बदलाव हुआ कि उस इलाके में पारंपरिक खेती शुरू हो गई है. लोग मधुमक्खी पालन भी कर रहे हैं." - रीष्मा रमेशन, एसपी, पलामू

केस स्टडी 01

पलामू के मनातू थाना क्षेत्र के मोरधवई गांव के रहने वाले विदेश सिंह पहले अफीम की खेती करते थे. इस बार विदेश सिंह ने मधुमक्खी पालन शुरू किया है. उनका कहना है कि उनका इलाका अफीम की खेती से प्रभावित था, लेकिन अब गांव वाले मुख्यधारा में शामिल हो रहे हैं और पारंपरिक खेती कर रहे हैं. इस तरह की खेती से पूरे इलाके की तस्वीर और पहचान बदलेगी.

केस स्टडी 02

2024-25 में, पुलिस ने मनातू थाना क्षेत्र के जसपुर इलाके में अफीम की बड़े पैमाने पर खेती को नष्ट कर दिया था. इस गांव के बीस परिवार मधुमक्खी पालन में लगे हुए हैं. यह इलाका लंबे समय से नक्सली हिंसा और अफीम की खेती के लिए चर्चित रहा है. जसपुर का इलाका 2010-11 से अफीम की खेती से प्रभावित रहा है.

कई राज्यों में फैला है अफीम की खेती का नेटवर्क

झारखंड में कई जिलों में अफीम की खेती होती है, जिनमें पलामू, लातेहार, चतरा, रांची और खूंटी शामिल हैं. पलामू-चतरा सीमा पर अफीम की खेती सबसे पहले 2006-07 में शुरू हुई थी. अफीम की खेती को रोकना एक बड़ी चुनौती है. पूरे झारखंड में पुलिस अफीम की खेती के खिलाफ अभियान चला रही है और बड़े पैमाने पर फसलों को नष्ट कर रही है. अफीम की खेती करने वालों और तस्करों का नेटवर्क कई राज्यों में फैला हुआ है.

खेती करने वाले वन भूमि का इस्तेमाल करते हैं जबकि कई इलाकों में स्थानीय ग्रामीणों को बरगलाकर खेती कराई जाती है. झारखंड से अफीम की तस्करी सबसे अधिक उत्तरप्रदेश, हरियाणा एवं पंजाब के राज्यों में होता है. अकेले पलामू में 2013 के बाद से 500 से अधिक ग्रामीणों पर अफीम की खेती के मामले में एफआईआर दर्ज है. कई ऐसे गांव हैं जहां की 30 से 40 प्रतिशत आबादी पर अफीम की खेती करने का आरोप है.

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